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एक्स गर्लफ्रेंड को दूसरा ख़त, तुम्हारे गले की वो खनक मेरे कानों में आज भी कैद है

-अवनीश कुमार

डियर एक्स गर्लफ्रेंड,

तुम्हें एक और चिट्ठी लिख रहा हूँ। क्या करूँ जब जिंदगी पहाड़ सी लंबी और मरुस्थल सी सपाट लगने लगती है तो तुम्हें चिट्ठी लिख देता हूँ। चिट्ठी लिख देने से ज़िन्दगी आसान हो जाती है,  ऐसा नहीं है। ज़िन्दगी के साथ एक बेहद अच्छी बात है कि "यह" आसान नहीं है। ज़िन्दगी आसान बनाने की तमाम जरूरतों में एक जरुरत "भूल" जाने की भी होती है। कई बार लगता है, भूलने के लिए मर्द नहीं औरत का दिल होना चाहिए। औरत सब कुछ भुला सकती है। उसका दिल समंदर होता है। समन्दर में कई तूफ़ान आते हैं, कई कश्तियाँ डूब जाती हैं, फिर सतह बराबर हो जाती है। जैसे कोई कश्ती डूबी ही न हो। मर्दों को इस बात की कलख होनी चाहिए कि उनके पास औरतों जैसा दिल नहीं है।

आज खुली आँखों से सपने देखते -देखते तुम्हें पत्र लिखने का ख्याल आया। पलक झपकते ही पूरी कहानी फ्लैशबैक में चली गई। वो भी क्या दिन थे, सपने तो जैसे आते ही नहीं थे। दसवीं क्लास में 10 नंबर के लिए निर्धारित Viva exam में उस सनकी इंग्लिश टीचर ने तुम्हे गाना सुनाने को कहा था। बिना झिझके तुमने गा भी दिया था। "दिल दे दिया है, जां तुम्हे देंगे" तुम्हारे गले की वो खनक मेरे कानों में आज भी कैद है। तुम्हारे गले में गिटार जैसी टनटनाहट थी। चेहरे पर इतना पानी कि तैरने का मन हो जाए। तुम मेरी आँखों में धंस चुकी थी। तुम्हारी भेजी हुई पहली चिट्ठी आज पढ़ते हुए एहसास हुआ कि आकंठ प्यार में डूबे प्रेमी-प्रेमिका की आँखें बस वही देखना चाहती हैं, जो उन्हें पसंद हो। वो तन की आँखों से नहीं मन की आँखों से देखा करते हैं।

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पिछले पत्र में तुमसे पहली बार मिलने का जिक्र कर चुका हूँ। तुम स्टेशन पर हल्के लाल रंग के सूट में आई थी। हमारे पास बातें बहुत ज्यादा थीं और समय बहुत कम। वो प्रेमी जोड़े वाकई उस खुशकिस्मत दौर के हैं जब पहली मुलाकात में ही प्रेमी- प्रेमिका एक दूसरे का दिल माँगते थे, विश्वास मांगते थे, गिफ्ट नहीं। मेरी जेब में कुल जमा तीन हज़ार रुपये थे और उसी पैसे में लौटना भी था।

खैर, मिलते ही सबसे पहले हम चेन्नई सेंट्रल के पीछे बने "गणेश मंदिर " में गए। हम दोनों ने पहली बार पूरा दिन साथ गुजारा, दिन जैसे ठहर गया था। हम मिलकर दुनिया की सुध-बुध खो बैठे थे। यह हमारे प्रेम का आरंभकाल था। प्रेम का पहला किस्सा। एक ठहरा हुआ दिन और न ठहर सका और हम दोनों को एक दूसरे को अलविदा कहना था। अगले सुबह ही मेरी ट्रेन थी। तुम्हारी आँखों की पलकों की नोक पर अटके आंसू मुझे बारहा निरीह और मज़बूर बना रहे थे। एक लंबी सीटी के बाद ट्रेन अपने यानी मेरी मंज़िल की और रवाना थी। मेरा मन उचट रहा था, बेचैन मन की स्थिति में उसी रात मैंने चलती ट्रेन में कुछ शब्द उकेरे थे-
"देर है, कुबेर है 
अँधेरा है, सबेर है 
छोटी सी ज़िन्दगी में 
कितना उलटफेर है?
पीपल की छांव था 
मन
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