Top Letters
recent

आप बिहारी, बंगाली, मराठी बनकर सीना चौड़ा करते रहिए, सरकार आपका इस्तेमाल करती रहेगी

-आशीष रंजन

शाम के वक्त चाय की दुकान पर दो तीन लोग आपस में बात कर रहे हैं! यार..ये बिहारी बड़े अजीब होते हैं, जहां भी देखो अतिक्रमण करने लग जाते हैं, ना रहने की तमीज़ है ना बात करने की ! मैं और मेरे दोस्त दोनों एक दूसरे को देखते हैं और हल्की मुस्कुराहट के साथ दोनों चुप हो जाते हैं ..! कुछ ही देर में मेरे दोस्त ने बहस में दिलचस्पी लेते हुए बोला हां थोड़ा पिछड़ा एस्टेट है, रहन-सहन का स्तर नीचा हो सकता है, लेकिन जो भी हो काम के मामले में वह लोग बहुत मेहनती होते हैं !

वे लोग ही क्यों और लोग नहीं होते हैं क्या? मेरे दोस्त ने कहा - हां बेशक हर लोग होते हैं, लेकिन बिहार में पलायन की समस्या ज्यादा है तो जो लोग बाहर से आते हैं वह किसी भी संभावना को नहीं छोड़ना चाहते और बहुत कम में ही अपना काम चला लेते हैं ! चाय की चुस्कियों के साथ मामला और बढता जा रहा था. इतने में  वे बोल पड़े भारत को पीछे ले जाने में इन बिहारियों का सबसे बड़ा हाथ है. 90 परसेंट झुग्गियों में यही लोग रहते हैं जो चमचमाते एनसीआर को गंदा करते हैं ..!

इसे भी पढ़ें...
बिहार के CM नीतीश के नाम खुला ख़त, अगर ये जुर्म है तो हर भारतीय को बार-बार करना चाहिए !

इतने में उनके एक और साथी ने कहा और तो और तमाम इंजीनियरिंग से लेकर मैनेजमेंट कॉलेज में भी ये लोग भरे पड़े हैं !! यार ..! अगर बिहार की सरकार काम नहीं कर रही है तो यह लोग सरकार के खिलाफ कोई स्टेप क्यों नहीं लेते !  इसे हटा क्यों नहीं देते इनके चक्कर में दूसरे प्रदेश के युवाओं का हक मारा जाता है ! उन्हें खुद नौकरी नहीं मिलती ! यहां के मजदूर भी परेशान हैं उन्हें काम का सही पगार नहीं मिल रहा है, ऊपर से ये  लोग आकर हमारी बची संभावना को भी खत्म कर देते हैं ..!

खैर, बहस को विराम लगाने की कोशिश करते हुए चाय वालों को पैसे देकर मैं और मेरे दोस्त वहाँ से निकल लेते हैं..! आपको लग रहा होगा कि मैं बिहार से हूं इसलिए ये सब लिख रहा हूं ..! कतई नहीं ..! दरअसल सवाल क्षेत्रीयता का नहीं है ! सवाल उस नौजवान के मन में पनपी बिहारियों के लिए दुर्भावना से भी नहीं है, सवाल है बेरोजगारी का ! सवाल है आर्थिक असमानता का ! आखिर ये भावनाएं क्यों पनप रही हैं? लगातार रोजगार पैदा होने की दर घटती जा रही है !! किसी प्राइवेट संस्थान में 4 साल में 8 लाख खर्च करने के बाद भी लोग 5 से 8 हजार की नौकरी पर मजबूर हैं ! कुछ तो उसके बाद भी बिलकुल बेरोजगार बैठे हैं !

इसे भी पढ़ें...
एक रूबी राय को नहीं, पूरे एजुकेशन सिस्टम की खामियों को खत्म करिये!

बेरोजगारी के  इस आलम में उन्हें लगता है कि किसी दूसरे स्टेट के लोग यहाँ आकर उनका हक छीन लेते हैं ! सरकार रोजगार सृजन की नाकामी को छुपाने के लिए अपनी छोटी - छोटी मशीनरी द्वारा सबको "क्षेत्रीय राष्ट्रवाद" पर उलझाए रखती है, ताकि हमारा ध्यान बेरोजगारी के मुद्दे से बिल्कुल अलग हट जाये ! लेकिन इसकी समझ को विकसित करना बहुत जरूरी है ! अन्यथा आप कभी बिहारी, कभी बंगाली तो कभी मराठी के नाम पर अपना  सीना चौड़ा करते रहेंगे और सरकार आपका इस्तेमाल करती रहेगी !!  इतनी विविधताओं का देश होने के बाद भी भारत ,जो अब सामाजिक विषमता की तरफ बढ़ने लगा है इसकी खाई और गहरी होती चली जाएगी !! [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]

My Letter

My Letter

Powered by Blogger.