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मेरा देश वाकई बदल रहा है, हम अंदर से हिंसक और पैशाचिक हो रहे हैं, बाहर से सभ्य और धार्मिक !

-अतुल सक्सेना 'बागी'

दोस्तों,
मैंने एक अनुभव लिया पिछले कुछ दिनो में. बस में सफर करते हुए अलग अलग आयु एवं आय वर्ग के लोगों से बात करने का. अनुभव में पाया कि लोगों की सोच बदल रही है. हम अन्दर से हिंसक और पैशाचिक हो रहे हैं और बाहर से सभ्य और धार्मिक. क्या विडम्बना है, कोई इन्सान मर जाये तो लोग अफसोस करने की जगह उसकी मौत को नंगा करते हैं. कोई बताता है कि यह व्यक्ति अमुक पार्टी से था, इसलिये इसकी मौत को एक इन्सान की मौत की तरह देखा जाये या नहीं. कोई कहता है कि पहले इसको कम पैसा मिलता था, अब ज्यादा मिल रहा था फिर भी साजिश करने के लिये या 1 करोड़ रुपये लेने के लिये मर गया.

कल एक साहब बस में मिले, उन्होंने थ्योरी दी कि 5-10 साल की ज़िन्दगी रह गई थी, सोचा घर वालों को कुछ पैसा दे जाऊँ, इसलिये 1 करोड़ के लालच में जान दे दी. एक साहब तो तार्किक निकले, बोले कॉल रिकॉर्डिंग सुनिये, देखिये रिकोर्डिंग कब शुरू हुई है? उसके घर वालों की पिटायी को जायज ठहराने के भी तर्क हम ढूँढ़ ही लेंगे. वाह भाई वाह, एक इन्सान मर गया, उसकी मौत की चिंता नहीं पर उसकी ज़िन्दगी का पोस्टमार्टम ज़रूर करना है. वाह रे हमारी इन्सानियत. खून से खुशबु आने लगी है हमें. हम ऐक रक्तपिपासु जानवर बन रहे हैं.

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एक पढ़ने वाला छात्र गायब हो गया, पर हमको चिंता इस बात की है कि उसका धर्म क्या था, वो किस पार्टी से सम्बन्धित था या कौन सी पार्टी के ऊपर इसका इल्जाम आयेगा. काश थोड़ी चिंता इंसानियत की भी की होती.

मेरे पिछले ऑफिस में एक कश्मीरी पंडित भी मेरे साथ नौकरी करते थे. वो कश्मीर से भगाये गये लोगों में शामिल थे. आतंकवाद का दर्द झेला था उन्होंने. मुस्लिमों से नफरत थी उन्हें. जब भी बात होती थी, कहते थे कि मुस्लिमों को हिन्दुस्तान छोड़ना ही होगा. नफ़रत इस कदर थी कि उनके बच्चों के भी मरने की खबर हो तो भी वो खुश ही होते थे. अक्सर ऑफिस में उनकी ही विचारधारा के लोग भी मिल जाते थे और फिर वो सभी मिल कर मुस्लिमों को कोसने का संयुक्त कार्यक्रम चलाते थे.

अब मेरे लिये तो बड़े भाई जैसे थे, मैंने हमेशा समझा कि यह आतंकवाद का दर्द है. लेकिन बात कुछ और थी.
असल में वो, कश्मीर से भगाये जाने से पहले से ही एक छदम संगठन से जुड़े थे. मुस्लिमों से नफ़रत तो उन्हें वहाँ से मिली थी. आतंकवाद ने तो बस उनकी नफ़रत को सही साबित कर देने की उनकी क़ला में मदद की. कुल मिला कर संगठन के मुद्दे को, अपने भगाये जाने की सहानभूति के साथ भुना रहे थे.

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ऐसे लोगों का दोगलापन देखिये, मैंने एक दिन, ऑफिस के एक मुस्लिम कर्मचारी के सामने, जो उनके पास किसी काम से आया था, बोल दिया कि भाई तेरा काम तो होगा नहीं. तेरी कौम से नफरत है भाई को. इतना कहते ही पंडित जी का गुस्सा सांतवें आसमान पर पहुँच गया. मुझे जी भर के गाली दी. मुस्लिम कर्मचारी को साबित करने पर तुल गये कि यह सब झूठ है और मुझसे संबंध खत्म. अरे भाई अपना कोढ़ लगा नंगापन खुल के दिखाइये. शर्माते क्यों हैं. ये दोगलापन क्यों?

एक धर्म निरपेक्ष वकील साहब भी मिले, बोले मैं दरगाह भी जाता हूँ, मुस्लिमों से मिलता हूँ. थोड़ा खुलने के बाद उन्होंने बताया, यार बहुत गंदे होते हैं. लोटा इस्तेमाल करते हैं, हाथ भी नहीं धोते. देश को अपना नहीं मानते. फिर उन्होने बताया कि यह तो उनके खून में है. ये देश के नहीं हो सकते. खैर उनको तो मैंने वही बता दिया कि वो कितने घटिया आदमी हैं पर ताज्जुब हुआ युवा पीढी पर.

एक 24 साल का बीबीए पढ़ा लड़का मुझे बताता है कि देश में भ्रष्टाचार का राज चल रहा था. अबकी बार एक ऐसी सरकार है, जो ज़रूर कुछ करेगी. मैंने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा, सरकार से क्या उम्मीद करते हो? जवाब सुन कर मैं स्तब्ध हो गया. उसने मेरे कुरेदने पर भी हमारे छोटे शहर में नौकरियों पर चिंता जाहिर नहीं की. price  rise, globalisation आदि पर भी उसको कोई जानकारी नहीं थी. सच बोलूँ तो बीबीए होकर भी उसका ज्ञान, चाय वाले से ज्यादा नहीं था. उसकी आस्था भी भारत के संविधान में नहीं थी. हाँ उसके बाद उसने बताया कि वो सरकार से चाहता है कि मुस्लिमों को काबू में रखें. फिर उसने बताया कि मौका मिला तो पैसे देकर सरकारी नौकरी ले लेगा.

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माना कि इस तरह के युवाओं का प्रतिशत ज्यादा नहीं है और ज्यादातर युवा समझदार हैं. पर मजा तो तब आया जब उस युवा ने देशभक्ति पर पूरा भाषण दे दिया. और दुख ये सोच कर हुआ कि ऐसे युवा जो भ्रष्ट होने से भी परहेज नहीं करते और समझाते हैं कि छोटा भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार नहीं होता, वो तो ज़िन्दगी कि ज़रूरत है, ऐसे युवा भी vote ड़ालेंगे. 

ऐसा बिल्कुल नहीं कि समझदार लोग नहीं हैं, बहुत हैं. लेकिन मेरी चिंता भटके हुए युवा हैं, क्योंकि वो भी हमारी आने वाली पीढ़ी के भविष्य के लिए ज़िम्मेदार होंगे. अगर ऐसे भटकाव पर चिंता नहीं की गई और इसके उत्प्रेरक कारणों का इलाज नहीं किया गया तो आने वाले समय में नफ़रत का ज़हर हमारी अगली पीढ़ी को बर्बाद और असंवेदनशील बना देगा. यह मत सोचिये कि इसकी ज़िम्मेदार कोई सरकार होगी. इसके ज़िम्मेदार होंगे आप और हम. जो ऐसी सरकारों को और ऐसी सोच को प्रोत्साहन दे रहे हैं.

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वक्त है, इन्सान बनें पशु नहीं, जो एक के पीछे एक चलता है. कानून और संविधान में आस्था रखें. आखें खुली रखें. किसी को भी नेता, उसके कार्यों की वैधानिक समीक्षा और उसके मानव के लिये किये गये कार्यों के आधार पर मानें. अपने बच्चों को ईमांदार और इन्सान बनना सिखायें. अन्यथा आने वाली पीढ़ी पैशाचिक नरसंहार के लिये हमें कभी माफ नहीं करेगी.

आपका, अतुल 
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