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'गुलबर्ग सोसायटी का फैसला इंसाफ नहीं, न्यायालय में किया गया न्याय का बलात्कार है'

- मो. जाहिद

किसी व्यक्ति को शासन हथियार के लाइसेंस क्यों देता है? क्योंकि वह अपनी जान की रक्षा कर सके। आत्मरक्षा में की गयी हत्या भी अक्सर अदालतों की दृष्टि में उचित लगी हैं और उस व्यक्ति को बाइज़्ज्त बरी कर दिया गया है। ऐसे उदाहरण इस देश में हजारों हैं।

गुलबर्ग सोसायटी में 69 लोगों को जलाकर भून देने वाली हजारों की भीड़ में जो मुट्ठी भर पकड़े गये आरोपी लोग थे उनमें उस भीड़ के नेतृत्वकर्ता भाजपा सभासद और अन्य 35 लोगों को जस्टिस देसाई की अदालत ने पहले ही बाइज़्ज्त बरी कर दिया है। शेष 26 लोगों को लाभ पहुँचाने की कार्रवाई की गयी, जिनमें 7 वर्ष की सजा वाले जेल में इतने दिन बंद होने के आधार पर रिहा हो जाएंगे और बाकी 10 उम्रकैद पाए लोगों के लिए कोर्ट के आदेश में संभावनाएँ जीवित करते हुए फैसला दिया गया है, जिससे ऊपरी अदालत द्वारा उनकी उम्रकैद की सजा को चुनौती देकर उनको भी रिहा कराया जा सके।

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दरअसल यह फैसला न्यायालय द्वारा दिया न्याय नहीं, बल्कि "न्यायालय द्वारा किया गया न्याय का बलात्कार" है। ऐसा बलात्कार हर उस फैसले में होता है, जिसमें पीड़ित पक्ष मुस्लिम होता है। भागलपुर में हजारों मुस्लिमों की हत्या पर कोई दोषी साबित हुआ? नहीं, हाशिमपुरा में 42 मुसलमानों की नहर पर ले जाकर पीएसी द्वारा की हत्या का कोई हत्यारा दोषी सिद्ध हुआ? नहीं, मुरादाबाद मस्जिद में ईद की नमाज पढ़ते निहत्थे नमाजियों पर पीएसी द्वारा की गोलीबारी में 270 लोगों से अधिक मुसलमान ईदगाह में मारे गये, कोई हत्यारा पकड़ा गया और सजा हुई? नहीं। वाराणसी दंगे के केन्द्र मदनपुरा में पुलिस की गोलियों से मारे गये मुसलमानों का कोई हत्यारा आजतक दोषी सिद्ध हुआ? नहीं। मेरठ, मलियाना, कानपुर, इलाहाबाद, मुम्बई के तीन तीन दंगों और अभी 4 साल पहले हुए मुजफ्फरनगर दंगों में किसी हत्यारे को सजा हुई? नहीं।

यह सब तो छोड़िए उच्चतम न्यायालय के आदेशों का बलात्कार और संसद की गरिमा का चीरहरण करके गिराई गयी "बाबरी मस्जिद" के दोषियों को सजा हुई? नहीं हुई। अदालत अपनी अवमानना पर ही एक दिन की पिकनिक जेल में मनाने की सजा देती है तो न्याय की बात बेमानी ही है। इस देश की अदालतों से।

यदि ऐसी ही घटनाओं में अल्पसंख्यक सिखों के विरुद्ध हुई 1984 की 2500 हत्याएँ भी शामिल करूँ तो कोई हत्यारे को सजा हुई? नहीं। फिर गुजरात में 3000 लोगों का कत्लेआम, कोई सजा हुई? नहीं। हालाँकि दो की सजा कम और लीपापोती अधिक हुई। माया कोडनानी और बाबू बजरंगी जैसे सैकड़ों हत्याओं के दोषी आज उम्रकैद की सजा के बाद भी आजाद घूम रहे हैं। देश में ऐसे हजारों दंगों में मारे गये मुसलमानों के हत्यारों का यह अदालत कुछ ना कर सकी। इसके बावजूद कि बाल ठाकरे जैसे तमाम हत्यारे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कत्लेआम का खुद श्रेय लेकर अपनी मर्दानगी दिखाते रहे हैं। नरेन्द्र मोदी भी। दुनिया जानती है कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री गुजरात का विकास करके नहीं "गुजरात नरसंहार" करके बने हैं। यही उनकी छवि है, जिसे वह स्वयं भी बनाए रखना चाहते हैं।

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हाँ "गोधरा काँड" में जो कि अब संघियों का कैराना और मुजफ्फरनगर काँड देखकर यह निश्चित ही हो गया है कि यह काँड भी संघियों की साजिश का हिस्सा था। 31 लोगों को 2011 में दोषी करार दिया गया, उनमें 10 को फाँसी और 21 को उम्रकैद की सजा सुनाई गयी। वह भी मुकदमा प्रारंभ होने (2009) के बाद मात्र 2 वर्ष के अंदर।

दरअसल इस देश में मुसलमानों के लिए न्याय है ही नहीं। उसका प्रमाण गुलबर्ग सोसायटी का अदालती निर्णय है, जिसमें जस्टिस देसाई ने एहसान जाफरी के गोली चलाने को वह कारण माना जिससे भीड़ उग्र हो गयी। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि अदालत के पास एहसान जाफरी के गोली चलाने के संबंध में ना कोई गवाह है ना सबूत। पूरी अदालती कार्यवाही में किसी बचाव पक्ष ने भी ऐसा सबूत प्रस्तुत नहीं किया। ना तो यह बिन्दु ही कभी आया। जो गोली चली ही नहीं उस "गोली" को चलाने का वर्णन अपने आदेश में करके जस्टिस देसाई ने अप्रत्यक्ष रूप से दोषियों के ऊपरी अदालत मे छूटने का रास्ता साफ कर दिया।

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यह अदालत द्वारा "न्याय के साथ किया बलात्कार है" ऐसा इस देश में सदैव होता रहा है, जब पीड़ित मुसलमान या मुस्लिम समाज रहा है और यह सब देखकर भी मुसलमान अदालत के फैसले का सदैव सम्मान करने को कहता रहा है। बाबरी मस्जिद के मुकदमे में भी जहाँ वह उच्चतम न्यायालय की औकात देख चुका है।

यह सब देखकर भी उसे भारत के लोकतंत्र, विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका में भरोसा है तो क्या कहेंगे इसे? सहनशीलता? जब मैं कहता हूँ कि "मुसलमान इस देश का सबसे सहनशील समाज है नहीं तो इस देश में गृहयुद्ध हो जाता" तो मिर्ची क्यों लगती है? (लेखक की फेसबुक वॉल से लिए गये यह उनके निजी विचार हैं)
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