Top Letters
recent

'सुंदर दिखने के लिए कपड़े उतारना जरूरी नहीं, बिना कपड़े उतारे भी ये लड़की कमाल लग रही है'

-मनीषा पांडेय

ये गाना देखिए और इस शानदार लड़की गिन्नी माही को भी। लेकिन अभी मैं इसके दलित विमर्श पर बात नहीं करूंगी। वो तो है ही। मैं बात करना चाहती हूं इस लड़की के कपड़ों पर। लेकिन मैं उस तरह से भी बात नहीं कर रही, जैसे दादी-नानी करती हैं- "तनि इ हिरोइन के बिलाउज त देख कहां जात बा। इनका तनकौ लाज नाहीं।"

नहीं। मैं दादी के नजरिए से नहीं देख रही। मैं अपने नजरिए से देख रही हूं, क्योंकि मुझे उन कपड़ों पर सख्त एतराज है, जिसे यो यो हनी सिंह और बादशाह अपने गानों में लड़कियों को पहनाकर खड़ा कर देते हैं और फिर नाच ले बेबी गाना गाते हैं। मुझे प्रॉब्लम है, उन कपड़ों से जिन्हें ऐसे-ऐसे एंगल से काटा गया होता है कि औरत इंसान नहीं, सिर्फ एक खास सांचे में ढला शरीर नजर आती है।

इसे भी पढ़ें...
मैं अपनी कोई भी तस्वीर हंसते हुए नहीं खिंचवाती थी !

 मुझे प्रॉब्लम है क्लीवेज दिखाने वाले कपड़ों से क्योंकि  मैं चाहती हूं कि आदमी मेरे ब्रेस्ट ताड़ने के बजाय मेरी  आंखों में देखकर बात करे। मुझे प्रॉब्लम है उन सारे  अधकटे, छोटे, नंगे, बदन दिखाऊ कपड़ों से, जो इतने  टाइट और अनकम्फर्टेबल होते हैं कि आप इंसान की तरह चल भी नहीं सकते।

मेरी कजिन नानी को एक बार मॉल घुमाने ले गई। ऐसी कोई चीज उन्होंने पहले कभी देखी नहीं थी। वह लौटकर कहती हैं, "दुनिया कहां जात बा बिटिया। आदमियन क देख, फुल कपड़ा पहिरे हैं और लड़कियन चड्ढी पहिर पहिर घूमत बा।" नानी की बात सुनकर हंसी आती है। हमने उनका नाम 'खाप पंचायत' रख दिया है। लेकिन सच तो ये है कि चड्ढी (हालांकि उस कपड़े का असली नाम 'हॉट पैंट' है) पहनकर बाजार में घूमने वाली लड़कियों को मैं भी अचरज से ही देखती हूं।

कम उम्र बहनें थोड़े दिन में मेरा नाम भी 'खाप पंचायत' रख देंगी। वो कहती हैं, उसको कोई प्रॉब्लम नहीं है क्लीवेज दिखाने से। आपको बड़ी प्रॉब्लम है। हां, मुझे है प्रॉब्लम क्योंकि वो मर्दों के बनाए बाजार के ट्रैप में अपना क्लीवेज दिखा रही है। अपने शरीर के साथ सहज होती तो ये नहीं करती। तुम पूरे कपड़े उतारकर बीच पर लेट सकती हो, घर में घूम सकती हो, लेकिन तुम्हारे कपड़ों पर चल रही हर उस कैंची को शक की निगाह से देखो, जिसका टेलर पितृसत्ता का बनाया बाजार है। वो ढूंढ-ढूंढकर वो एंगल काटेगा कि तुम सबसे ज्यादा बिकने वाला माल नजर आओ।


तुम उतार सकती हो अपने सारे के सारे कपड़े, लेकिन धूप खाने, हवा खाने के लिए। खुद को आईने में निहारने के लिए भी। ये देखने के लिए कि कितनी सुंदर हो या कि कितनी मोटी होती जा रही हो। छह महीने में एक बार ब्रेस्ट कैंसर की पड़ताल करने के लिए भी। लेकिन बाजार के कहने पर नहीं। आदमी के लिए भी उतार सकती हो सारे कपड़े। खुद अपनी मर्जी से, बिना डरे, बिना सकुचाए। लेकिन उसके "शैंपेन के शावर में" नाचने के लिए नहीं। देखो न, गिन्नी माही बिना कपड़े उतारे भी कमाल लग रही है। सुंदर दिखने के लिए कपड़े उतारने की जरूरत नहीं होती। [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
Myletter

Myletter

Powered by Blogger.