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अगर पुलिस बलात्कार करती है तो हमारी जिम्मेदारी है कि हम उस क्रूरता का विरोध करें

-हिमांशु कुमार

अभी एक खबर दिखाई दी कि गाय लेकर जाने वाले दो व्यापारी युवकों को पकड़ कर मारा पीटा गया और उन्हें गोबर खिलाया गया। दोनों युवक पानी के साथ गोबर निगल रहे थे और उल्टियां करते जाते थे पढ़ते-पढ़ते मेरा मन खराब हो गया। हम इतने क्रूर कैसे हो सकते हैं? उस पोस्ट पर नीचे कुछ हिंदू वीरों के कमेन्ट भी थे। एक साहब लिखते हैं कि अगर सऊदी अरब में कोई सुअर की तस्करी करता तो उसके साथ क्या किया जाता? यानी वह भाई कह रहे हैं कि अगर हम क्रूर हैं तो क्या हुआ? अरबी लोग भी तो क्रूर हैं। यानी अरबी लोग क्रूर हैं इसलिए हम भी क्रूर बन सकते हैं। यानी दुनिया में अगर कहीं भी बुराई है तो हम भी उतने बुरे बन जायेंगे। सऊदी अरब की सरकार की क्रूरता उनका नुकसान करेगी। हमारी क्रूरता हमारा नुकसान करेगी।

कुछ दिन पहले मैं युवाओं के एक प्रशिक्षण में शामिल था। जाति कुव्यवस्था पर एक फिल्म ‘इण्डिया अनटच्ड’ दिखाई गयी। फिल्म के बाद एक लड़की नें कहा कि गुजरात में दलित भी आपस में भेद भाव करते हैं। जाटव भी बाल्मीकी के साथ छुआछूत मानते हैं। मैंने कहा कि जाटव और बाल्मीकी के बीच की छुआछूत उनकी समस्या है, जिसे उन्हें खुद दूर करना है। आपके दिमाग में घुसा हुआ जातिवाद आपकी अपनी समस्या है। आप अपनी समस्या दूर करिये, उनकी समस्या वह खुद दूर करेंगे। आप यह नहीं कह सकते कि जब तक जाटव और बाल्मीकि अपना जातिवाद दूर नहीं करंगे तब तक मैं जातिवादी बनी रहूंगी। हम खुद की बुराइयों को जारी रखने के लिए क्या क्या बेकार के तर्क देते हैं?

इसी तरह पुलिस और सरकार की क्रूरता पर चर्चा शुरू करते ही लोग नक्सलियों की क्रूरता की चर्चा करने लगते हैं। वे बहुत चालाकी के साथ सरकार और पुलिस की क्रूरता के बारे में चर्चा बंद करना चाहते हैं। पुलिस और सरकार की क्रूरता असल में हमारी अपनी क्रूरता है। हम सरकार को वोट देते हैं और पुलिस हमारे टैक्स के पैसे से तनख्वाह से काम करती है। हमारे पैसे से चलने वाली पुलिस अगर बलात्कार करती है तो जिम्मेदारी हमारी बनती है कि हम उस क्रूरता का विरोध करें। लेकिन लोग उस क्रूरता पर बात करने से बचने के लिए हमेशा चालाकी करने लगते हैं।

अभी हाल ही में मडकम हिड़मे के साथ पुलिस वालों नें बलात्कार करके उसकी योनि में चाकू डाल कर नाभि तक चीर दी थी। हम दिल्ली के दामिनी कांड में उस लड़की के साथ हुई क्रूरता पर मोमबत्तियाँ जलाते हैं और जब हमारे पुलिस वाले बस्तर में आदिवासी लड़की के साथ वैसी ही क्रूरता करते हैं तो हम उस पर चर्चा करने से बचना चाहते हैं। तब हम जान बूझ कर नक्सलियों की चर्चा शुरू कर देते हैं। हमारी क्रूरता हमारे लिए नुकसान दायक है। नक्सली अगर क्रूर हैं तो वो खुद उसका नुकसान उठाएंगे। आप यह नहीं कह सकते कि हम असल में इसलिए क्रूरता करते हैं क्योंकि नक्सली क्रूरता करते हैं। अपनी गलती को दूसरे की गलती की आड़ में छिपाना बंद कीजिये। खुद को धोखा देना बंद कीजिये।
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