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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के नाम एक खुली चिट्ठी

-श्याम आनंद झा
महोदय,
इस बात की सम्भावना ज्यादा है कि मेरी यह चिट्ठी आप तक न पहुंचे. पर ख़ुदा न खास्ता अगर यह आप तक पहुंचती है तो कृपया आप इसे हिंदी लिखने पढ़ने वाले अपने किसी ड्राइवर या रसोइये से पढ़वाकर सुनियेगा. वह चिट्ठी के मर्म को ज्यादा बेहतर समझ पाएगा. डर है कि आपका कोई हाकिम या ड्यूटी पर तैनात कोई संविधान विशेषज्ञ इस चिट्ठी में कई ऐसी चीजें ढूंढ निकाले जो आपके लिए या हमारे इस राष्ट्र के लिए अपमानजनक साबित हो.

याकूब मेमन केस

(इसलिए सेब को संतरा पढ़ने वाले सारे लोगों से अनुरोध है कि कृपया इस चिट्ठी को इसके आगे पढ़ने का जोखिम न उठाएं. क्योंकि इसे पढ़ते हुए आपकी राष्ट्रवादी भावना का आहत होने की पूरी आशंका है, जिसके लिए इन पंक्तियों को लिखने वाला जिम्मेदार नहीं होगा. जी, ये चिट्ठी याकूब मेमन के बारे में है!)

महामहिम, याकूब मेमन को 30 जुलाई को आज से ठीक सात दिन बाद फांसी लगने वाली है. उसने आप से माफ़ी की अर्ज़ी दी थी. आपने उसे माफ़ करने से मना कर दिया.

याकूब निर्दोष है, कि वह साजिश में शामिल नहीं था, कि उसे अपने भाई टाइगर के मंसूबों और हरकतों और के बारे में पता नहीं था - इन बकवास की बातों में मैं आपका और अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहता.

कहा जाता है कि भारत गणराज्य के आप अब तक के सबसे अनुभवी राष्ट्रपति हैं. सरकार में रहते हुए काम करने के आपके अनुभव इतने विशाल हैं कि एक राष्ट्रपति के रूप में आप से किसी भी प्रकार की गलती की कोई शंका करना ऐसे ही है जैसे कलाम साहब (एपीजे अब्दुल कलाम) से मुलायम सिंह के ख़िलाफ़ सैफई से चुनाव जीतने की अपेक्षा रखना.

इसलिए याकूब को माफ़ी न देकर आपने बिलकुल वही किया होगा, जो राष्ट्रपति होने के नाते कोई भी दूसरा आदमी करता. चाहे वह असदुद्दीन ओवैसी ही क्यों न होता.

एक राष्ट्रपति के हाथ जितने ज्यादा खुले हैं उससे ज्यादा बंधे हैं. याकूब को मिली फांसी की सज़ा को मृत्युपर्यन्त कारावास की सजा में बदलने का शायद पूर्ण एकाधिकार आपके पास नहीं है. और इस मुद्दे पर वर्तमान मंत्रिमंडल क्या विचार रखता है, यह जानने के लिए भी अमित शाह से गुफ़्तगू की ज़रूरत नहीं है.

किताबें भारत के राष्ट्रपति के पॉवर के बारे में कितना भी कुछ क्यों न बताएं, एक पढ़ा-लिखा जागरुक नागरिक यह जानता है कि हक़ीक़त में एक राष्ट्रपति के पास राष्ट्रपति भवन नाम के अज़ीम महल में शानोशौकत के साथ रहने के अलावा और कोई कोई पॉवर नहीं है! एक राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की लगभग हर सलाह या अनुशंसा को मानने के लिए बाध्य हैं. इसलिए याकूब की अर्जी को लौटा देना आपके लिए सबसे आसान काम रहा होगा. शायद इतने के लिए तो आपने किसी संविधान विशेषज्ञ की भी राय न ली होगी. एक राष्ट्रपति के रूप में असदुद्दीन ओवैसी भी यही करता. ज्यादा से ज्यादा उसे इस फैसले पर पहुंचने के लिए कुछ विशेषज्ञों की राय लेनी होती.

चिट्ठी का मकसद

इस चिट्ठी लिखने का एक मात्र मक़सद यही सवाल उठाना है कि राष्ट्रपति जैसे पद पर आसीन होने का कोई रचनात्मक पहलू भी है... या यह उतना ही यांत्रिक और मृतप्राय है, जितना दिखता है?

महोदय, कल्पना कीजिये कि आपने याकूब की फांसी को कारावास की सजा में बदलने की अनुशंसा की पहल की होती तो क्या होता!

संभवत:

1. मंत्रिमंडल आपकी सलाह को नकार देता.

2. आप पर राष्ट्रपति होते कांग्रेसी राजनीति करने का आरोप लगता.

3. कांग्रेस पर आतंकवाद के प्रति नरम रवैया रखने का आरोप लगता.

4. कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगता.

5. अगली बार आपको फिर से राष्ट्रपति बनाये जाने के मुद्दे पर सत्तारूढ़ NDA कभी विचार न करता.

परन्तु,

6. राष्ट्रपति की पहल करने की एक परमपरा कायम होती.

7. यह बहस जोर पकड़ती कि फांसी जैसी जघन्य सजा को खत्म कर दिया जाए.

8. भारत गणराज्य से नाखुश, बाग़ी होते जाते लोगों की नाराज़गी थोड़ी कम होती.

9. यह सन्देश जोर पकड़ता कि नागरिक अपने मुल्क को डर से प्यार न करे बल्कि प्यार करने के लिए प्यार करे.

10. वर्तमान सरकार की दक्षिणपंथी विस्तार पर रोकथाम की बातचीत का रास्ता खुलता.

11. हाशिये पर बैठे बहुत सारे नागरिक आपको आपके रिटायर हो जाने के बाद भी प्यार से याद करता.

12. इस टर्म के बाद आपका रिटायर होना अवश्यम्भावी है. NDA से दोबारा अपनी नामज़दगी की उम्मीद पालना बाकी बची ज़िन्दगी में एंटी डिप्रेसेंट खाने की तैयारी करने जैसा है.

आखिर कब तक?

महोदय, मैं जानता हूं की आपकी पहल के बावज़ूद याकूब को फांसी से बचाया नहीं जा सकता. लेकिन आप फांसी को ख़त्म करने की मुहिम का मुखिया बन सकते हैं.

अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है. फांसी को खत्म करने की एक राष्ट्रव्यापी बहस शुरू की जा सकती है. आप याकूब को टांगे जाने के फैसले पर अंतरिम रोक लगा सकते हैं. इस पर बवाल होगा. संभव है, आपकी एक दो रात की नींद जाएगी, लेकिन जो ख़ुशी आपको इससे मिलेगी वो अब तक के आपके किसी काम से आपको नहीं मिली होगी.

महोदय, एक पढ़े-लिखे, अनुभवी, धर्म निरपेक्ष, भारत की मूल अवधारणा में विश्वास रखने वाले, निडर राष्ट्रपति होने के नाते संविधान के प्रति रचनात्मकता और अपने कर्तव्य को लेकर सक्रियता की आपसे हमारी अपेक्षा कोई ज्यादा तो नहीं है!

(पुनश्च: और मैं यह मानने के लिए भी तैयार नहीं हूं कि जिस देश का रक्षा बजट 40 बिलियन डॉलर हो उसे जेल की सलाखों में बंद याकूब मेमन से कोई खतरा हो सकता है.)
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