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नूर, अब मेरे दिन नहीं ढलते, रात नहीं होती, होता है तो बस कभी ना खत्म होने वाला इंतजार !

- मनोज देव पाण्डेय

प्रिय नूर,

अब, जबकि मैं ये खत तुम्हें लिख रहा हूं एक डर सताने लगा है। कहीं मेरी धड़कनें बेकाबू न हो जाएं तुम्हारे ज़िक्र से। बहुत शोर करती हैं ये। मैं डरता हूं, कहीं तुम मेरी ये धड़कनें सुन न लो। हमेशा ही सुन लिया करती थीं तुम इन्हें। इसीलिए इक इल्तिजा है मेरी। इस बार तुम इन्हें मत सुनना। ठीक वैसे ही, जैसे उस दिन नहीं सुना था... दूर जाते वक़्त।

देखो, मैंने आज कह ही दिया कि तुम दूर चली गयी हो। हां, तुम चली गयी हो... इक मांस के लोथड़े से दूर अपना संदली जिस्म लेकर। यूं तो मांस के टुकड़े अक्सर जिंदा नहीं होते, लेकिन मैं ज़िंदा हूं। मरना चाहता था मगर मैं मर नहीं सका नूर, क्योंकि मेरी रूह तो तुम ही हो। ये दूर नहीं गयी मुझसे। रूह इसलिए कि मैं तो खुद ही मोहब्बत हो गया था, तुम्हें पहली नज़र देख कर...और मोहब्बत रूहानी होती है। जब मोहब्बत रूह में उतर जाए तो फिर कभी छूटती नहीं है।

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नूर, मैं कभी-कभी सोचता हूं कि आखिर ये एहसास क्या है जिसे दुनिया प्यार, इश्क़ और मोहब्बत का नाम देती है। क्या ये एहसास ही है... या कोई फ़रेब जो दुनिया देती है और लेती है। फ़रेब नहीं... शायद एहसास ही है। मैं रोज़ डूब जाता हूं इन्हीं ख्यालात के दरिया में... गहरे,.. और गहरे डूबने पर लगता है प्यार उस रोशन एहसास की इब्तेदा है, और इश्क़ उसकी इंतेहा जो मेरे दिल की ज़मीं पर अमर बेल की तरह उगे हैं। जब भी तुम्हें सोचता हूं तो इन तीनों मराहिल से होकर गुज़रता हूं। लेकिन एहसासात के ये मराहिल ही मुझसे बग़ावत सी करते हैं। पहले मराहिल पर ही मुझे गुमराह किया जाता है। मालूम चलता है कि जिसे हम मोहब्बत समझ बैठे वो तो दिलकशी थी तुम्हारी।

नहीं, मैं ये नहीं कह सकता कि तुमने मोहब्बत नहीं सिर्फ दिलकशी की। ऐसा तो एहसासों के वो पड़ाव कह रहे हैं जिनसे होकर हमारा ये कारवां गुज़रा है। ज़िन्दगी के सफर में इश्क़ का कारवां। मैं जनता हूं नूर, दिलकशी हमेशा नहीं रहती। वक़्त की रेत के साथ ही वो भी फिसल कर फ़ना हो जाती है। कुछ रह जाता है तो वो है मोहब्बत। ना जाने कितने इश्क़ वाले फ़ना हो गए, लेकिन रह गयी तो बस उनकी मोहब्बत। दास्तां बन कर। किस्से कहानियों में आज भी ज़िंदा है तो बस उनकी मोहब्बत। वही मोहब्बत जो तुम्हें भी कुछ कम ना थी मुझसे। शायद अब भी है, इतने वक़्त बाद भी। कुछ आदतें कभी नहीं जातीं नूर, हम कितनी भी कोशिश कर लें।

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आदतन मुझे गुज़रा ज़माना भी कल की ही बात लगता है। एक-एक मुलाक़ात मैं रोज़ देखता हूं। यादों के शहर में। मुझे याद है सर्दियों की भोर और तुम्हारे साथ पैदल चलना। मैं आज भी महसूस कर सकता हूं पैरों के नीचे पत्तों की टूटन। गली के किनारों की झाड़ियों का सरसराना और सुबह की ओस का पैरों से लिपट-लिपट जाना, मझे महसूस होता है। मैं देख सकता हूं सर्द हवाओं में तुम्हारी नाक का लाल हो जाना। पेशानी पर रेशमी लटों का बार-बार गिर जाना। कैसे भूल सकता हूं। वो लटें बेतरतीब मगर खूबसूरत लगती हैं। 

तुम्हारी जिद और रोज नए बहाने मुझे बुलाने के लिए... याद आते हैं। आह, वो दिन जब तुमने पहली बार साड़ी पहनी थी शायद,... और किताब के बहाने मुझे बुलाया था। किताब जो तुमने जानकर छोड़ी थी। मैं लेकर आया था तुम्हारे घर। दरवाजे पर थीं तुम... मेरा इंतजार करती हुई। फिर मुझे देखते ही तुम्हारा दौड़ पड़ना... मेरी तरफ। बेसुध और बेसब्र होकर यूं मुझे देखना। यही पल था जब मैंने सारी खुशियां तुम्हीं से वाबस्ता कर लीं। तुम्हें अपनी सारी ख्वाहिशों का सरमाया बना लिया था मैंने।  

जानती हो नूर, मुझे आज भी याद है हमारी वो आखिरी मुलाकात। सफेद लिबास में थीं तुम। मुझे याद है जब तुमने कंप-कपाते होंठो से कहा था कि मैं अब तुमसे मिलने नहीं आउंगी देव... पूरे तीन घंटे लगे थे तुम्हे इतना कहने में। गर्मियों की चिलचिलाती धूप में मुझे ऐसा लगा था मानों मेरे दिल पर टनों बर्फ का बोझ लाद दिया गया हो। घड़ी की सुई वक्त नहीं बदल रही थी। सब थम सा गया था। वो शाम आज तक नहीं ढली। मेरी ख्वाहिशात की तरह आज तक वो सूरज भी सुलग रहा है। अपनी ही तपिश में। जैसे मैं जलता हूं अधूरी ख्वाहिशों की आग में।

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उस एक पल में ही मेरी जिंदगी के साथ-साथ तमाम सवाल भी सिमटे और सिमट कर खत्म हो गए। बहुत कुछ पूछना था तुमसे जो कभी पूछ ना सका... बहुत कुछ जानना था मुझे जो कभी जान ना सका। तुम्हारे दूर चले जाने के बाद... अब मेरे दिन नहीं ढलते, रात होती नहीं है। होता है तो बस कभी ना खत्म होने वाला इंतजार... तुमसे मुलाकात का इंतजार। तुम्हें इक नज़र देख पाने का इंतजार। आंखों के सूने कमरों में तुम्हें छुपा लेने का इंतजार। और होता है दर्द। हसरतों के बोझ का... जो तुमसे दूरी की कुरबतों के दरमियां होता है। हर आह, जो कभी पूरी नहीं होती। बस कयामत की तरह गुज़ती है, मेरी दुनिया पर। 

तुमने तो साथ छोड़ दिया नूर, लेकिन तुम्हारी यादों और एहसासों ने नहीं। हमारी मोहब्बत के चांद ने भी मेरा साथ उदास रातों में हमेशा दिया है। मैं तो मोहब्बत में इतना टूटा कि अथाह सूने को आबाद करता तारा बन गया। अब रोज टूटता हूं ये सोच कर कि शायद मेरी तड़प, मेरा टूटना और टूट कर बिखर जाना ही किसी इश्क वाले के काम आजाए। दो प्यार करने वाले दुआ मांगें मेरे टूटने पर। लेकिन मैं जान गया हूं नूर, मोहब्बत ला-हासिल है। जो हासिल हो जाये, उसे मोहब्बत नहीं कह सकते। मेरा अधूरापन भी मुझे वैसे ही पूरा करता है जैसे मोहब्बत की अधूरी कहानियां ही पूरी होती हैं। नूर और नूर से मोहब्बत ही मेरा दफ्तर-ए-अमल है। यकीन मानों ये कब्र तक मेरे साथ जाएगा।

तुम्हारा
देव
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