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'तुम्हें क्या बताऊं, उस रात मैंने अपना तकिया कितनी बार चूमा और उसे बांहों में भरके सो गया'

-आचार्य सुभाष विक्रम

भूतपूर्व प्रिये !

कल तुमको चूड़ी की दुकान में देखा तो बस देखता रह गया। याद आ गया वो स्वीट 87 का जमाना जब हम दोनों आठवीं में एक साथ पढ़ा करते थे। तुम तब भी इतनी ही खूबसूरत लगतीं थीं, जितनी कि आज लग रही थी। बस पहले की तुलना में कमर और उसके आस पास के  इलाके और विकसित हो चुके हैं ।

तुम जितनी खूबसूरत थी, पढ़ने में उतनी ही गदही। गणित, विज्ञान और अंग्रेजी में तो तुम भैंस बराबर भी नहीं थीं। जब भी कोई परीक्षा या टेस्ट होता, तुम अपने पापा के रसूख़ का उपयोग करके अपनी सीट मेरे बगल में ही लगवा लेती और इन विषयों में मेरी उत्तर पुस्तिका को हूबहू उतार लिया करतीं।

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संस्कृत मुझे बिलकुल नहीं आती थी और यही एक विषय था, जो तुम्हे सिर्फ आता ही नहीं, गजब का आता था। हर बार संस्कृत का पेपर, परीक्षाओं के बीच में पड़ता था लेकिन सालाना परीक्षा में देववाणी का प्रश्नपत्र अंत में होने वाला था। मुझे अच्छी तरह याद है कि गणित का एक सवाल जो खुद मुझे ठीक से नहीं पता था जिसे मैंने अंदाजे से किया और गलत होने के डर से तुम्हें नहीं दिखा रहा था, इसके लिए तुमने कितनी मिन्नतें की थीं...क्या क्या प्रलोभन दिए थे।


यहां तक कि मेरा हाथ पकड़ कर तुमने आई लव यू भी बोल दिया था। मैं बस तुम्हारी रुआंसी आँखों को ही देखता रह गया था और फिर मारे ख़ुशी के तुम्हारी कॉपी लेकर खुद से वह सवाल हल कर दिया था। तुम्हें क्या बताऊँ, उस रात मैंने अपने तकिये को कितनी बार चूमा और..और उसे बाँहों में भरके सो गया, अब वो तकिया तुम में परिवर्तित हो चुका था।

संस्कृत के पेपर में तुम बेवफ़ा हो गयी...सारे कस्मेवादे झूठे सिद्ध हुए। मैं तुम्हारी तरह रो नही पाया बाहर से, वैसे अंदर से तो दिल सावन-भादों हुआ जा रहा था। रिजल्ट के दिन तुम फर्स्ट आयी थी और मैं कृपांक के साथ उत्तीर्ण। ये बिलकुल उल्टा परीक्षा परिणाम था। हर बार मैं फर्स्ट आता था और तुम विद ग्रेस पास हुआ करती थी।
पापा ने मेरी पीठ पर 7 छड़ियां तोड़ डालीं। इतने से भी संतुष्ट नहीं हुए तो मेरा नाम दूसरे शहर में ले जा कर लिखवा दिया। वक्त बीतता गया और मेरी यादों की चिंगारी, वक्त रूपी राख पड़ने से, धीरे धीरे मद्धम पड़ती चली गयी। कल जब तुम्हें देखा, अचानक यादों ने तेज आँधियाँ चला कर सारी राख को उड़ा दिया और फिर से वही तपिश महसूस करने लगा जो कभी तुम्हारी हथेलियों से मिली थी।

उस दिन मैंने सपने देखे थे कि मेरे और तुम्हारे जो 3 -4 बच्चे होंगे वो मेरी तरह पढ़ने और खेलने में अच्छे और तुम्हारी तरह दिखने में सुंदर और संस्कृत में भी बहुत तेज होंगे ! लेकिन ...!!!
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