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मैंने आज भी संभाल कर रखा है कागज का वो टुकड़ा जिसमें तुमने लिखा था, मुझे तुमसे मोहब्बत है

-गौतम कुमार सिंह

प्रिय सैफ़ी


मार्च का महीना आते ही तुम्हरी यादे सामने बाहें फैलाए खड़ी हो जाती हैं। यह महीना ऐसा ही है, जाने कितनी यादें जुड़ी हैं इस महीने से... जहां एक ओर वर्ष की अंतिम ऋतु शिशिर की विदाई हो रही होती है, तो वहीं साल के पहले ऋतु वसंत का आगमन हो रहा होता है। पलाश के फूल खिल रहे् होते हैं, आम के पेड़ मे मंजरी लग रही होती हैं। ठीक उसी वक्त तुम मेरे जीवन में आई थी। खुद को मेरे वजूद का हिस्सा बनाने, याद है तुम घर से नकाब में निकली थी...गली के सारे लोग हमारी फिराक में थे, पर तुमने उनको चकमा दे दिया था...ऐतराज था उनको हमारी मोहब्बत से...पर हमें तो एक पल का इंतज़ार भी दुश्वार हो गया था। वो सस्ता सा छोटा घरौंदा जहां हम दोनों बाहों में बाहें डाल कर जमाने भर का सुकून पाया करते थे। खुद को वेदना के अथाह सागर वाले इस संसार में...वो चांद जिसे देखकर हम सारी रात जगा करते थे। वो सब आज भी वहीं है सैफ़ी।

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प्रिय ! ये रात गहरी हो चली है, सामने टेबल लैंप की पीली रोशनी मेरी नाकामी पर हंस रही है ! 

तुम जा चुकी हो मेरी जिंदगी से... खुद को मेरे लहू के हर कतरे में छोड़ कर... तुम्हें तो ठीक से बिछड़ना भी नहीं आया... तुम कहती हो भूल जाना मेरे परिचय को, मगर एक भी सांस तो ऐसी नहीं मेरे सीने में, जो भूल तो जाती तुम्हें....डबडबाई हुई झील सी आंखें मुझे भूलने नहीं दे रही हैं। वो नजर कहां से लाऊं जो तुम्हें भुला दे वो दवा कंहा से लाऊं जो इस दर्द को मिटा दे... जो लिखा है तकदीर में वो हो कर रहेगा... मैं वह तकदीर कहां से लाऊं जो हम दोनों को मिला दे.... कभी हम ख्वाब देखा करते थे अपने वनों में स्वर्ग का... अब वहां आत्मा विरचती है, जहां कभी हमारा स्वर्ग हुआ करता था...पर अब भटक रही है। क्यों भटक रही है मेरे पास इसका कोई संतोष जनक जवाब नहीं है और मैं तुम्हारे बारे में कोई राय भी नहीं बनाना चाहता....बस मैं इतना ही जानता हूं सैफ़ी... तुम्हारे प्रेम के संदूक में मेरे लिए जो जगह खाली थी... शायद वह स्पेस आज भी है...  मैं तुम्हारे उस संदूक के तंबू की तिरपाल तक भी नहीं पहुंच पाया पर... मैंने बहुत कुछ सीखा है तुमसे और बड़ी ही गहरी स्वीकृति से क्या सीखा पता नहीं...शायद विश्वास, शायद निष्ठा, शायद प्रेम....शायद पता नहीं....

पर अब रात होते ही वह चांद हमें दुहाई देने लगता है...जो कभी हमारे प्यार का इकलौता गवाह हुआ करता था....मेरा मज़हब सिर्फ प्रेम था और तुम इसका अकेला सिद्धांत हुआ करती थी। तुम्हें पता है सैफ़ी, आज भी संभाल के रखा है मैंने वो कागज का टुकड़ा जिसमें तुमने लिखा था मुझे तुमसे मोहब्बत है। तो क्या तुम्हारा प्रेम दिखावा था? नहीं तुम्हारा प्रेम दिखावा नहीं हो सकता... तुम प्यार करती थी या शायद करती हो...क्योंकि तुम्हें प्रेम में उतना ही यकीन था जितना की कोई इंसान मौत पर करता है। ये तुम्हारी निष्ठा है प्रेम के प्रति पर मैंने कभी इस निष्ठा को पहचाना ही नहीं.... पर अब जब तुम नहीं हो...यह एक टीस बन कर दिल में चुभने लगा है... दिल से उठी यह टीस अब स्याही बनकर कलम से गुजर जाती है, वो सुफेद सफे के लिबास पर नज़्म बनकर बिछ जाती है। अब जब भी कोई आईना सामने आता है उसमें भी तेरी ही तस्वीर नजर आती है। न चाहते हुए भी उसे छोड़कर आना पड़ता है... आज बस तुम्हें बस एक बात बताना चाहता हूं सैफ़ी... तुम इम्तिहान में ना आने वाले सवाल जैसे बन गई हो दूर होकर भी पास लगती हो....

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मेरे लहू का एक कतरा भी तो ऐसा नहीं जिसमें तुम नहीं हो... प्यार पर बस तो नहीं है मेरा, लेकिन फिर भी तू बता कि तुझे प्यार करू या नहीं....तेरी जुदाई भी हमें प्यार करती है सैफ़ी... तुम्हारी यादें मुझे बार-बार बेकरार कर देती हैं...वह दिन जो तेरे साथ गुजरे थे.... अब नज़रें बार-बार उसे तलाश करती हैं। मैं लिखता हूं सिर्फ तुम्हें अपने वजूद में जिंदा रखने के लिए... मेरी हर एक सांस में तुम ही तुम हो...जानती हो सैफ़ी, तुझे लगता है जिस-जिस ने मुहब्बत की है खुदा ने अपने वजूद को बचाने के लिए उनको जुदा कर दिया है। तुम बेवफा नहीं हो और न ही 'मैं' बेवफा हूं। ये तो वक्त का सितम था जो उस दिन हम दोनों के ऊपर तुफान बनकर आया था.... वो आया और हम दोनों को उड़ा ले गया दो राहों में... पर यादों की यही एक बात अच्छी होती है सैफ़ी... चाहे यादें खुशी की हों या फिर तकलीफ की, हमेशा साथ होती हैं। कम से कम तुम्हारी तरह तनहा तो नहीं छोड़तीं। तुम्हें याद है, तुमने इस महीने को मिस्टिरीअस मार्च नाम दिया था और यह है भी बिलकुल किसी मिस्ट्री जैसा, कभी समझ नहीं आने वाला, खट्टे मीठे पलों वाला...बिटरस्वीट मिस्टिरीअस मार्च!

तुम्हारा ***
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