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सुनिए जैन मुनि तरुण सागर जी, दिगम्बर होने का मतलब सिर्फ कपड़ों को त्याग देना नहीं है

- मयंक सक्सेना 

आप में से कई लोगों ने तरुण सागर को लेकर की गई टिप्पणियों पर दिगम्बर पंथ के बारे में ज्ञान देना शुरू कर दिया और बजाय उनकी महिला विरोधी और दरअसल साम्प्रदायिक टिप्पणियों पर बात करने के, उनके निर्वस्त्र रहने पर की गई टिप्पणियों को बहाना बना कर, सारा मुद्दा गोल कर दिया...तो सुनिए कि सच क्या है...क्या तरुण सागर सम्यक दृष्टि, ज्ञान और आचरण पर दृढ हैं?

सच ये है कि दिगम्बर होने का अर्थ सिर्फ वस्त्रों का त्याग कर देना ही नहीं है, बल्कि बहुत कुछ और छोड़ देना भी है। जैन धर्म का सबसे अहम महाव्रत है, अहिंसा...यानी कि मन, वचन, कर्म से किसी को भी पीड़ा न पहुंचाना... जबकि न केवल विधानसभा में तरुण सागर ने स्त्रियों के लिए विरोधी शब्द कहे, बल्कि इसके पहले भी वह आरक्षित वर्गों को कौवा कह चुके हैं...और तो और उनके प्रवचन, कड़वे प्रवचन के नाम से ही प्रसिद्ध हैं, यानी कि वाचिक हिंसा, जो कि जैन दिगंबर के लिए निषेध है...इसके अलावा महामुनि समय-समय पर साम्प्रदायिक हिंसा के आरोपियों के साथ गलबहियां करते रहे हैं...तो क्या यह अहिंसा के मानकों पर खरा उतरता है?

आते हैं एक और मानक पर...सत्य...जैन धर्म सत्य कहने की बात तो करता है, लेकिन किस तरीके से? जैन धर्म ग्रंथों के मुताबिक (प्रमाणसागर से भी) सत्य ऐसे बोला जाए, जो हितकर हो, मीठा और प्रिय हो...तो क्या तरुण सागर की शैली इसके अनुरूप है?

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अगला मानक है अस्तेय...इस बारे में वह खरे उतरेंगे, क्योंकि आजकल लगभग हर धर्मगुरु दी गई वस्तु पर ही निर्भर है...इसका अगला मानक है, ब्रह्मचर्य...अब तरुण सागर ब्रह्मचारी हैं, इसमें कोई शंका नहीं, लेकिन उनका गृहस्थों के जीवन, पत्नी और पति के सम्बंधों पर टिप्पणियां, साफतौर पर जैन धर्म के उन निर्देशों का उल्लंघन हैं, जो ब्रह्मचारी के आचरण को निर्देशित करते हैं।

पांचवा महाव्रत है, अपरिग्रह...यानी कि पदार्थों के प्रति ममत्व का पूर्ण त्याग....तरुण सागर का जिस प्रकार का राजनीति को धर्म द्वारा चलाने का आग्रह ही नहीं, आदेश है...उसके बाद भी अपरिग्रह को लेकर कुछ कहने को बचता है क्या? इतना मोह...इतना हस्तक्षेप?

आगे बढ़ते हैं, दिगम्बरों के लिए बेहद सख्त नियम हैं, जिनका पालन करे बिना, कोई भी दिगम्बर नहीं हो सकता है। इनमें महाव्रतों के बाद आते हैं, समिति...समिति का अर्थ होता है, सावधानियां। किसी भी दिगम्बर साधु के लिए इन सावधानियों का पालन करना इसलिए अहम है कि वह हर स्थिति में जैन धर्म के महाव्रतों को निभा सके। इनमें से एक अहम समिति है, भाषा समिति...इस समिति के अनुसार दिगम्बर को निंदा एवम् दूषित भाषा का त्याग करना होता है। इस मानक पर भी तरुण सागर किसी तरह से खरे नहीं उतर सकते हैं, क्योंकि वह न केवल कड़वे प्रवचनों से ही टीआरपी बटोरते आए हैं, पुरातनपंथी, स्त्री और दलित विरोधी मानसिकता वाली बातें भी लगातार कहते रहे हैं। यही नहीं उनके पाकिस्तान या दुश्मन देशों से युद्ध पर भी अपने विचार है, जबकि जैन धर्म किसी प्रकार की हिंसा के विरुद्ध है।

दिगम्बर जीवन का अगला पड़ाव है, पंचेन्द्रियनिरोध...पंचेन्द्रियनिरोध में पांचों इंद्रियों पर नियंत्रण आता है। पांच इंद्रियां नियंत्रित करने के विषय में सिर्फ इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि तरुण सागर जिस प्रकार राजनीति को न केवल मुट्ठी में करना चाहते हैं, बल्कि राजनीतिक सम्बंधों का लोभ भी नहीं छोड़ पाते हैं। न केवल उनकी सुरक्षा के लिए सरकारी सुरक्षाकर्मी हैं, बल्कि वह निर्वस्त्र रहने के सिवा किस प्रकार का कठिन जीवन जीते हैं, इस बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

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टीवी चैनलों पर उनके चौखटे के पीछे जो नक्काशीदार पलंग दिख रहा है, उस पर आगे बात की जाएगी। लेकिन न उनका नियंत्रण वाणी पर है, न क्रोध पर और न ही सत्ता पर नियंत्रण की इच्छा पर। यही नहीं, जिन भक्तों और शिष्यों की भीड़ उनके पीछे है, उनमें कई ऐसे हैं, जो साम-दाम-दंड-भेद हर प्रकार से अपने व्यवसाय में लाभ कमाते हैं और तो और अपरिग्रह समेत महाव्रतों से भी कोसों दूर हैं। अब ऐसे लोगों के निकट वह किस प्रकार का आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करते होंगे, वह ही जानें, लेकिन अपने ही एक वक्तव्य में उन्होंने धन को सबसे महत्वपूर्ण वस्तुओं में से एक बताया था।

जैन धर्म में 6 आवश्यक का भी विधान हैं, ये ऐसी क्रियाएं हैं, जिनको करना ही होता है। इनमें सबसे पहली है, सामयिक...अर्थात समता। आरक्षण और महिलाओं को लेकर तरुण सागर के बयानों से ही साफ हो जाता है कि उनको समता की कितनी समझ है। यही नहीं विधानसभा समेत तमाम स्थानों पर सबसे ऊंचा (राज्यपाल से भी) आसन लगवाना भी, समता में उनके विश्वास को और दृढ़ ही करता होगा। इसमें आत्मकेंद्रित होने, यानी कि दुनिया से खुद को अलग करने की रीति है, लेकिन तरुण सागर तो दुनिया में हद से ज़्यादा दखल दे रहे हैं।

प्रतिक्रमण एक और आवश्यक है, जिसके अंतर्गत अपनी गलतियों का शोधन करना होता है, लेकिन मुनिवर, अपनी गलती को मानने की जगह, अपनी तुलना गांधी और बुद्ध से करने लगते हैं। मज़े की बात ये है कि वह जैन धर्म के तीर्थंकरों को बीच में नहीं लाते, जानते हैं कि उनसे तुलना करेंगे तो गेम बिगड़ जाएगा। अगला आवश्यक है, कायोत्सर्ग...इसके बारे में अधिक कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन दिगम्बर के लिए सबसे अहम है कि उसको काया का ममत्व न हो। यानी कि न केवल शरीर का मोह त्यागना होगा, अस्वस्थता पर प्राण बचाने की अतिरिक्त कोशिश से भी बचना होगा और सुरक्षाकर्मी...वो तो अपराध हैं।

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दिगम्बर के अन्य नियम, दिनचर्या और शारीरिक चर्या से जुड़े हैं, इनका पालन भी अपरिहार्य है, क्योंकि दिगम्बर जीवन ही कठिन है। इनके पालन के बिना भी कोई दिगम्बर कहलाने का अधिकारी नहीं है। ये हैं अस्नान यानी कि स्नान न करना...अदंतधावन, यानी कि दांत भी साफ न करना...भूशयन, यानी कि ज़मीन पर चटाई वगैरह पर सोना; जिसका उदाहरण आपको तमाम टीवी चैनलों पर उनकी बाइट में दिख ही गया होगा...इसके अलावा एकभुक्ति यानी कि दिन में एक बार भोजन और स्थितिभोजन यानी कि खड़े रह कर दोनों हाथों में भोजन करना, इस पर भी कुछ कहना उचित नहीं होगा, लेकिन मैंने कई जैन दिगम्बरों को बैठ कर भोजन करते देखा है, जो इस रीति के अनुसार नहीं है...हालांकि तरुण सागर को भोजन करते देखने वाले ही इस बारे में कुछ टिप्पणी कर सकते हैं...अन्य में एक और नियम है, केशलोंच...यानी कि सिर और दाढ़ी के बाल, हाथों से नोंच कर निकालना...तरुण सागर से इस बारे में प्रश्न किया जाना चाहिए कि क्या वे अपने सिर और दाढ़ी के बाल, हाथों से खींच कर निकालते हैं?

इसका अंतिम अन्य है, नग्नावस्था में रहना...अब सवाल ये है कि जब नग्न रहना अंतिम अन्य है...यानी कि पूरे प्रक्रम का सबसे छोटा हिस्सा...तो क्या सिर्फ नग्न रहने से ही तरुण सागर या कोई और दिगम्बर हो जाता है? क्या बाकी नियमों का पालन नहीं करना होगा? और तो और जैन धर्म के त्रिरत्नों...सम्यक विचार, सम्यक आचरण और सम्यक दर्शन के सिद्धांत के अनुसार दलितों और महिलाओं से पृथक व्यवहार और उनके लिए वाचिक हिंसा...किसी को दबा के रखने की इच्छा और राजनीति को साधने की इच्छा ग़लत नहीं है क्या?
ऐसे में मैं तरुण सागर को दिगम्बर ही नहीं मानता...इसलिए वह सिर्फ निर्वस्त्र हैं...और खुद को दिगम्बर घोषित करते हैं। जैन समाज को चाहिए कि उनसे सवाल पूछें...और अपने धर्म को फिर से पढ़ें...सार वाक्य में सिर्फ ये कहना चाहूंगा कि वह निर्वस्त्र रह कर, सिर्फ अपनी मानसिक नग्नता को ढंकने की कोशिश कर रहे हैं। [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]

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