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एक ख़त उस दोस्ती के नाम, जो अब शायद तुम्हारे लिए बेमानी है!

- अभिषेक शुक्ला 

कुछ कहना चाहता हूँ तुमसे। कुछ सुनाना चाहता हूँ तुम्हें। शायद मेरा बोझ हल्का हो जाए। तुम्हे कुछ सुनाकर। बातें तो ढेर सारी हैं। सुनाया तो महीनों गुजर जायेंगे। जानता हूँ तुम अपने दुनिया में मसरूफ़ हो। मुझे सुनने के लिए तुम्हारे पास वक्त कहाँ? ख़ुशी है क़ि तुम्हारी मसरूफियत बढ़ रही है, साथ ही साथ मुझसे अजनबियत भी।

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'तुम्हारी यादें उस बेमौसम बारिश की तरह हो गई हैं, जो मुझे किसान की तरह बर्बाद कर देती हैं'

सुना है क़ि वक़्त बहुत तेज़ी से बदलता है। वक्त का पीछा करते-करते कभी-कभी इंसान भी बदल जाते हैं। बदलाव कभी भी अप्रत्याशित नहीं होता, बल्कि परिस्थितिजन्य होता है। तुम्हारी जगह अगर मैं भी होता तो शायद बदल गया होता, पर क्या करूँ मुझे मेरे हालात से मोहब्बत जो है, बदलता कैसे? तुम्हें देखकर अहसास होता है कि कामयाबी होती क्या है। तुमने मुझे कामयाब और नाकाम लोगों के "अपनों" का मतलब समझाया, वर्ना अब तक इस बड़े फर्क से मैं अनजान रह जाता।

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एक कामयाब इंसान के लिए "अपनों" का मतलब माँ-बाप, पत्नी और बच्चों तक सिमटा होता है। वहीं नाकाम इंसान पूरी दुनिया को अपना मानता है। शायद यही वजह है, उम्मीदों के टूटने की। हर कोई अपना तो नहीं हो सकता न? खैर ग़लतफ़हमी की कुछ तो सजा मिलनी चाहिए।

इंसान की एक फितरत होती है कि उसे परेशानी में अपने कुछ ज्यादा ही याद आते हैं। बात खुद की परेशानी की हो तो किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ती। मुसीबतों से उबरने का हुनर इंसान सीखकर पैदा होता है। लेकिन जब बात किसी 'अपने' की जिंदगी की हो, तो डर लगता है कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए। इंसान डरता है तो सिर्फ अपनों की वजह से, वर्ना गुरूर तो पुरखों की धरोहर होती है।

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सात साल की तड़प के बाद...मरने से पहले आखिरी ख़त, प्रिय सूफ़ी ! क्या तुम ये चिठ्ठी पढ़ोगी? 

हम मदद उसी से मांगते हैं जिसे खुद से बेहतर पाते हैं। तुम्हे बेहतर मानना मेरी जिंदगी की बड़ी गलती थी। शुक्रिया! इस तल्ख़ हक़ीक़त से रूबरू कराने के लिए कि "कामयाबी मिलने पर 'अपनों' की परिभाषा सीमित और नाकाम होने पर व्यापक हो जाती है।" परेशानियां किसकी जिंदगी में नहीं आतीं? इस दौर से कभी तुम भी गुजरे हो, हज़ारों जख़्म तुम्हे भी लगे हैं...अवसाद में तुम भी पागल हुए हो। जहाँ तक मैं तुम्हें जानता हूँ। अतीत को टटोलो तो शायद तुम्हे मेरे आज का एहसास हो जाए।

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प्रेम पत्र लिखना है? तो गर्लफ्रेंड के नाम लिखी एक हिंदुस्तानी डॉक्टर की ये खास चिट्ठी जरूर पढ़ें

तुम्हारे संघर्ष के दिनों में भेजी गयी चिट्ठियों को मैंने आज भी सहेज कर रखा है। जब अवसाद तुम पर हावी था। तुम असहाय बनकर वक़्त को कोस रहे थे। तुम्हारा कन्धा थपथपाने वालों में शायद सबसे करीब मैं था। आज मुझे तुम्हारी जरूरत थी और तुमने मुझे सुनना तक ठीक नहीं समझा।

तुमसे क्या कहूँ तुम तो व्याख्याता हो। तुम्हारे दृष्टान्त तो सजीव प्रतीत होते हैं। लोग खो जाते हैं तुम्हारे शब्दों के सम्मोहन में; तुम्हारी तुलना में मैं तो कहीं नहीं ठहरता। पर तुम्हें एक राय देना चाहता हूँ। सुन लेना अगर मन करे तो। मेरे लिए बोलना मुश्किल है। आख्यान कहाँ दे पाऊंगा। फिर भी कोशिश कर रहा हूँ।

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जानते हो, "जब सूरज तपता है तो ढलता है।" विधाता का शाश्वत नियम है 'उत्थान और पतन।' सीधे शब्दों में जो उठता है, वो गिरता जरूर है। जो गिरता है उसका उठना भी तय है। जीवन उत्थान और पतन का समुच्चय है। महत्वपूर्ण है उत्थान और पतन का समन्वयन। नीति कहती है कि अहंकार पतन का हेतु है। अहंकार मत आने दो भले ही सफलता के सर्वोच्च शिखर पर कदम हों, सही मायने में तब सही समय होता है अपने कदम और मज़बूती से जमाने का। स्थिर होने का क्योंकि जो शिखर से गिरता है वो गर्त में जाता है। शिखर पर होना बहुत आम बात है। कोई भी परिश्रम करके वहां पहुँच सकता है। ख़ास बात है शिखर पर टिकना, शिखर का पर्याय हो जाना।

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सफलता सहेजी जाती है। सहेजना ही सफलता को अमरत्व देता है। इस अमरत्व की औषधि क्या है, पता है?? "विनम्रता"। जो विनम्र नहीं उसकी सफलता क्षणिक होती है। तुम्हें तो ऊपर जाना था फिर यह ओछी हरकत क्यों?? शायद तुम मुझे ये कहो कि "लोग अपनी कमियों को छिपाने के लिए दर्शन का सहारा लेते हैं"। ऐसा मत सोचना। ये दर्शन नहीं यथार्थ है।
तुम मेरे नितांत अपने हो, अगाध प्रेम है तुमसे। हाँ! तुम मुझे अपना मानो ऐसी प्रत्याशा नहीं है मेरी। चाहता हूँ तुम सफलता के पर्याय बनो, पर तुम्हारा व्यवहार मुझे सशंकित करता है। आगे तुम्हारी इच्छा।

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पूर्व प्रेमिका के नाम एक प्रेमी का ख़त, वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ, जो आसानी से हो जाये !

ये निरर्थक बातें मैं तुमसे न कहता तो मन पर एक बोझ रहता। आज कहकर थोड़ी राहत मिली है। एक एहसान है तुम्हारा मुझ पर। तुमने मुझे हकीकत से रूबरू कराया। मुझे मेरी औकात दिखाई। शायद तुम मेरे काम आते तो मैं निष्क्रिय रह जाता। अब तो चोट लगी है मरहम खुद ही लगाना है। हो सकता था कि मैं परजीवी बन जाता। पर अब आत्मनिर्भर होने की धुन सवार है मुझ पर। विश्व के आश्रयदाता तो भगवान हैं। उनके अलावा किसी और के होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। सोच रहा हूँ इस पुनीत कार्य का माध्यम बन जाऊँ। हाँ! तुम्हारा अहसान मुझे याद है। आज ही निभा दिया तो कृतघ्नता होगी और मैं कृतज्ञ बनना चाहता हूँ। कृतघ्न नहीं। जब तुम्हे मेरी जरूरत होगी मैं नर्क से भी दौड़ा आऊँगा। आख़िर तुम मेरे अपने जो हो। शुक्रिया ! मुझे आईना दिखाने के लिए। [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]

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