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आरुषि तलवार के नाना बीजी चिटणिस की भावुक चिट्ठी

मेरे पास मेरी नातिन आरुषि के रूप में एक परी थी. मई 1994 में जन्मी आरुषि बचपन से ही हमारे यानी अपने नाना-नानी के घर में बड़े प्यार और दुलार से पली थी. हंसमुख, खूबसूरत और सुंदर आंखों वाली उस लडकी को मैंने बड़ा होते देखा जो हमारे जीवन में असीम खुशियां लेकर आई थी.
लेकिन जैसे ही वो 14 साल की हुई, भाग्य ने बहुत ही दर्दनाक तरीके से उसे हमसे जुदा कर दिया. उसकी अपने ही घर में, अपने ही बिस्तर पर हत्या कर दी गई. जब मैंने उसे बिस्तर पर एक निर्जीव गुड़िया की तरह पड़े हुए देखा तो मैं सन्न रह गया. यह अकल्पनीय था.
मुझे चारों तरफ ऐसे चेहरे नज़र आ रहे थे जिनकी आंखें मुझे ही देख रही थी. कुछ आंखों में उत्सुकता थी, कुछ में नमी थी और कुछ अविश्वसनीय भावहीन चेहरे भी थे. सब जानना चाहते थे कि यह क्या हो गया. मैंने अपनी बेटी नुपुर को देखा जो लगातार बुरी तरह रो रही थी. आरुषि के पिता राजेश बदहवास इधर-उधर भटक रहे थे. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि उनके आस-पास क्या हो रहा है.
दिन गुजरते गए, अशोभनीय तरीके से स्थानीय पुलिस की लापरवाह जांच भी चलती रही और उन्होंने एक दिन राजेश को ही गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद आईजी मेरठ की वह कुख्यात प्रेस वार्ता हुई जिसके बाद मीडिया में अभूतपूर्व हंगामा खड़ा हो गया. उत्तर प्रदेश पुलिस हमें लगातार चेतावनी देती रही कि हम किसी से भी बात न करें क्योंकि ऐसा करने से हमारे केस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. लेकिन असल में उनका उद्देश्य कुछ और था. वे अपनी अयोग्यता छिपाने के लिए हमें मीडिया से दूर रख रहे थे.
मीडिया इतना क्रूर हो गया कि उसने काल्पनिक आधार पर ही आरुषि और उसके परिजनों का चरित्र हनन शुरू कर दिया. यह बहुत ही घातक था. पूरी सुनवाई के दौरान भी यह अजीबोगरीब तमाशा चलता रहा और इसका अंजाम उस चौंकाने वाले फैसले के रूप में सामने आया जिसमें नुपुर और राजेश को ही दोषी ठहरा दिया गया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई.
जब यह फैसला सुनाया गया तो मैं घुटनों के बल गिर पड़ा, मेरी आंखें आंसुओं से भर गईं, मेरा शरीर और मेरी आत्मा पूरी तरह से टूट गए. भाग्य ने उन्हें और हमें एक और धोखा दिया था, मेरी दुनिया एक बार फिर से तबाह हो गई थी.
मेरी उम्र 83 साल हो चुकी है. मुझे नहीं लगता कि अपने जीवित रहते मैं उन्हें जेल से बाहर आते देख पाऊंगा. लेकिन मैं इस उम्मीद के साथ मरना चाहता हूं कि लोग इस घोर अन्याय के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे. मैं इन संस्थानों और इस व्यवस्था से पूरी तरह हारा हुआ महसूस कर रहा हूं. फिर चाहे वह पुलिस हो, मीडिया हो, सीबीआई हो या न्यायपालिका.
मैं कुछ भी गलत किये जाने की मांग नहीं कर रहा. जो कानूनन उन्हें मिलना चाहिए उससे ज्यादा मैं कुछ नहीं मांग रहा. जिस तरह मैंने एयरफोर्स में रहते हुए देश के सम्मान की रक्षा की है, क्या उन्हें स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार नहीं मिलना चाहिए, ताकि वे भी अपने सम्मान, या जो भी अब बचा है, उसकी रक्षा कर सकें? मैंने इस देश के लिए दो युद्ध लड़े हैं और पूरी निष्ठा, ईमानदारी एवं समर्पित भाव से देश की सेवा की है. लेकिन इसके बदले मुझे बुढापे में देश की हर सम्मानित संस्था से यह मिला.
हम सभी को इस बारे में सोचना चाहिए कि नुपुर और राजेश से साथ जो हुआ है, उसकी कल्पना करना भी कितना भयानक है. और इस समाज में यह हम में से किसी के साथ भी हो सकता है.
कई बार तो मैं सोचता हूं कि क्या यही वह देश है जिसके मैं सपने देखा करता था और जिसके लिए मैं लड़ा था.
-बीजी चिटणिस
रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन
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