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बड़े होते बेटे के लिए मां का ख़त, तुम्हारी पीढ़ी के हर लड़के को दोहरी ज़िम्मेदारी उठानी होगी

-डॉ. शिल्पी झा 

मेरे प्यारे बेटे,
तुम अपनी बहन के ठीक एक मिनट बाद मेरे गर्भ से बाहर आए। तुम्हारी बहन तब डॉक्टर सॉर्किन वेल्स के हाथों में ही थी। उन्होंने उसे हौले से पुचकारा, ‘देखो कितनी भाग्यशाली हो तुम, तुम्हारा ख्याल रखने साथ-साथ एक भाई भी आया है।‘

उस पीड़ा में भी मैं प्रतिवाद करना चाहती थी। अमेरिकन होकर भी डॉक्टर ने ऐसा क्यों कहा? ख्याल तो दोनों को ही रखना होगा एक-दूसरे का, ये ज़िम्मेदारी केवल भाई की ही क्यों? और फिर बहन की अपने भाई पर निर्भरता रहेगी ही क्यों? हम उसे भी तो उतना ही सक्षम बनाएंगे। मेरा तो कोई भाई नहीं और इस बात को मैंने और तुम्हारी मौसियों ने हमेशा एक तरह से सेलीब्रेट ही किया है, एक दूसरे का संबल बनकर, एक दूसरे को बिना शर्त प्यार देकर।

और देखो ना, आने के चंद घंटों के बाद तुम्हें सांस लेने में तकलीफ हुई और डॉक्टरों ने तुम्हें, मुझसे दूर ऑक्सीजन पर रखने का फैसला किया। मुझसे अलग तुम चिड़चिड़े से हो थे तो डॉक्टर ने तुम्हारी बहन को भी इन्क्यूबेटर में तुम्हारे बगल में लिटा दिया। तुम्हें गर्भ से उसके साथ की ही आदत थी ना, तो सबने सोचा उसका साथ पाकर तुम्हें आश्वस्ति होगी। हफ्ते भर में तुम बिल्कुल ठीक होकर मेरी गोद में आ गए।

पहली झलक में ही तुम दोनों एकदम अलग थे, अंग्रेज़ी के ‘चॉक एंड चीज़’ की तरह। जब तुमने दसवें महीने में ही चलना शुरु किया वो मुश्किल से खड़ी हो पाती थी। तो उसे वॉकर में बिठा तुम पूरे घर में घुमाते। वो तुमसे ज्यादा वाचाल निकली और अपनी स्पष्ट आवाज़ में कई बार तुम्हारे तुतलाते शब्दों के मतलब समझने में हमारी मदद करती। तुम शैतानियां भी करते तो एक बार नज़र घुमा कर बहन का अनुमोदन ज़रूर ले लेते। स्कूल की पढ़ाई तुमने अपने देश में शुरू की। शुरूआती महीनों में तुम अपनी चुलबुली बहन के भाई के तौर पर ज्यादा जाने जाते, तो हमने तुम्हें अलग क्लासों में डालने का निश्चय किया। तुम दोनों अलग हो, अपनी खूबियों और खामियों के साथ। और हम चाहते हैं कि तुम वैसे ही बड़े होओ। हमने तुम्हारी टीचरों से हमेशा ही कहा, इन्हें बेहतर बनाइए, लेकिन एक की तुलना दूसरे से मत कीजिए, हम भी नहीं करते।

जिस पीढ़ी, जिस परिवेश में तुम आए हो, बेटे या बेटी की परवरिश में अंतर का ख्याल भी मां-बाप के मन में आने का प्रश्न पैदा नहीं होता। लेकिन हमने शुरू से समान मौकों के साथ तुम दोनों को एक समान ज़िम्मेदारियां देने का भी फैसला किया। राखियां तुम दोनों एक दूसरे की कलाई पर बांधते हो और एक दूसरे को सरप्राइज़ गिफ्ट देने के लिए हफ्तों पहले से मां के साथ गुपचुप योजनाएं बनानी भी शुरू कर देते हो। अपने और घर के काम तुम दोनों एक साथ सीखते रहे हो। खाने की मेज़ पर बहन प्लेटें लगाएगी, तुम ग्लास और पानी लेकर आओ। दोनों अपनी प्लेटें उठाकर खुद सिंक में रखो, अपने जूते-कपड़े जगह पर रखो, घर भर की लाइटें बंद करो। फ्रिज से टमाटर निकाल कर ला दो, बाल्कनी से करी पत्ता तोड़ लाओ, रसोई से ये आवाज़ें लगाते समय मैं कभी नहीं सोचती कि तुम्हें पुकारूं या तुम्हारी बहन को। जिसका नाम निकल आए पहले। वैसे मेरी आवाज़ पर ज्यादातर तुम्हीं दौड़ते हो।

दस साल निकल गए, अपनी पसंद का क्षितिज मापने की तैयारी में तुम्हारे पंख मज़बूत होते जा रहे हैं। कई बार सोचती हूं, क्या तुम समझ पा रहे हो कि तमाम उसूलों और बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद मां अंतर करती है? तुम्हें कभी कभार बिल्डिंग के नीचे की दुकान से अकेले जाकर ब्रेड, बिस्किट लाने जाना होता है, लेकिन बहन को अकेला भेजने में मां हिचकिचाती है, कोशिश करती है किसी ना किसी बहाने तुम्हें भी साथ भेज दे। अपने विश्वस्त ड्राइवर के साथ गाड़ी में तुम्हें दसेक मिनट के लिए अकेला छोड़ भी दे, बहन को कभी नहीं छोड़ती। छुट्टी के वक्त कभी स्कूल पहुंचने में देर करती है तो तुम्हें अकेला देख ये नहीं पूछती कि तुम्हारा दिन कैसा रहा, पूछती है तुम्हारी बहन कहां है, तुम उसके साथ क्यों नहीं हो। तुम्हारे संसार का दायरा बढ़ रहा है और तुम्हारी व्यस्तताएं भी। मां अब हर क्षण तुम्हारे साथ नहीं रह सकती। लेकिन मन में कहीं ना कहीं ये तसल्ली होती है कि तुम हो उसके साथ। पता नहीं कैसे ये सोच हम सो कॉल्ड पढ़ी-लिखी, मॉडर्न, आत्मनिर्भर माओं के डीएनए का हिस्सा बन गई है।

तुम हमेशा से ही अपनी उम्र से ज़्यादा समझदार रहे हो, ऐसा नहीं है कि मां का ये दोहरा रवैया तुम महसूस नहीं कर रहे। बहुत जल्द तुम सवाल भी करोगे, जब अधिकार एक समान हैं तो ज़िम्मेदारियां क्यों नहीं? जब घर के अंदर बहन तुम्हारे हिस्से के काम नहीं करती तो घर के बाहर तुम क्यों उसकी देखभाल का अतिरिक्त बोझ उठाओ? मैं जानती हूं कि एक दिन तुम पूछोगे, जब घर से बाहर निकलने पर मेरे साथ कोई भाई नहीं होता था तो भी मेरे अंदर इस तरह की सोच कैसे पनप सकती हैं? तुम्हें पता है, नौकरी की ज़रूरत से पहले मै रात-बिरात घर या हॉस्टल से अकेली बाहर निकल ही नहीं पाई। जब नौकरी में आधी-आधी रात तक बाहर रहने की ज़रूरत पड़ी तो नए शहर में रात के दो बजे गली के मुहाने पर दफ्तर की गाड़ी से मुझे रिसीव कर घर पहुंचाने के लिए ईश्वर को वो मुंहबोला भाई भेजना पड़ा जिनसे जुड़ा स्नेह का धागा समय के साथ और मज़बूत होता गया है। अब सोचती हूं, अकेली निकल पाती तो क्या पता दुनिया के कितने नए रंग देख पाती।

इसलिए बेटे, आज का ये खत एक अपराधबोध का स्वीकारनामा समझो। जाने अनजाने तुम्हारे नाज़ुक कंधों पर अधिकारों से ज्यादा बड़ी ज़िम्मेदारियां डालने का अपराधबोध। लेकिन साथ ही ये भी जान लो बेटे कि समय के साथ तुम्हारी ज़िम्मेदारयां और बढ़ेंगीं। घर में तुम्हें हमेशा बराबरी की ज़िम्मेदारियां उठानी पड़ेंगी और बाहर बराबरी से ज़्यादा।

सच तो ये है कि घर के अंदर की दुनिया तुम्हारे माता-पिता की बसाई हुई है, तिनका-तिनका जोड़ी हुई, यहां हमने वो सबकुछ रचा जो रचना चाहते थे इसलिए तुम दोनों बराबर हो। सच ये भी है कि घर के बाहर वो दुनिया है जो हमारी उम्मीदों से बहुत अलग है, विषमताओं, दोहरे मापदंडों और विद्रूपों से भरी हुई। बाहर की दुनिया में ऐसे परिवारों की भी भरमार है जिनके लिए बराबरी की बातें कहने की अलग और करने की कुछ और हैं।

इसलिए केवल तुम्हें ही नहीं, तुम्हारी पीढ़ी के हर लड़के को ये दोहरी ज़िम्मेदारी उठानी होगी, केवल अपनी बहन के लिए ही नहीं बल्कि घर के बाहर आत्मविश्वास से लबरेज़ कदम रखने वाली हर लड़की के लिए। क्योंकि बाहर की दुनिया से डरकर लड़कियों के पर बांधने का समय अब रहा नहीं। जब तक बेटा और बेटी के लिए अधिकारों और ज़िम्मेदारियों के पलड़े हमेशा-हमेशा के लिए बराबर ना हो जाए। इस कोशिश में इतना वक्त भी लगे कि तुम्हारे बच्चों को भी इसका भागी बनना पड़े तो भी वो ज़िम्मेदारी तुम्हारी पीढ़ी को निभानी होगी। हमारी परवरिश का हर दिन इसी कोशिश में बीत रहा है।

तुम्हारी ममा
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