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आप मान लीजिए, 2500 की भीड़ सांसद एहसान जाफ़री के घर के आगे डांडिया खेलने गई थी !

- शाह इफ्तिखार 

28 फरवरी 2002 को 2500 लोगों की भीड़ ने राज्यसभा सांसद मरहूम एहसान जाफ़री के बंगले को घेर लिया और 69 लोगों को काट कर जला दिया। मरने वालों में एक 20 दिन का नवजात बच्चा भी था और एक गर्भवती औरत भी थी, जिसका पेट चीर कर दंगाइयों ने भ्रूण को तलवार की नोक पर उछाल दिया। लेकिन मामले की सुनवाई कर रहे जज पी बी देसाई ने कहा की लाठी, पेट्रोल बम और तलवार से लैस 2500 की भीड़ एहसान जाफ़री के बंगले के बाहर सिर्फ पत्थर फेंकने और गाड़ियों को जलाने के लिए जमा हुई थी। एहसान जाफरी द्वारा बंगले की छत से गोली चलाए जाने के बाद भीड़ उग्र हो गई इसलिए गलती एहसान जाफरी की थी।

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जज ने ये बातें किस अनुभव के आधार पर कहीं हैं ये सोचना आपका काम है। इसी घटना में हुए बलात्कार के बारे में जज ने ये कहा की "भला इतनी भीड़ में बलात्कार कैसे हो सकता है?" जज साहब को सामूहिक बलात्कार नहीं मालूम था शायद।

बताते चलें कि इसी शहर अहमदाबाद के दूसरे मोहल्ले नरोदा पाटिया में इसी समय हुई ऐसी ही घटना की सुनवाई करते हुए कोर्ट को मजबूरन मानना पड़ा था की इस घटना की पूरी प्लांनिंग हुई थी। क्योंकि एक स्टिंग ऑपेरशन में मुख्य अभियुक्त बाबू बजरंगी ने पुलिस इंस्पेक्टर से लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्री मोदी तक का नाम लेते हुए बताया था की कैसे प्रशासन ने दंगा करने में उनकी मदद की।

जब कोई अपराध प्लांनिंग (criminal conspiracy) के साथ किया जाता है तो उसके लिए और ज़्यादा कड़ी सज़ा दी जाती है। सरकार से जुड़े लोगों को भी जवाबदेह होना पड़ता है। इसी कारण नरोदा पाटिया मामले में नेता से लेकर तत्कालीन एमएलए माया कोडनानी तक को सज़ा हुई।

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गुलबर्ग मामले में कोर्ट द्वारा criminal conspiracy को स्वीकार नहीं करने के पीछे असल में बड़े नेता, प्रशासन तथा तब गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी को बचाने की साज़िश है। इसलिए आप मान लीजिए कि लाठी तलवार लेकर 2500 की भीड़ एहसान जाफ़री के घर के आगे डांडिया खेलने गई थी। बोर हो जाने पर उस भीड़ ने 69 लोगों को काट कर जला दिया और कुछ औरतों का बलात्कार कर डाला। 
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