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ख़त किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते?

एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूं नहीं देते?
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूं तो मिटा क्यूं नहीं देते?
जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते?
ख़त किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते?
मोती हूं तो दामन में पिरो लो मुझे अपने,
आंसू हूं तो पलकों से गिरा क्यूं नहीं देते?
लिल्लाह शब-ओ-रोज़ की उलझन से निकालो
तुम मेरे नहीं हो तो बता क्यों नहीं देते?
अब शिद्दते ग़म से मेरा दम घुटने लगा है
तुम रेशमी ज़ुल्फों की हवा क्यों नहीं देते
रह रह के न तड़पाओ ऐ बेदर्द मसीहा
हाथों से मुझे ज़हर पिला क्यों नहीं देते?
जब मेरी वफाओं पे यकीं तुमको नहीं है
तो मुझको निगाहों से गिरा क्यों नहीं देते?
साया हूं तो साथ ना रखने का सबब क्या 'फ़राज़',
पत्थर हूं तो रस्ते से हटा क्यूं नहीं देते?

शायर- अहमद फ़राज़
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