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कैराना को 'कश्मीर' बताकर नफरत की भट्टी में झोंकने वालों से सावधान रहें

-अजीत सिंह

कैराना को कश्मीर बताकर नफरत की भट्टी में झोंकने वाले लोगों के लिए ये बातें कतई मायने नहीं रखतीं। बाकि लोग इन तथ्यों पर गौर कर सकते हैं-

1. मेरा परिवार मुज़फ्फरनगर जिले के एक गांव में रहता है। पिताजी खेती कराते हैं और माँ बड़े-बड़े गौरक्षकों से ज्यादा गायों की देखभाल करती हैं। मैं भी तक़रीबन हर महीने ही गांव जाता हूँ। यकीन मानिये अपराध की कहीं भी हो सकने वाली घटनाओं को छोड़कर हालात सामान्य हैं। पूरे देश में गुंडागर्दी का जितना बोलबाला है, उसे देखते हुए हालात का सामान्य होना ही बड़ी बात है।

2. 1992 में बाबरी विध्वंस और 2013 के मुज़फ्फरनगर दंगों के बाद हिन्दू-मुस्लिम समुदाय के बीच दूरियां बढ़ीं। कैराना भी अपवाद नहीं है। जिन गांवों में मुस्लिम कम थे वो आसपास के कस्बों में जाकर बसने लगे। हिन्दू खासकर कस्बों में रहने वाले बनियों ने शहरों और महानगरों का रुख किया। फिर भी दंगों की वजह से घर-बार छोड़ने वाले मुस्लिम परिवारों के मुकाबले हिन्दू परिवारों की तादाद बेहद कम है।

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3. पश्चिम यूपी के कैराना जैसे मुस्लिम बहुल कस्बों में रहने वाले कई बनियों, जैनियों को जनता हूँ जिनकी अगली पीढ़ी विदेश तक पहुँच चुकी है। ये परिवार गांव-कस्बों से निकलकर मुरादाबाद, मेरठ, बरेली या दिल्ली एनसीआर में बस चुके हैं। जो लोग लव को जेहाद बता चुके हैं। वे कैराना को भी कश्मीर बता सकते हैं। कौन रोक लेगा?

4. पूरे देश में आबादी का गांव, कस्बों से महानगरों की तरफ पलायन हो रहा है। पढाई-लिखाई, रोजगार और बेहतर मौकों व सुविधाओं की तलाश में लोग महानगरों का रुख करते हैं। इनमे सभी धर्मों के लोग शामिल हैं लेकिन संपन्न वर्ग की तादाद ज्यादा है। आप किसी भी कसबे को छोड़ चुके किसी भी समुदाय के लोगों की सूची बना सकते है। यकीन मानिए, ये लिस्ट हुकुम सिंह की लिस्ट से ज्यादा सही होगी।

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5. कई दशकों से मुज़फ्फरनगर में अपराध का बोलबाला रहा है। लोकल अखबार हत्या, लूट, अपहरण की ख़बरों से भरे रहते है। यहाँ हाल के वर्षों तक आपसी रंजिश का बोलबाला था। लेकिन राजनीतिक दलों की मेहरबानी से लचर कानून व्यवस्था को धार्मिक उन्माद और नफरत ने हाइजेक कर लिया है।
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