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सरहद पर शहीद हो गया लाल, नहीं आएगी फौजी की चिट्ठी, कभी नहीं खत्म होगा मां का ये इंतजार !

-कामिनी पाठक

पिछले साल फौज की भर्ती में केशव का भी चयन हो गया। हट्टा-कट्टा, लम्बा-चौड़ा शरीर। गांव में पिताजी की अच्छी खासी पूछ-परख थी क्योंकि मास्टरजी जो थे। माता जी भी आठवीं कक्षा पास थीं। फौज की नौकरी में हौसला और जुनून जरूरी है। पोस्टिंग हिमालय की तराइयों में, जहां माइनस डिग्री सेल्सियस में तापमान होता है। जहां फौजियों को, सिर्फ फौज के वायरलेस की सुविधा होती है बस। बेस में सिर्फ परिजनों की चिट्ठियां पहुँचती थीं। देश की सेवा के लिए केशव के पिताजी, यानी मास्टर जी, हमेशा प्रेरित किया करते थे। केशव मास्टर जी का एकलौता बेटा था। मास्टर जी का रिटायरमेंट होने को था। जब भी स्कूल से घर आते, चारपाई पर बैठकर गांव के बच्चों को पढ़ाते थे। गांव के अन्य कार्यों में भी हाथ बंटाते थे। बाकी समय वो रेडियो पर समाचार, भजन, गीत, कृषि सम्बन्धी समाचार सुनकर खेती-बाड़ी वाले किसानों को सुझाव देते थे। केशव की एक ही चिठ्ठी पहुंचती थी, महीने में माता-पिता के नाम। दूर होने पर उसको अपने माता-पिता की बहुत चिंता होती थी। याद भी आती थी।

केशव की माता जी तो अपने बेटे के लिए आँसू बहाती थी, याद करके। उनको हमेशा चिट्ठी का इन्तजार रहता था। जैसे ही डाकिया बाबू दिखाई देते, झट से जाकर पूछती कि केशव की कोई चिट्ठी आई है? ना सुनकर माता जी का चेहरा उतर जाता था। जिस दिन बेटे की चिट्ठी आती, वो ख़ुशी से भावुकता वश पूरे मोहल्ले में बताती थीं देखो! मेरे लल्ला की चिठ्ठी आई। कितना फिक्र करता है हमारी। अबकी बार गांव में केशव का दोस्त आया था। साथ में साड़ी और पिताजी के लिए पतलून लेकर। केशव के माता-पिता ने उसका खूब स्वागत किया। कहने लगे ऐसा लग रहा है कि हमारा दूसरा बेटा आ गया।

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मां कभी केशव की चिट्ठी बताती, कभी भावुक होकर केशव की याद में आंसू छलकाती। कहने लगी बेटा तुम कभी-कभी आ जाया करो, तो अच्छा लगेगा। केशव भी नहीं यहां, बस अब तो वह मुश्किल से साल में एकाध बार ही आ सकता है। छुट्टियां नहीं मिलतीं उसे। अब चिठ्ठियों का ही सहारा है। बस याद आते ही चिठ्ठियां पढ़ती हूं। वो बचपन में बहुत ही शैतानी करता था। हर किसी को छेड़ता था, चिढ़ाता था। खाना भी ठीक से नहीं खाता था। उसको तो खीर बहुत पसंद थी। हर बार चिठ्ठी में कहता था कि मां अपने हाथों से खीर जरूर बनाना, जब मैं गांव आऊं। हर छोटी-छोटी बात बचपन से याद करके लिखता। कभी-कभी अपनी शैतानियों की कारस्तानी सुनाता, तो मैं पढ़कर हंसती। अबकी बार चिठ्ठी आयी। मां मैं अगले महीने के आखिरी सप्ताह में गांव आ रहा हूं। तुम उस दिन खीर बनाना।

नियति को कुछ और ही मंजूर था। अचानक बॉर्डर पर लड़ाई छिड़ गयी। महीने भर हाईअलर्ट। छुट्टियां भी कैंसिल हो गईं। युद्ध चलता रहा। जिस दिन आना था बेटे को गांव मैं शहीद की लाश आयी। मां ये सब देखकर विलाप करने लगी। सुध-बुध खो चुके माता-पिता की हालत देखी नहीं जा रही थी, गांव वालों से। मां कह रही 'मेरा लल्ला आ गया मैंने उसके लिए खीर बनायी है। उसको बहुत पसन्द है। न कोई बात नहीं वो थक गया है, उठकर खा लेगा। बोलकर मूर्छित हो गयी। मास्टरजी के बेटे पर सभी गौरवान्वित हो रहे थे। हमारे गांव का बेटा आज देश के खातिर शहीद हो गया। हम इस महान सपूत को सच्ची श्रद्धांजलि यही देगे कि गांव के अधिक से अधिक नौजवान फौज में भेजेंगे। मातृभूमि की रक्षा के लिए कोशिश यही रहेगी हर घर से एक नौजवान फौज में भर्ती हो। जब माता-पिता को सुध आयीं, तो मन ही मन अपने बेटे पर फक्र करने लगे। मातृभूमि को प्रार्थना करने लगे कि हमने अपना फर्ज निभाया है। मां आपको नमन। [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
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