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टीवी चैनलों ! प्लीज, रियलिटी शो की आग में मासूमों को मत जलाओ !

- रवींद्र रंजन 

प्रिय टीवी चैनलों,
मेरी यह चिट्ठी किसी एक चैनल के लिए नहीं है। सब चैनल मुझे बराबर पसंद हैं। ज्यादातर दर्शकों को तमाशेबाजी ही पसंद होती है! यही तो आप सब की खासियत है! बच्चों को तो चैनलों की ये खासियत और भी लुभाती है। जो कुछ भी पर्दे पर दिखता है उसे वह सच मान बैठते हैं। जो आप कहते हैं उस पर भरोसा कर लेते हैं। उस पर अमल करने की कोशिश में जुट जाते हैं। आपके रियलिटी शो बच्चों के लिए बिल्कुल 'रियल' हैं। इसी 'रियलिटी' के चक्कर में न जाने कितनों का बचपन बर्बाद हो गया।

औसत देखा जाए तो रियलिटी शो के जरिये किसी के 'बनने' का आंकड़ा बेहद छोटा है। 'बिगड़ने' और 'बर्बाद' होने का आंकड़ा यकीनन उससे बड़ा होगा। लेकिन आपको क्या? आपको तो टीआरपी चाहिए। जब तक रियलिटी शो टीआरपी देते रहेंगे, तब तक चैनलों का ये तमाशा जारी रहेगा। इसे रोक पाना खुद आपके सिवा और किसी के लिए मुमकिन भी नहीं है। लेकिन एक गुजारिश है। इस तमाशे को प्लीज टैलेंट का नाम तो न दें!

काकरोच से भरे बक्से में लेटना। आग लगाकर कूदना-फांदना। चीखना-चिल्लाना। पानी से डरने का नाटक करना। फिर उसी में डूबना। रस्सी बांधकर उल्टा लटकना। यह सब भला टैलेंट की श्रेणी में किस तरह आता है? सिंगिंग शो, अंताक्षरी, क्विज आदि को तो टैलेंट से जोड़ा जाना चाहिए, लेकिन अफसोस इस बात का है कि आपने छोटे पर्दे पर प्रायोजित हर तमाशे पर 'टैलेंट' का तमगा चिपका दिया है। जाहिर है कोमल मासूम मन पर्दे पर जो हरकतें देखता है, उसे 'टैलेंट' ही समझता है। ऐसे में वह खुद भी उस टैलेंट को ओढ़ना चाहेगा। बिछाना चाहेगा। खाना चाहेगा। पीना चाहेगा। जीना चाहेगा।

एक टीन एजर युवा आपके इस 'टैलेंट' में डूब जाना चाहेगा। उसी तरह जैसे हैदराबाद में 17 साल का मोहम्मद जलालुद्दीन डूब गया। डूबा भी ऐसा कि अब कभी बाहर नहीं आएगा। रियलिटी शो में हिस्सा लेने की ख्वाहिश दिल में लिए वो इस दुनिया से ही चला गया। मौत से बड़ी रियलटी वैसे भी इस दुनिया में और कोई नहीं। साफ-साफ कहूं तो जलालुद्दीन की मौत के लिए आप चैनल वाले ही जिम्मेदार हैं। वर्ना उसे किसने सिखाया कि खुद पर कैरोसीन डालकर आग लगाने से चैनल वाले उसे टैलेंटेड मान लेंगे? रीयलिटी शो में हिस्सा लेने के लिए बुला लेंगे? जाहिर है उसने ऐसा ही कुछ आपके 'रियलिटी शो' में देखा होगा। फिर उसे अपनी सोच-समझ के मुताबिक खुद पर अप्लाई करने की कोशिश की होगी।

बचपन तो ऐसा ही होता है। भोला। मासूम। नकारात्मकता से दूर। इसीलिए तो खुद पर कैरोसीन उड़ेलकर और मुंह में कैरोसीन भरकर आग से दो-दो हाथ करने वाला जलालुद्दीन ये नहीं सोच पाया कि जिस आग से वो खेलने जा रहा है, वो उसकी जिंदगी को जला भी सकती है। लेकिन बचपने से लबरेज उसकी आंखों के सामने तो सिर्फ अपना 'लक्ष्य' था। बस किसी भी तरह रियलिटी शो में एंट्री पाना। उसे यकीन रहा होगा कि चैनल वाले जब धू-धू कर जलते हुए उसका खतरनाक और रोमांचकारी वीडियो देखेंगे, तो उसे अपने रियलिटी शो का हिस्सा बनाने को बेकरार हो जाएंगे। शायद होता भी ऐसा ही। क्योंकि इस वीडियो में रोमांच, ड्रामा, सस्पेंस, डर सब कुछ आपको एक साथ मिल जाता। आदत के मुताबिक आप उसकी कहानी के साथ उसका सामान्य फैमिली बैकग्राउंड जोड़कर उसे इमोशनल भी बना देते। कुछ दोस्तों, रिश्तेदारों के इंटरव्यू-बाइट्स दिखाकर ये भी साबित कर देते कि जलालुद्दीन तो बचपन से ही बहुत टेलेंटेड था। ऐसी रोमांचकारी प्रतिभा तो उसमें कूट-कूटकर भरी थी।

आपके तथाकथित जज उसे देखकर तरह-तरह के नाटकीय रिएक्शन पेश करते। कोई भावुक होकर आंखों में आंसू आने का दिखावा करता। तो कोई उसकी मां-पिता-भाई से बात कर शो के माहौल को इमोशनल  बनाने की कोशिश करता। चैनलों, आपके लिए तो सब ड्रामा है। लोगों के इमोशन भी। उनकी ख्वाहिशें भी। सपने भी। लेकिन जब आपके वो फूहड़ जज खुद को चीफ जस्टिस समझकर किसी मासूम, भदेस, गंवारू और सीधे-साधे युवक-युवती का मजाक बनाते हैं, तब सब कुछ शीशे की तरह साफ हो जाता है। ये अलग बात है आपकी तरफ उम्मीद से देखने वाले युवाओं को आपका असली चेहरा नजर नहीं आता। क्योंकि उनकी आंखों पर ख्वाहिशों का चश्मा चढ़ा रहता है। उन्हें लगता है कि आपका शो उनकी ख्वाहिशों को पंख दे देगा। वो भी कामयाबी की उड़ान भर सकेंगे। लेकिन उन्हें क्या पता कि आपके रियलिटी शो की 'रियलिटी' कितनी भयावह है। अगर पता होता तो बेचारा जलालुद्दीन ऐसी गलती कभी नहीं करता। आपके शो में पहुंचना ही अपनी जिंदगी का अंतिम लक्ष्य नहीं बनाता। अपनी जिंदगी से नहीं खेलता।

हालांकि आपको सब पता है! रियलिटी ये भी है कि उसकी मौत से आपको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ज्यादा से ज्यादा ये होगा कि आप उसकी फोटो दिखाकर सैड सा कोई म्यूजिक चलाएंगे। उसकी मौत पर दुखी होने का 'ड्रामा' करेंगे और अगले ही पल धूम-धड़ाके, हंसी मजाक और नाटक-नौटंकी में व्यस्त हो जाएंगे। लेकिन जरा सोचिए, उस परिवार पर क्या गुजर रही होगी, जिसके घर का चिराग रोशन होने से पहले ही बुझ गया।

बचपन से जवानी की तरफ कदम बढ़ाने वाला जलालुद्दीन अभी इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रहा था। जाहिर है मां-बाप ने भी बेटे को लेकर कुछ सपने देखे होंगे। पढ़ा-लिखाकर बढ़ा आदमी बनाने का ख्वाब पाला होगा। शायद वो ख्वाब सच भी होते। लेकिन जलालुद्दीन ने सोचा होगा कि रियलिटी शो में पहुंचकर वह रातों-रात बड़ा आदमी बन जाएगा। देश भर में मशहूर हो जाएगा। तब उसके मां-बाप भी उस पर गर्व करेंगे। उसे शाबासी देने स्टेज पर आएंगे। उसे मिले अवॉर्ड को निहारेंगे। छूकर देखेंगे। लोग तालियां बजाएंगे। उनके बेटे को होनहार बताएंगे। लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं होगा।

रियलिटी शो में दुनिया को अपना टैलेंट दिखाने की ख्वाहिश रखने वाला जलालुद्दीन अब नजर आएगा तो सिर्फ तस्वीरों में। उसकी तस्वीरें याद दिलाएंगी कि वो भी कभी 'रियल' में था और हां, उसका वीडियो भी उसकी हिम्मत, जांबाजी, बेवकूफी की याद दिलाता रहेगा। लोग यूट्यूब पर उसे देखेंगे। शेयर करेंगे। कमेंट करेंगे। कोई उसे 'मूर्ख' बताएगा। कोई अफसोस जताएगा। लेकिन इस बात का भी यकीन है कि ये सिलसिला थमेगा नहीं।

टीवी चैनल वालों, मुझे पक्का यकीन है कि टैलेंट के नाम पर आपकी ये 'दुकान' बदस्तूर चलती रहेगी और रातों-रात छा जाने की ख्वाहिश में कई अन्य घरों के चिराग भी इसी तरह बुझते रहेंगे। उम्मीद करता हूं आप अपने बेमकसद शो के बारे में एक बार तो सोचेंगे। एक बार पीछे मुड़कर भी देखने की कोशिश करेंगे। महज एक डिस्क्लेमर दिखाकर आप अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। धन्यवाद।

आपके चैनल का एक आम दर्शक
12 अप्रैल, 2016 
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