Top Letters
recent

'तुम्हारी यादें उस बेमौसम बारिश की तरह हो गई हैं, जो मुझे किसान की तरह बर्बाद कर देती हैं'

- गौतम कुमार सिंह 

प्रिय निधि,  
तुम तक मेरा खामोश सलाम पहुंचे। तुम खामोश, मैं खामोश, ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे पूरा दुनिया खामोश। नदियों के कलरव से लेकर पत्तियों की चरमराहट तक सब खामोश...एक लाश की भांति शांत, ठंठा और अकड़ा हुआ। कितना भयानक है ये सन्नाटा! कलम भी कितनी खामोशी से चल रही है... इसके लिखे अक्षर भी कितने खामोश हो गए हैं। इन अक्षरों का कोहराम नहीं रहा...घर के दरवाजे पर ठहरा हुआ, तेरी आहट का साया कच्ची नींद से अक्सर रात में, इसने हमें बार-बार जगाया है।

इसे भी पढ़ें...
मैंने आज भी संभाल कर रखा है कागज का वो टुकड़ा जिसमें तुमने लिखा था, मुझे तुमसे मोहब्बत है

प्रियतमा, तुम क्या गई मेरे जीवन से..., जीवन का सारा संगीत ही थम गया, हर साज चुप, हर आवाज चुप... मैं गाता भी हूं तो मेरा गीत चुप किसी तीर की तरह उसे और भी ज्यादा घायल कर देता है। अब चिड़ियों का चहचहाना या कोयल का गाना कानों में अमृत नहीं विष घोलता है। पर ये बिना बोले रह भी तो नहीं सकते, इनकी हर आवाज मुझे कचोटती है... कितना अच्छा होता तुम बोलती ये खामोश रहते। ये खामोशी मुझे प्रिय होती। सिर्फ तुम बोलती और सारी प्रकृति चुप रहती। तुम्हारे स्वरों में प्रकृति के हर स्वर का अनुभव कर लेता मैं। मगर सारी प्रकृति बोल रही है और तुम खामोश और स्थिर हो पत्थर की भांति...।

इसे भी पढ़ें...
सात साल की तड़प के बाद...मरने से पहले आखिरी ख़त, प्रिय सूफ़ी ! क्या तुम ये चिठ्ठी पढ़ोगी? 

बहुत दिनों से सोच रहा था तुम्हें एक खामोशी भरा खत लिखूं, पर अब खत लिखा भी नहीं जाता...तुम्हारे बिना लिखना ही अच्छा लगता है। हर बार ये शब्द ही तो होते हैं...हमारे सेतु बस गिने चुने सीमायें ओढ़े....एक आहट, धुंधली-धुंधली। हां और ना के बीच डोलती हुई....वो कुछ जो लिखा ही नहीं गया हो अब तलक...जो कहा ही नहीं गया हो अब तलक, पर उभर रहा है। इस तरफ भी और शायद उस तरफ भी अदृश्य इस छोर से उस छोर तक महसूस होता हुआ। महफूज होता हुआ कुछ पनप रहा है शायद। इन खामोशियों के बीच जिसको मैं समझ रहा हूं और तुम भी समझ रही हो...।

इसे भी पढ़ें...
प्रिय ! ये रात गहरी हो चली है, सामने टेबल लैंप की पीली रोशनी मेरी नाकामी पर हंस रही है ! 

तुम्हारे आने की आहट ने मुझे बार-बार बेचैन किया है...तुम्हारी यादें अब बे-मौसम बारिश की तरह हो गई हैं। जो मुझे किसान की तरह कभी भी बर्बाद कर देती हैं और तुम भी सरकार की तरह मुझे कोई मुआवजा नहीं देती....तुम्हारी बेवफाई ने मेरी दुनिया में गदर मचा रखा है। मेरी दुनिया के हर चौराहे पर तेरी ही बेवफाई का चर्चा है। हर कोने से एक ही प्रश्न चीख-चीख कर मुझसे से पूछ रहा है कि तुम बेवफा क्यों हुई? पर मैं जानता हूं तुम बेवफा नहीं हो सकती...वो लड़की बेवफा कैसे हो सकती है, जिसने मुझ जैसे बेवकूफ को जीना और लड़ना सिखाया है। जिसने दिल्ली जैसे शहर में अपना बनाया हो...अगर तुम बेवफा नहीं हो तो फिर कौन बेवफा है?....मैं?....नहीं शायद वह आईना बेवफाई कर रहा है जो कभी हमने देखा था... हम दोनों ने एक रेखाचित्र खींचा था.. इस शहर में चलते हुए जब भी इस शहर से निकलना चाहता हूं कोई न कोई याद मुझे लौटा लाती है। मैं तुम्हें हर लैंप पोस्ट पर खड़ा पाता हूं। हर बस से लेकर मेट्रो की सीट पर तुम्हीं बैठे लगती हो। कितना कुछ छूट गया तुम्हारे जाने के बाद...।

अब तुम नहीं हो पर तुम्हारी यादों पर पहरा कैसे लगाऊं?...ये यादें कभी भी आकर मुझे तन्हा और खामोश कर देती हैं। उस तन्हाई और खामोशी में कितनी तड़प, आह, पीड़ा और लाचारी है, यह मैं तुम्हें कैसे बतांऊ? पर मैं तुम्हें लिख रहा हूं क्यों लिख रहा हूं और क्या लिख रहा हूं नहीं पता...लेकिन फिर भी लिख रहा हूं क्योंकि तुम्हारे बिना लिखना ही अच्छा लगता है। अल्फाज तुम तक पहुंचने के कदमों के निशान लगते हैं। डर लगता है कोई पीछे पीछे हमारी बात न सुन ले।

इसे भी पढ़ें...
तुम्हारे जहन के सबसे खूबसूरत हिस्से में मैं यूं ही धड़कता रहूंगा

अब हम दो भागों में बंट गए हैं। तुम पुणे और मैं दिल्ली, तुम वहां मैं यहां। मैं बस यही लिखना चाहता हूं कि कम से कम पढ़ना तो रोना मेरे लिए। मेरी खामोशी और लाचारी के लिए। मैं भी रोना चाहता हूं। अपने सर्टिफिकेट पर खड़े अरमानों की इमारत की छत पर जाकर। मैं चाहूं तो तुम्हें फोन या मैसज कर सकता हूं। फिर सोचता हूं तुम्हारे लिए लिखने से अच्छा है 'तुम्हें' लिखूं। हो सकता है ये खत तुम तक पहुंचे या न पहुंचे...। कभी इतना वक्त लग जाए कि स्याही ही मिटने लगे। किसे पता ये ख़त तुम तक पहुंचने से पहले डाकिया पढ़ ले। बड़ा जालिम होगा वो। देखो यहां भी मैं लाचार हूं, बेबस हूं...शायद इसीलिए तो खामोश हूं... इन्ही खामोशियों में सोचता हूं क्या तुम ये सब जान पाओगी कभी...तुम्हारे ख्याल भी इतने खामोश होते हैं कि मैं जाने-अनजाने हां-ना के बीच झूलने लगता हूं। तुम तो मेरी बेबसी को समझ लोगे न। मैं किससे कहूं। तुम्हारी बातें भी खुद से कहता हूं। खुद को समझाते समझाते थक गया हूं। तुम समझती हो न!


तुम्हारा

 मैं...
[अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
Myletter

Myletter

Powered by Blogger.