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पूर्व प्रेमिका के नाम एक प्रेमी का ख़त, वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ, जो आसानी से हो जाये !

-अवनीश कुमार

डिअर भूतपूर्व डार्लिंग,
बहुत दिनों के बाद तुम्हे खत लिख रहा हूँ। शायद 7-8 सालों के बाद। तुम्हें अनेक पत्र लिख चुकने के बाद भी इस पत्र को लिखने में मुझे बारहा (बार-बार) सोचना पड़ रहा है। क्या लिखूं और क्या रहने दूं? सब कुछ पत्र में नहीं समेटा जा सकता, पर तब भी कोशिश करूँगा वो सब लिखूं जो तुम चाहती थी। अगर मुझे लिखना हो तो लिखूं। हम दोनों एक कच्ची उम्र में मिले थे। महज़ आकर्षण कैसे प्यार में तब्दील हो जाता है, ये मैंने तुमसे मिलकर जाना। तुम्हारी रेगिस्तान जैसी चमकती आँखों में आँखें डालकर मैंने कहा था "मैं तुम्हे like करता हूँ।" उस वक़्त हमारे शहर में like को ही "love" समझा जाता था। सब कुछ इतना आसान नहीं था, पर वो कहते हैं न...

"वो काम भला क्या काम हुआ, जिसमें साला दिल रो जाये, 
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ, जो आसानी से हो जाये !

तो खैर, मेरे सो कॉल्ड प्रपोजल के बाद तुमने अपने घर के लैंडलाइन का नंबर दिया (जो कि मुझे पहले से ही पता था) और यहीं मेरे मन ने कहा "जब मियां-बीवी राज़ी, तो क्या करेगा क़ाज़ी। शुरुआत के कुछ दिन जैसे-तैसे बेचैनी में कटे, फिर उसके करीब डेढ़ साल बाद हम पहली बार ऑफिशियली प्रेमी-प्रेमिका की तरह चंद समय के लिए मिले। तुमसे एक बार मिलकर, बार-बार मिलने की चाहत कुछ ऐसी ही थी, जैसे प्रेमिका के एक चुम्बन के बाद कई चुम्बन बाकी रह जाते हैं। जब भी याद आता है तो शर्म आती है, अब ये सोचकर की कैसे तुमसे पहली बार मिलने के बाद मुझ जैसे बड़बोले आदमी का भी गला सूख कर काठ हो गया था, हाँथ-पाँव काँप रहे थे और गले से आवाज़ नहीं निकल पा रही थी !

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मैंने आज भी संभाल कर रखा है कागज का वो टुकड़ा जिसमें तुमने लिखा था, मुझे तुमसे मोहब्बत है

एक आशिक आसमान में उड़ते हुए उस बाज़ की तरह होता है, जिसकी परछाई जमीं के सीने पर पड़ती है, बिलकुल साये की तरह। साया हमेशा इंसान के साथ होता है, एक आशिक भी उसी तरह होता है। उस पहली मुलाकात को लिखने बैठूं तो एक मुकम्मल उपन्यास तैयार हो जाये, पर मेरा यकीं मानों मैं इस पत्र के माध्यम से वो सब लिखना ही नहीं चाहता था जो ऊपर लिख चुका हूँ। जो भी लिख चुका हूँ वो सब बस भूमिका या यों कहो इतल्ला का हिस्सा है। अभी ये पत्र यहीं समेट रहा हूँ, क्योंकि लेटर अगर फैलता जाए तो उसे पढ़ने वाले बोरियत फील करने लगते हैं। आगे के पत्र में शायद वो सब लिख पाऊं, जो लिखने की तमन्ना है। अभी मीर साहब के इस शेर के साथ खुदा-हाफ़िज़...

"जी में क्या -क्या है अपने ये हमदम 
पर सुखन बा -तलब नहीं आता।"
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