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बेटी के हजारों सवालों का जवाब, लिफाफे में बंद पिता की एक चिट्ठी

-आदर्श सिंह

दफ़्तर में अक्सर चहल-पहल रहती थी लेकिन बड़े बाबू के प्रवेश होते ही माहौल शांत हो जाता था। इस शांति का कारण लोगों के मन में उनका डर नहीं  बल्कि सम्मान था। उनका नाम सुबोध दत्त था, आयु कुछ 35 या 40 बरस रही होगी। स्वभाव से सरल, छल-कपट तो उन्हें छू भी न सका था। किसी से भी पूछिये, हर कोई यही कहता कि ऐसे लोगों के आदर्शों पर ही दुनिया थमी है, नहीं तो कब की प्रलय आ गई होती। आज जब सुबोध बाबू दफ़्तर आये तो उनकी मुखमुद्रा कुछ भिन्न थी, कुछ परेशान से लग रहे थे। नियमित समय से कुछ देरी भी हो गई थी, सो आते ही सीधे अपने चैम्बर में चले गए। कर्मचारी आपस में फुसफुसा रहे थे कि आख़िर ऐसा क्या हुआ होगा जिसने बड़े बाबू को भी बेचैन कर दिया अन्यथा कितनी भी विपदा आये उनके माथे पर शिकन तक न आती थी। एक कर्मचारी ने अंदर जाकर पूछा की उन्हें कुछ चाहिए तो नहीं। उत्तर में बड़े बाबू ने सिर्फ़ नकारते हुए सिर हिलाया और फिर कागज़ात देखने लगे। पूरे दिन न जाने वह कैसे आत्मद्वंद से जूझते रहे पर किसी से कुछ कहा नहीं। कोई पूछता तो यही कहते सब ठीक है। आख़िर 5 बजे और सबने घर की ओर प्रस्थान किया।

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सुबोध दत्त की पहली पत्नी का स्वर्गवास हो चुका था। पहली पत्नी से उनकी एक पुत्री थी, नाम था वैदेही। अव्वल दर्जे की शरारती किन्तु कभी किसी का दिल नहीं दुखाती थी। किसी को रोता-बिलखता देखती तो स्वयं ही रो देती थी। उसी दिन का ज़िक्र लीजिये बुआ की विदाई के वक्त उन्हें रोते देखा तो मूढ़बुद्धि उनसे भी ज़्यादा रोने लगी। उसे रोता देख सब, सारा काम छोड़कर उसे ही चुप कराने में लगे रहे। सुबोध बाबू की इच्छा तो न थी पर घर वालों ने ज़ोर-ज़बरदस्ती कर दूसरा ब्याह करा दिया। उनकी अनिच्छा का कारण शायद ये भी था की भारतीय परिवेश में सौतेली माँ की जो परिभाषा दी जाती है, वह उन्हें वैदेही के लिए कदापि अनुकूल नहीं लगती थी।

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वैदेही मात्र 11 वर्ष की थी और वह डरते थे कि कहीं सौतेली माँ की छाया उसके निर्मल मन को मलिन न कर दे। किन्तु जब उनकी एक न चली तो मजबूरन विवाह करना पड़ा। दूसरी पत्नी का नाम था शैलजा। जैसा नाम वैसा ही व्यक्तित्व, अत्यंत शीतल। जब कभी क्रोधाग्नि प्रज्ज्वलित होती तो मानो उसका ह्रदय पिघलकर आँखों में आसुओं का रूप ले लेता था। किन्तु अपने स्वभाव को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने देती थी। और शायद यही बात थी जो सुबोध बाबू के दिल को भाती थी। वह उसे प्यार से शैल कहते थे। सुबोध बाबू दफ़्तर से घर आये तो शैल ने दौड़कर उनका झोला हाथ में ले लिया और आराम कुर्सी की ओर इशारा करते हुए बैठने को कहा। स्वयं भीतर पानी लेने चली गयी। दालान में मास्टर साहब वैदेही को पढ़ा रहे थे। डाँट-फटकार की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी। वैदेही के वार्षिक परीक्षा के परिणाम से असंतुष्ट थे। उसे कान पकड़कर सुबोध बाबू के पास लेकर आये और बोले कि कितनी भी मेहनत की जाए सब बेकार है, वैदेही के अंक टस से मस न होते थे। सुबोध बाबू ने एकदम से वैदेही को तमाचा मार दिया और उलूल-जुलूल बकने लगने।

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मास्टर साहब ने उनका ये रूप पहले कभी नहीं देखा था। मौका पाकर उन्होंने सुबोध बाबू को समझाया कि बच्चों पर हाथ उठाना ठीक बात नहीं और जाने की अनुमति मांगी। मास्टर साहब के जाते ही वैदेही रसोई की ओर दौड़ी। शैलजा ने उसे रोते देखा तो सीने से लगा लिया और आँचल से आंसू पोछते हुए समझाने लगी कि बाबू जी उसे बहुत प्रेम करते हैं, उनका क्रोध भी उसकी ही भलाई के लिए है। वैदेही छोटी ज़रूर थी पर यह अवश्य समझती थी कि उसके पिता की दुनिया उसी के चारों ओर घूमती थी। इसीलिए उन आंसुओ का कारण उस तमाचे से उत्पन्न पीड़ा नहीं बल्कि पिता को दुःख देने की आत्मग्लानि थी। वह खड़ी हुई और आंसू पोछते हुए माँ से बोली कि वह अगले वर्ष परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करेगी। माँ ने भी मुस्कुरा कर उसका माथा चूम लिया और भीतर कमरे में जाने को बोला।

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शैल पानी का गिलास लेकर सुबोध बाबू के पास आई। एक घूँट पानी पीकर उन्होंने गिलास बगल की मेज़ पर रख दिया और खड़े होकर शैल को आराम कुर्सी पर बैठने को कहा। शैल के माथे पर हाथ फिराते हुए उसे एकटक देखने लगे मानों कुछ कहना चाहते हों किन्तु जिव्हा शब्दों की मोहताज थी। शैल का बार-बार पूछना भी उनके मौन को तोड़ न सका। अंततः सुबोध बाबू की आंतरिक वेदना और सारे जवाब खुद में समेटे उनकी आँख से एक आंसू शैल के माथे पर गिरा। वह दृश्य ऐसा प्रतीत हुआ मानों उस एक बूँद में वेदना का सागर ही उड़ेल दिया हो। अब शैल से रहा नहीं गया और वह उठ खड़ी हुई, कसम देते हुए उनकी इस पीड़ा का कारण पूछने लगी। उन्होंने उसे सब स्पष्ट रूप से बताया। शैल के पैरों तले तो मानों ज़मीन ही खिसक गयी और वह उनसे लिपटकर कर रोने लगी। सुबोध बाबू ने उसे समझाया कि वह उनकी शक्ति है। अगर वो धीरज खोयेगी तो सब समाप्त हो जायेगा। शैल का दुःख असहनीय था। उसे कुछ भी उचित-अनुचित समझ नहीं आ रहा था। फिर भी सुबोध बाबू के कहने पर उसने आंसू पोछे और उनका हाथ थामकर उनके समीप बैठी रही।

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अगले दिन जब वैदेही विद्यालय से आई तो बाबू जी घर पर ही थे। मामा-मामी भी आये हुए थे और माँ कुछ सामान बांध रही थी। उसने उत्सुकता से पूछा तो शैल ने उत्तर में बस इतना ही कहा कि मामा-मामी उसे लेने आये हैं। वैदेही कुछ समझी नहीं और बाबू जी से पूछा तो उन्होंने डांटते हुए कहा कि अब तुम्हारी पढ़ाई यहाँ नहीं होगी। मामा उसे गोद में उठाकर समझाने लगे कि वहाँ खूब अच्छे विद्यालय हैं और वह भी अंग्रेजी माध्यम। अब उसका दाखिला वहां कराया जायेगा और वह उनके साथ रहेगी। वैदेही के लिए तो दुनिया के मायने उसके माँ-बाबूजी ही थे। उनके साथ के अतिरिक्त उसने कभी कुछ नहीं चाहा था। फिर भी वह कुछ नहीं बोली मानों भावनाओं के आवापोह ने उसे मौन कर दिया था। सुबोध और शैल भी अंदर ही अंदर कुढ़े जा रहे थे। वैदेही की खामोशी उन्हें अत्याधिक पीड़ा दे रही थी। माँ ने खाना खाने को बोला तो उसने इनकार कर दिया। अपना विरोध प्रकट करने का शायद उसे यही एक साधन उचित लगा। उसने माँ-पिता के पैर छुए और मामा-मामी के साथ प्रस्थान किया। ईश्वर ही जानता होगा की उस मासूम बच्ची ने अपना हृदय कैसे इतना कठोर कर लिया होगा कि एक बार भी घर को पलट कर नहीं देखा। उसे जाता देख शैल वहीँ चौखट पर बैठकर रोने लगी और बाबूजी के लिए तो उनकी दुनिया ही उनसे दूर जा रही थी।

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समय बड़ा बलवान होता है, वेदना कितनी भी सघन क्यों न हो समय की गोद में उसे विश्रांति मिल ही जाती है। वैदेही ने भी पढ़ाई-लिखाई से अपना मन जोड़ लिया। माता-पिता के बिछोह नें उसे समझदार और कर्तव्यनिष्ठ बना दिया था। किन्तु इस बीच प्रतीत होता था मानों उसका बचपन ही खो गया हो। एक ही सवाल उसके मन को हमेशा कचोटता रहता कि आख़िर ऐसी क्या वजह रही होगी जो माँ-बाबूजी ने ऐसा निर्णय लिया। धीरे-धीरे तीन साल बीत गए। इस बीच माँ तो चिट्ठी लिखती रही किन्तु कभी बाबूजी का कोई सन्देश नहीं मिला। ख़त की लिखावट में हमेशा एक बनावटीपन झलकता था। एक दिन समाचार ज्ञात हुआ की सुबोध दत्त नहीं रहे। पिता की मृत्यु का समाचार सुन वैदेही स्तब्ध रह गई। दुःख और वियोग इतना था कि मानों आसुओं ने विद्रोह कर दिया और अकस्मात ही सूख गए। वैदेही ज्यों का त्यों ही आधी रात्रि में मामा-मामी के साथ घर को निकल पड़ी। भोर होते-होते वे घर पहुँचे। पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के बाद उसे क्रियाकर्म के लिए ले जाया गया। वैदेही अपने पिता से लिपट कर रोना चाहती थी और अपने प्रश्नो का उत्तर चाहती थी कि आख़िर क्या गुनाह हुआ उससे कि अपने अंतिम वक्त में भी बाबूजी ने उसे समीप नहीं आने दिया। वह चुपचाप उस आराम कुर्सी के पास जाकर बैठ गई जहाँ उसके बाबू जी दफ़्तर से आकर बैठते थे और आवाज़ लगाकर पूछते की उनकी बिटिया रानी कहाँ है और वह एकदम से दौड़ कर आती और उनकी गोद में चढ़कर बैठ जाती। यही सब सोचकर वह कभी हंसती तो कभी यथार्थ को कोसती हुई रो पड़ती। तभी शैलजा वहां आई और वैदेही के हाथ में एक चिट्ठी थमाकर बोली कि उसके सुबोध बाबू की है। कुछ अधिक बोल पाती इससे पहले ही रो पड़ी, और वहां से चली गयी। वैदेही ने आंसू पोंछते हुये चिट्ठी खोली...

प्रिय वैदेही,
मैं जानता हूँ तुम्हें मुझसे तमाम शिकायतें होंगी और तुम्हारी हर शिकायत के लिए मैं खुद को ज़िम्मेदार समझता हूँ। पर एक बात हमेशा याद रखना कि तुम्हारे माँ-बाबूजी तुम्हें बहुत प्यार करते हैं। तुम्हारे लिए घर से दूर यह समय बहुत दूभर रहा होगा। जिस उम्र में हमारा फ़र्ज़ था की हम तुम्हें सही-गलत समझाए उसी उम्र में हमने तुम्हें खुद से अलग कर दिया। पर बेटी ईश्वर के आगे हम सब बेबस हैं। शायद तुम्हें याद हो कि जब मैंने तुम्हें ख़राब परिणाम आने पर बहुत बुरा भला कहा था और तुम पर हाथ भी उठाया था। उसमें बेटी तुम्हारा कोई कुसूर नहीं था और हो सके तो मेरे इस अपराध के लिए मुझे क्षमा करना। उसी रोज़ की बात है, मैं सुबह अपनी कुछ रिपोर्ट लेने डॉक्टर के पास गया था। डॉक्टर ने बताया कि मुझे ‛कैंसर’ था और दवाइयाँ कुछ ही दिन तक इस शरीर को संभाल सकती थी। इससे पहले की तुम्हें इसकी ख़बर लगती मैंने तुम्हें अपने से दूर कर दिया। तुम बिना कुछ बोले, बिना कुछ कहे यहाँ से चली गयी। बेटी!  मैं नहीं चाहता की मृत्यु का जो आभास मैं प्रत्येक पल करूँ तुम उसका साक्षी बनो। इस पीड़ा और वेदना की छाया भी मैं तुम्हारे ह्रदय पर पड़ने नहीं देना चाहता था। मैंने अपने इस फैसले से तुम्हारी माँ को भी बहुत दुःख पहुँचाया है। वह तुमसे बहुत प्यार करती हैं शायद इतना कि तुम्हारी अपनी माँ भी न कर सकती।मेरे बाद उनका हमेशा ख़याल रखना। अब तुम समझदार हो बेटी, अपने पिता की इस मूर्खता का जैसा भी फैसला करो मुझे स्वीकार है।
तुम्हारे बाबूजी...

चिट्ठी पढ़कर वह तुरंत शैलजा के पास गई, कुछ कहती इससे पहले ही शैलजा ने उसे सीने से लगा लिया। उस पल अगर दोनों एक दूसरे से कुछ कहते भी तो शायद शब्दों में इतना सामर्थ्य ही न था कि इतने वर्षों की पीड़ा व्यक्त की जा सके। दोनों की आँखों से निरंतर आंसू बह रहे थे और उस हर अभियक्ति को जिसे शब्द नहीं बाँध सकते, उसे सार्थकता प्रदान कर रहे थे।
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