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भावुक हुए इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति, बेटी को लिखा ख़त, सोशल मीडिया पर हुआ वायरल

प्रिय बेटी अक्षता,

पिता बनकर मैं इतना बदल जाऊंगा, यह मैंने नहीं सोचा था। तुम्हारा मेरी जिंदगी में आना, मेरे लिए बहुत सी खुशियां और जिम्मेदारियां लेकर आया। मैं अब सिर्फ पति, पुत्र या कंपनी कर्मचारी नहीं था। मैं पिता बन चुका था, जिसे हर मो़ड़ पर अपनी बेटी की आशाओं पर खरा उतरना था। तुम्हारे जन्म ने मेरे जीवन को नई ऊंचाई दी। कंपनी में मेरी बातचीत ज्यादा विचारों वाली और नपी-तुली हो गई। बाहरी दुनिया के साथ मेरा बर्ताव अब ज्यादा परिपक्व हो गया। मैं हर इंसान से ज्यादा अच्छे तरीके से बर्ताव करने लगा। आखिरकार किसी दिन तुम ब़़डी होकर अपने आसपास की दुनिया को समझोगी और मैं नहीं चाहता कि तुम ये सोचो कि मैंने कुछ गलत किया।

मेरा दिमाग तुम्हारे जन्म के शुरुआती दिनों में हमेशा पहुंच जाता है। तुम्हारी मां और मैं उस समय जवान थे और अपने कॅरिअर के लिए स्ट्रगल कर रहे थे। तुम्हारे जन्म के 2 महीने बाद हम तुम्हें हुबली से मुंबई ले आए। जल्द ही हमें यह समझ आ गया कि बच्चे को बड़ा करना और कॅरिअर साथ में चलाना बहुत मुश्किल काम है। इसलिए हमने तय किया कि तुम अपने जीवन के शुरुआती साल हुबली में दादा-दादी के साथ बिताओगी।

हमारे लिए ये एक बहुत मुश्किल फैसला था। हर वीकेंड पर मैं बेलगाम तक हवाई जहाज से आता था और फिर वहां से हुबली के लिए कार किराए पर लेता था। इसमें बहुत पैसे खर्च होते थे, लेकिन मैं तुम्हें देखे बिना नहीं रह सकता था। मुझसे हमेशा यह पूछा जाता है कि मेरे बच्चों को मैंने क्या संस्कार दिए? मैं उनको कहता हूं कि ये जिम्मेदारी मैंने तुम्हारी मां के कंधों पर डाल रखी थी।

मैं तुम्हारी मां का हमेशा आभारी रहूंगा कि उसने तुम्हें बहुत अच्छे संस्कार दिए। उसने तुम्हें और रोहन को साधारण और सामान्य जीवन जीना सिखाया। एक बार बेंगलुरु में जब तुम्हें एक स्कूल ड्रामा में चुना गया था, तब तुम्हें एक विशेष ड्रेस पहननी थी। वह समय अस्सी के मध्य का था।

इन्फोसिस का ऑपरेशन शुरू ही हुआ था। हमारे पास इस तरह की चीजों पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं थे। तुम्हारी मां ने समझाया कि हम ऐसा ड्रेस नहीं खरीद सकते, इसलिए तुम ड्रामा में भाग नहीं ले सकती। बहुत बाद में तुमने मुझे बताया था कि तुम्हें ये घटना समझ नहीं आई।

मुझे याद है कि जब मैं तुम्हारी मां से तुम लोगों को स्कूल भेजने को लेकर डिस्कस करता था। मेरा कहना था कि तुम्हें रोहन को कार से स्कूल भेजने की व्यवस्था करनी चाहिए, तब हमारे पास पैसे भी बहुत थे। लेकिन तुम्हारी मां ने कहा कि नहीं तुम लोगों को अपने क्लासमेट्स के साथ ऑटोरिक्शा से ही स्कूल जाना चाहिए। तुमने उस दौरान 'रिक्शा अंकल' और अन्य लोगों से अच्छी दोस्ती की थी।

तुम अकसर कहती थीं कि हमारे घर में टीवी क्यों नहीं है, जबकि अन्य दोस्तों के घर में टीवी था। तुम्हारी मां ने शुरुआत में फैसला लिया था कि घर में टीवी नहीं होना चाहिए ताकी बच्चों को पढ़ने, डिस्कशन करने और दोस्तों से मुलाकात के लिए वक्त मिल सके। उनका कहना था कि घर में ऐसा माहौल होना चाहिए, जिससे बच्चों को पढ़ाई में मदद मिल सके।

टेक केयर माई चाइल्ड
आपका प्यारा अप्पा।

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