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एसपी साहब, शायद यह चिट्ठी पढ़कर आप जाग जाएं!

Rohit Passi, Photo courtesy: aajtak
-रवींद्र रंजन 

जलपाईगुड़ी (पश्चिम बंगाल) के एसपी आकाश मघारिया के नाम एक चिट्ठी

आदरणीय आकाश मघारिया जी,
एसपी, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल
बधाई स्वीकार करें। स‌त्ताधारियों के इशारे पर 'बेकसूरों' पर कार्रवाई करने मामले में आपने देश के स‌भी राज्यों की पुलिस को पीछे छोड़ दिया है। आपको यह जानकर गर्व की अनुभूति होगी कि अब आपकी पुलिस भी यूपी और दिल्ली पुलिस को तगड़ा कंपटीशन दे रही है। तृणमूल कांग्रेस के पार्षद पर फेसबुक टिप्पणी करने वाले रोहित पस्सी को आपने अच्छा 'स‌बक' स‌िखाया। आइंदा ये नौजवान किसी के बारे में भी कुछ लिखने स‌े पहले स‌ौ बार स‌ोचेगा। अगर सोचा भी तो उस दिन की तस्वीरें उसकी आंखों के सामने होंगी जब आपकी पुलिस उसे घसीटकर अपने साथ ले गई थी।

जरूरी है कि पुलिस स‌मय-स‌मय पर ऎसे जबर्दस्त एक्शन लेती रहे, ताकि जनता में ये स‌ंदेश जाए कि पुलिस एक्टिव है। काम कर रही है। जनता के लिए। जनता की रक्षा के लिए। ऎसी कार्रवाई स‌े दिलेर पुलिसवालों का 'मनोबल' भी बढ़ेगा। पुलिस के जवान कॉन्फिडेंस स‌े लबरेज हो जाएंगे। ये स‌ोचकर कि एक युवक की गिरफ्तारी करके उन्होंने अपने राज्य- अपने शहर को बड़े स‌ंभावित खतरे स‌े बचा लिया।

क्या कह रहे थे आप? रोहित की फेसबुक पोस्ट स‌े 'स‌ार्वजनिक शांति' भंग होने का खतरा था? हिंसा भड़क स‌कती थी? लेकिन ये बताइये कि उसकी गिरफ्तारी स‌े 'स‌ंभावित अशांति' और हिंसा रुक कैसे गई? रोहित को तो जो लिखना था उसने लिख ही दिया। अब आप जरा यह स्पष्ट करें कि जो लोग उसकी पोस्ट स‌े 'अशांति' फैलाने वाले थे, उनको आपने कैसे स‌मझाया? कब स‌मझाया? कहां स‌मझाया? कैसे काबू में किया?
रोहित ने फेसबुक पर इतना ही तो लिखा कि 'नेता लोग अपराधियों का तो साथ देते हैं, लेकिन दुख के समय आमलोगों के साथ खड़े नहीं होते़।' उस‌की एक पोस्ट स‌े आपको यह अंदाजा कैसे हो गया कि शहर में अशांति फैल स‌कती है? हिंसा भड़क स‌कती है? पोस्ट में तो किसी नेता का नाम भी नहीं लिया गया था।

वो कहते हैं ना कि चोर की दाढ़ी में तिनका, यहां भी वही कहावत स‌च हुई। जलपाईगुड़ी वार्ड नंबर 11 के तृणमूल पार्षद पुलिन गोलदार को अपने आप ही ये 'ब्रह्मज्ञान' हो गया कि रोहित की पोस्ट उनके बारे में ही लिखी गई है। रोहित ने लिखा कि 'हत्या का आरोपी नेता जमानत पाने के लिए अदालत में पसीने-पसीने देखा गया।'

टीएमसी पार्षद गोलदार की दलील भी मजेदार है। इन साहब का कहना है कि रोहित ने पोस्ट में उनका नाम नहीं लिया, लेकिन उसमें लिखा कि जिस नेता ने जमानत पर हस्ताक्षर किए वह बांसुरी बजाता है। बस इसी से उन्होंने समझ लिया कि वह पोस्ट उनके बारे में ही लिखी गई है। शहर में कोई दूसरा नेता नहीं जो बांसुरी बजाता हो। बस इसीलिए वो सीधे थाने जा पहुंचे। शिकायत दर्ज करा दी़।

एसपी स‌ाहब, स‌त्ताधारी पार्टी का एक नेता खुद चलकर थाने तक पहुंचे तो भला आपकी पुलिस हाथ पर हाथ धरे कैसे बैठ स‌कती थी? आपकी पुलिस ने बिल्कुल ठीक किया जो नेता की शिकायत पर रोहित को गिरफ्तार कर लिया। वर्ना अभी तक पता नहीं और क्या-क्या लिख चुका होता! अभिव्यक्ति की आजादी का ये मतलब तो नहीं है कि नेताओं के खिलाफ कुछ भी लिख दो। लिखना ही था तो कांग्रेस नेता के खिलाफ लिखता। लेफ्ट नेताओं के खिलाफ लिखता। भाजपा नेताओं के खिलाफ लिखता। लेकिन उसकी तो मति मारी गई थी। लिखा भी तो स‌त्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के पार्षद के खिलाफ़। ऎसी गुस्ताखी की स‌जा तो मिलनी ही थी।

पुलिस का काम ही है मुजरिमों को उनके 'अंजाम' तक पहुंचना। कानून स‌े उनके किये की स‌जा दिलवाना। इसमें भला पुलिस की गलती कहां है? गलती तो रोहित की है। न वह फेसबुक पर टीएमसी नेता के खिलाफ लिखता और न ही पुलिस को उसके खिलाफ एक्शन लेना पड़ता। यकीनन, इससे बाकी लोग स‌बक लेंगे। खासकर वो लोग जो हर वक्त फेसबुक-ट्विटर पर स‌रकारों के पीछे पड़े रहते हैं। जो मन में आता है, लिखते रहते हैं।

एक बार एक चुटकुला स‌ुना था कि हमारे देश की पुलिस इतनी तेज है कि बदमाशों को लूट की योजना बनाते वक्त ही पकड़ लेती है। इस मौके पर एक और चुटकुला याद आ रहा है। एसपी साहब आप भी सुनिए-

एक बार अमेरिका, चाइना और भारतीय पुलिस में शर्त लगी कि देखते है हममें से सबसे तेज़ कौन है?
तय हुआ कि जंगल में एक खरगोश छोड़ा जाएगा, जो सबसे पहले खरगोश को ढूंढ के लाएगा, वही सबसे तेज़ माना जाएगा।
अमेरिकी पुलिस ने खरगोश को 2 दिनों में ढूंढ निकाला।
चीन की पुलिस ने खरगोश को ढूंढने में एक हफ्ता लगा दिया।
उसके बाद भारतीय पुलिस की बारी आई। खरगोश जंगल में छोड़ा गया। उसकी तलाश में निकली भारतीय पुलिस 2 महीने तक वापस नहीं आई। लोग पुलिस को ढूंढने पहुंचे तो देखा भारतीय पुलिस एक बन्दर को पेड़ पर उल्टा लटकाकर बुरी तरह पीट रही थी और कह रही थी- कबूल कर साले तू ही खरगोश है!!

माफ करिएगा, इस चुटकुले से पश्चिम बंगाल पुलिस का कोई लेना देना नहीं है। आपकी पुलिस तो लाजवाब है। रोहित के मामले में पुलिस की मेहनत और जज्बे ने दिखा दिया कि हमारी पुलिस हकीकत में तत्परता दिखा स‌कती है, जिसस‌े भविष्य में होने वाली घटनाएं रोकी जा स‌कती हैं। आपकी पुलिस ने कर दिखाया। दूसरे राज्यों की पुलिस को इससे कुछ स‌ीखना चाहिए। सबक लेना चाहिए। खासकर उन पुलिसवालों को, जो नियम-कानून और स‌बूत का इंतजार करते रहते हैं। कहते हैं पहले जांच करेंगे बाद में गिरफ्तारी। अरे भाई, जलपाईगुड़ी पुलिस स‌े भी कुछ स‌ीखें। पहले गिरफ्तारी करें, जांच तो बाद में होती रहेगी और सबूत बनाना (सॉरी जुटाना) तो भारतीय पुलिस के बायें हाथ का खेल है!

बुरा किया कि रोहित को निजी मुचलके पर छोड़ दिया। उसे तो जेल में स‌ड़ाना चाहिए था। तब जाकर अकल ठिकाने आती। तब जाकर पता चलता कि स‌रकार स‌े पंगा लेने और उसके मेहनतकश, ईमानदार नेताओं की आलोचना करने का नतीजा क्या होता है। यकीनन रोहित की फेसबुक पोस्ट स‌े टीएमसी नेता की मानहानि हुई है़। पुलिस के रहते किसी स‌त्ताधारी पार्टी के नेता को इस तरह बदनाम नहीं किया जा सकता।

एसपी साहब, आखिर में आपको एक बार फिर बधाई देना चाहता हूं और उम्मीद करता हूं कि दूसरे राज्यों की पुलिस भी आपकी पुलिस से प्रेरणा लेकर तेज और एक्टिव बनेगी और गिरफ्तारी का चाबुक दिखाकर इसी तरह नेताओं और सरकारों पर उंगली उठाने वाली जनता को काबू में रखेगी। आपको यकीन दिलाता हूं कि इस चिट्ठी को फेसबुक पर पोस्ट नहीं करूंगा। धन्यवाद।

आपका मुरीद 
एक आम नागरिक 

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