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प्रिय ! ये रात गहरी हो चली है, सामने टेबल लैंप की पीली रोशनी मेरी नाकामी पर हंस रही है !

-आशीष रंजन

मेरी प्रिय ! ये रात गहरी हो चली है ! माहौल में एक अजीब सी खामोशी है!  सामने टेबल पर रखी घड़ी की टिक-टिक और निश्चित अंतराल पर नल से टपकते पानी की आवाज में कुछ डरावना सा लग रहा है ! ज्यों-ज्यों  टिक-टिक करती घड़ी में  समय बढ़ रहा है, व्याकुलता उतनी तेज हो रही है ! मैं तुम्हारी हर यादों को भुलाना चाहता हूं ! भुलाना चाहता हूं हर वो हसीन ख़्वाब जो हमने प्यार के उठान पर देखे थे !  हर वो वादे जो उस चांदनी रात में हम दोनों अकेले छत पर से दूसरे के हाथ में हाथ डालकर किए थे ! 

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मैं  भूलना चाहता हूं तुम्हारी उस छुअन को जिसके स्पर्श मात्र से मेरे जिस्म में एक कौतूहल पैदा हो गया था ! लेकिन भूलने की तमाम कोशिशें नाकाम होती जा रही हैं ! यह समय भी मेरा साथ छोड़कर मानो बंध जाना चाहता हो उन क्षणों में !! हड्डियों में चुभा देने वाली ठंड के बीच अपना कम्बल हटाकर टेबल लैंप जला लेता हूं! उठकर अपनी अलमारी, जो मेरी छोटी सी लाइब्रेरी है, उसमें से किताबों पर जमी धूल को हटाते हुए "गुनाहों का देवता" निकाल लेता हूं ! ये उपन्यास सुधा और चंदर के आध्यात्मिक प्रेम की "अमर ज्योति" है ! लेकिन आज मुझे सुधा और चंदर के प्रेम को महसूस नहीं करना है ! आज मुझे पम्मी के "मांसल प्रेम" को जानना है ! जिसे मैं आज तक हमेशा नकारता आया हूं और यह उपेक्षा अब मेरे लिए नासूर वेदना बन गई है ! 

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सही तो कहा था चंदर ने - पता नहीं क्यूं मांसलता में उतनी ही शांति मिलती है, ऐसा लगता है कि शरीर के विकार अगर आध्यात्मिक प्रेम में जाकर शांत हो जाते हैं तो लगता है कि आध्यात्मिक प्रेम में प्यार से रह जाने वाले अभाव फिर किसी मांसल बंधन में आकर ही बुझ पाते है ! सच है ...तुम्हें छूने के अलावा किया ही क्या है मैंने ! कुछ भी तो नहीं ! प्यार मैंने तुम्हें दिया ही कब है? प्यार तो तब पूरा होता है जब दो सुर्ख जिस्म  एक दूसरे में लिपट कर भीग न जाएं !! 

मुझे याद है उनके उस खुशनुमा एहसास का जब हम दोनों खो से गए थे !! क्या वह एहसास मांसल अनुभूति मानता था? खैर जो भी हो हम दोनों ने रोक लिया था उसे !! खासकर मैंने !! लेकिन मुझे लगता है वह मेरी सबसे बड़ी भूल थी जो भूल बार बार होती रही!! तभी तो तुमने कहा कि तुम मेरी जिंदगी में तब तक है जब तक तुम्हें  "कोई दूसरा विकल्प......." नहीं मिल जाता ! मैं निहायत ही कायर था, जो उस  वक्त डर गया !  हमें आगे बढ़ना चाहिए था ! इसी भूल की वजह से आज तुम्हें  "विकल्प" चाहिए ! सामने टेबल लैंप की पीली रोशनी भी हंस रही है मुझ पर !  मेरी नाकामयाबी पर ! चांदनी रात में आगे ना बढ़ पाने के उस खूबसूरत मौके पर ! 

लैम्प की हँसती हुई रोशनी से मुझे नफरत सी होने लगी है ! बाहर से सर्द हवाओं की सनसनाहट के बीच नेपथ्य से तुम्हारी आवाज आ रही है "मुझे विकल्प चाहिए".... यह शब्द मेरे सीने में खंजर की तरह उतर रहा है! मैं झट से किताब बंद कर देता हूं! अपने रुधे हुए गले को साफ करने के लिए टेबल पर रखी बोतल से पानी का एक घूंट पी लेता हूं !! मैं शराब नहीं पीता लेकिन फिर भी वेदना के इस क्षण में एक पागल नशेड़ी की तरह  झूम उठता हूं !! 

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मन में सवाल पैदा होता है लेकिन उसका जवाब स्वयं मिल जाता है !! सुधा अगर "रुहानी प्रेम" है तो पम्मी  उस प्रेम की शरीरगत संपूर्णता ! सुधा और पम्मी दोनों महान हैं ! बदलते करवट बीच अपने हौसले को बुलंद कर लिया है मैंने !! कल मुझे अपनी पम्मी से मिलने जाना है ! उसके "विकल्प" वाले सवाल को सदा के लिए खत्म कर देना है ! कल के बाद तुम्हें विकल्प  की जरूरत नहीं होगी ! तुम मेरे लिए "सुधा" भी रहेगी और "पम्मी" भी!  अर्थात आध्यात्मिक प्रेम के साथ मांसल सुख भी ! कितना सुकून देगा वह सुख... जब मैं तुम्हारे  सामने "पम्मी का चंदर" बन जाऊंगा!  प्यारा सा कमरा, हल्की दूधिया रोशनी, मेज पर रखे गुलदस्ते, नीचे बिछे कालीन, सामने सफेद सा बिस्तर और रुम स्प्रे की खुशबू ..।

कल वह दिन आएगा जब मेरी पम्मी मेरे इशारे पर रूम की दुधिया रोशनी को बंद कर देगी! और वर्षों से दो जिस्म के गरजते बादल घनघोर अंधेरे में चमकते बिजलियों के साथ बरस रहे होंगे ! वहाँ मुझे मेरी सुधा भी मिलेगी और पम्मी भी! दोनों एक जिस्म में ! और मैं एक साथ लुफ्त उठा रहा होऊंगा आध्यात्मिक और शारीरिक  प्रेम का !! [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
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