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56 इंची महाशय, आपकी बेवकूफियों और कन्फ्यूज्ड पॉलिसी की सज़ा मुल्क कब तक भुगतेगा?

- नितिन ठाकुर

मुझे अच्छी तरह याद है कि कश्मीर में पर्यटन बढ़ने लगा था। कर्फ्यू हट रहे थे। अलगाववादी अप्रासंगिक होने की वजह से असहज रहने लगे थे। तभी बीजेपी ने केंद्र के बाद राज्य में सरकार बनाई और अचानक हालात तेज़ी से बदलने लगे। कश्मीर की भट्ठी को सुलगाकर उसने देश भर में हाथ सेंकने का इंतज़ाम कर लिया। मुझे कभी समझ नहीं आया कि बीजेपी निकाय चुनावों से लेकर प्रदेश के चुनावों तक पाकिस्तान विरोध भुना कैसे लेती है, जबकि उन चुनावों का लेना-देना उस बात से दूर-दूर तक भी नहीं।

खैर, पाकिस्तानी एसेंबली में बैठे हर आदमी के लिए भी कश्मीर का सुलगना मुफीद है। वहां भी तो कश्मीर नाम की गाय से दूध दुहने की पुरानी परंपरा है। अलगवावादियों पर एक बार फिर स्पॉटलाइट पड़ने लगी है। ज़ाहिर है फंडिंग में भी तेज़ी आई होगी। इस बीच बलूचिस्तान की लीडरशिप का ताज़ सिर पर सजाए विदेश में मौज काटते बलोच नेताओँ की भी बन आई। आखिर उन्हें लाल किले से पहली बार समर्थन जो मिला। दुनिया जानती है कि अपनी ज़ुबान पर बलूचिस्तान का नाम ना लाकर भारत ने हमेशा विश्व मंच पर अपनी नैतिक छवि को ऊंचा बनाए रखा।

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पहली बार जिस तरह बलूचिस्तान को कश्मीर के बरअक्स रखा गया उससे दुनिया भी समझ गई कि भारत पाकिस्तान से बराबरी के लिए नीचे उतर आया है। खुद को नीचा गिराकर मिला भी क्या? हमने अमेरिका को पहली बार सैन्य अड्डे इस्तेमाल करने की इजाज़त देकर रूस और चीन को तो चिढ़ाया ही, मगर कश्मीर या बलूचिस्तान पर उससे एक बयान तक अपने पक्ष में नहीं दिलवा सके। बाकी सब की तो छोड़िए.. बलूचिस्तान-बलूचिस्तान जाप करने के बाद भी हम अपनी सुरक्षा को लेकर सचेत नहीं हुए। इतना बड़ा इंटेलिजेंस फेल्योर हुआ और 18 जवान हमने बिना जंग के गंवा दिए।

अपनी जासूसी की झूठी-सच्ची कहानी फैला कर मुस्कुराने वाले डोवाल के कानों को ना पठानकोट की खबर लगी थी और ना उरी की। समझ नहीं आ रहा है कि हमने इतने महंगे हाथी पाले क्यों हुए हैं? हमें मालूम है कि इस सरकार में इस्तीफे नहीं होते.. ट्रांसफर तो होते होंगे!!!!  कश्मीर को तो पहले से किसी हाई अलर्ट की भी ज़रूरत नहीं थी. बहुत दिन नहीं हुए जब दो आतंकियों ने सुरक्षाबलों की बस को सीधा निशाना बनाया था, उनमें से एक ज़िंदा भी पकड़ा गया था.

पाकिस्तान को दोष देकर बेशक परंपरा निभाइए और अपनी गलतियां छिपा लीजिए, लेकिन अकेले में अपने गिरेबां में भी झांकिएगा. सिर्फ बयान बहादुरी करके आपने मधुमक्खी के जिस छत्ते में हाथ डाला है, उससे बचने के लिए कंबल का इंतज़ाम भी करिए. आखिर आपकी बेवकूफियों और कन्फ्यूज्ड पॉलिसी की सज़ा मुल्क कब तक भुगतने वाला है? इस सरकार ने नाॅर्मल होते हालातों को तो गैर ज़रूरी जोश दिखाकर खराब ही किया है.

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पहले से चली आ रही और नतीजे दे रही नीतियों को भी पलट कर रख दिया है. बर्थ डे पर केक खाने का अनोखा कदम हो या बेमतलब रूठ कर दिखाना...ये विदेश नीति के तकाजों पर खरा ना उतरा था और ना अब उतरेगा. बच्चों की तरह रोज-रोज नये प्रयोग करना बंद ही करिए. हमें आपको 5 साल तक झेलना होगा ही लेकिन क्या आप अपनी बंदरछाप करामातों को कुछ कम करके हमारी इस सज़ा को ज़रा सा हल्का नहीं बना सकते? [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
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