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प्रधानमंत्री के नाम खुला ख़त, नेहरू की गलती आप स‌ुधार स‌कते हैं, क्या आप ऎसा करेंगे?

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

1984 में राजीव गांधी की सरकार के बाद 2014 में आपकी ही एक ऐसी सरकार आई जिसे प्रचंड बहुमत मिला। ठीक 1984 की तरह 2014 का चुनाव भी आपके नाम पर जीता गया। आप जिसे चाहे जिता सकते थे और जिताया भी। पिछली लोकसभा में मान्यवर आपका जलवा ऐसा था कि आपने जिस कंकर पर भी हाथ रख दिया वह शंकर हो गया। भाजपा के सारे बड़े दिग्गज आपके समक्ष नतमस्तक हो गए और न कोई नेता रहा न पार्टी जो मोदी जी का सामना करने में सक्षम होती। अब जब आप देश को कांग्रेस मुक्त करने और नेहरूवादी परंपराओं से आजाद करने की बात करते हैं तो यकीनन लगता है कि आप कुछ ऐसा करेंगे जिससे देशवासी लाभान्वित होंगे।

नेहरू ने अपने समय में एक बहुत बड़ी भूल की थी वह यह कि लोक कल्याण के क्षेत्र में सरकारी सेवाओं के साथ-साथ गैर सरकारी सेवाओं को थोपकर। इन गैर सरकारी सेवाओं ने भ्रष्टाचार और अपनी धूर्तता से सारी सरकारी सेवाओं को फेल कर दिया है और यह होना भी था। पर नेहरू जी उस वक्त इसे भांप नहीं पाए थे। इसे आप प्रधानमंत्री जी समाप्त कर सकते हैं। आपके पास अब भी समय है कि आप देश मे शिक्षा और स्वास्थ्य का कंपलीट राष्ट्रीयकरण कर दें। जिस तरह मंहगे शिक्षा संस्थान और मंहगे डॉक्टर व अस्पताल देश की जनता को लूट रहे हैं उससे निजात तो मिलेगी। 
अभी एक बड़े स्वास्थ्य बिजिनेस घराने के बहुचर्चित और बहुत मंहगे अस्पताल फोर्टीज में एक मरीज की जिस टांग का आपरेशन होना था उसकी बजाय दूसरी एकदम ठीक टांग को काट डाला गया, उसका खामियाजा कौन भरेगा? सरकार को चाहिए कि फोर्टीज का लाइसेंस रद्द कर दे और उन डॉक्टरों का लाइसेंस भी जिन्होंने यह आपरेशन किया। यह मानवीय त्रुटि नहीं बल्कि लापरवाही है। दिल्ली के सारे मंहगे अस्पताल मरीज को आपरेशन की सलाह देते हैं पर सत्य यह है कि उनके पास अच्छे सर्जन नहीं है। वे बस चोट्टे कोचिंग संस्थानों की तरह नामी डॉक्टरों का फोटो दिखाकर प्रचार करते हैं कि हमारे यहां ये-ये डॉक्टर बैठते हैं पर हकीकत यह है कि उनके यहां फ्लोर पर जो डॉक्टर होते हैं वे उन्हीं प्राइवेट मेडिकल कालेजों से पढ़कर आए होते हैं जिनके पास न तो फैकल्टी होती है और न ही लैब। धन कुबेरों के ये बालक अपने पालक की ओर ही निहारा करते हैं और इन्हें आता-जाता कुछ नहीं सिवाय नोट छीनने के। इन्हें डाक्टरी विद्या का क ख ग भी नहीं पता होता। एनसीआर के लगभग सभी नामी अस्पतालों में झोलाछाप डॉक्टर टहला करते हैं और उनका मकसद होता है कि दूर-दराज से आए मरीज को पकड़कर ओटी में लिटा देना। इसके बदले में उन्हें मोटा कमीशन मिलता है। इन सारे प्राइवेट अस्पतालों के आपरेशन थियेटर इन्फेक्टेड होते हैं।

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भारत अकेला ऐसा देश है जहां पर उपभोक्ता ही सबसे गरीब प्राणी होता है और उसके हितों की परवाह किसी को नहीं होती। डॉक्टर बस नोट गिनने में मगन रहते हैं। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण जरूरी है।

दूसरा क्षेत्र है शिक्षा। प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई का स्तर लगभग वही होता है जो सरकारी स्कूलों का परप्राइवेट स्कूल औसतन चार से दस हजार तक तो सिर्फ शिक्षण शुल्क ही वसूलते हैं और हर पैरेंट्स-टीचर मीटिंग उनके यहां पैरेंट्स को कहा जाता है कि बच्चे का ट्यूशन कराओ। जब बच्चे को ट्यूशन से ही पढ़ाना है तो सरकारी स्कूल क्या बुरे हैं? पर सरकार अब सरकारी क्षेत्र वाले स्कूलों को खोलने से अंगूठा दिखाती है।

मोदी जी अगर आप इतिहास में अपना नाम अमर करना चाहते हैं तो इन क्षेत्रों पर ध्यान दें। भारत एनएसजी का मेंबर बने या न बने अथवा चीन उसकी दो-ढाई किलोमीटर जमीन दबा ले या भारत उपग्रह छोड़े या न छोड़े आदि चीजों से कुछ नहीं बनता-बिगड़ता लेकिन यदि आप पीडि़त लोगों को दुख से उबार नहीं पाए तो आप में और नेहरू में कोई फर्क नहीं है और मैं तो कहूंगा कि आप नेहरू की लीगेसी को ही आगे बढ़ा रहे हैं मोदी जी।

सादर
शंभूनाथ शुक्ला 

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