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महिलाओं के नाम खुला ख़त, खुश रहना है तो ये 7 बातें हमेशा के लिए गांठ बांध लें

- सुनीता पाण्डेय

प्यारी स्त्रियों,
एक मित्र ने मेरे विचार उन महिलाओं के बारे में जानने चाहे जो सब कुछ अपने भीतर छुपा लेती हैं. मतलब अपना दुख दर्द किसी के भी सामने नहीं व्यक्त करती हैं. यहाँ तक कि अपने पति के सामने भी. मैंने उन्हें जब बताया कि यह तो उस महिला के लिए और भी अधिक घातक है, उन महिलाओं की अपेक्षा जो कम से कम अपना रोना रोकर अपना जी तो हल्का कर ही लेती हैं, तो उन्होने सहमति में हामी भरी. ऐसी महिलाएं जो अपना दुख अपने ही भीतर समेट कर रखती हैं वे भीतर ही भीतर कुंठित होती रहती हैं. उनके भीतर स्ट्रेस का लेवल इस कदर बढ़ जाता है कि वे कई शारीरिक बीमारियों को अनजाने ही अपने गले लगा लेती हैं.

ऐसी महिलाओं की खास बात यह होती है कि वे अपने आप को एक आदर्श बहू, आदर्श पत्नी या आदर्श माँ, आदर्श भाभी वगैरह के रूप में (अधिकतर अनजाने में ही) प्रतिष्ठित करना चाहती हैं. कहने का मतलब यह है कि वे किसी से शिकायत होने पर भी उस शिकायत को व्यक्त नहीं करती हैं. जबकि मन ही मन वे उस शिकायत बारे में सोचती रहती हैं. इस वजह से उनके मन का गुबार बाहर नहीं आ पता है और वे भीतर ही भीतर अप्रसन्न रहती हैं. अपनी खुशियों का बलिदान करती रहती हैं. परिवार की  खुशी के नाम पर. आज उनसे कुछ कहना चाहूंगी मैं.

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पहली बात तो यह कि आपको भी खुश रहने का पूरा पूरा अधिकार है. आपका जीवन केवल दूसरों की सेवा के लिए ही नहीं बना है. ध्यान रखो, जितना करती जाओगी उतना ही लोग करवाने में प्रसन्नता महसूस करेंगे. आपकी तारीफ कर कर के आपको देवी बना देंगे. पर आपकी इच्छाओं के बारे में जानने की कोशिश नहीं करेंगे और न ही जान पाएंगे, क्योंकि वे अंतर्यामी नहीं हैं.


दूसरी बात. आदर्श स्थिति के पास पहुँचने की कोशिश ज़रूर करो, लेकिन उसे पाने की जद्दोजहद मत करो क्योंकि आदर्श स्थिति केवल और केवल एक थ्योरी है. इस बात को याद रखो कि तुम देवी नहीं हो. मानव हो. एक बात से आगाह कर दूँ कि अधिकतर ऐसी महिलाएं आगे चलकर डिप्रेशन की शिकार हो जाती हैं और अपनी इस स्थिति के लिए वे खुद ही जिम्मेदार हैं. ऐसी महिलाओं के संबंध घर में सभी से अच्छे रहते हैं. क्योंकि वे किसी से कुछ बोलती ही नहीं सो संबंध खराब होने का प्रश्न ही नहीं उठता, पर ऐसी कई महिलाओं को अक्सर अपने पति से कुछ शिकायतें होती हैं जिन्हें वे अपने इसी स्वभाव के चलते व्यक्त नहीं कर पाती हैं और घुटती रहती हैं मन ही मन. उनके लिए पति से शिकायत दूर करने के संबंध में कुछ सुझाव देना चाहूंगी. सबसे पहले तो अपनी पुरुष मनोविज्ञान की समझ को बढ़ाओ. चाहे लिट्रेचर पढ़ कर या अपने पति से दो टूक बात कर.

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तीसरी बात, सभी पुरुष लोग स्त्रियों की तरह मन पढ़ना नहीं जानते. सो जो भी कहना चाहती हो वह बात उनसे साफ- साफ बोलो. यदि चाहती हो कि तुम्हारे पति तुम्हारे साथ कुछ अधिक समय बिताएँ तो उन्हे साफ साफ बोलकर यह बात बताओ. (उदाहरणार्थ उनसे कहो कि महीने में कम से कम एक बार तो तुम्हें रोमांटिक डिनर पर बाहर लेकर ही जाएँ. भले ही वह रोमांटिक डिनर किसी ठेले या खोमचे पर ही क्यूँ न हो) सिर्फ हिंट देने से काम नहीं चलने वाला, इन्हें तो तुम्हें बोलकर ही हर बात बतानी होगी.

चौथी बात. पुरुषों के सुनने की कला स्त्रियों के सुनने की कला से भिन्न होती है. मतलब स्त्रियाँ जब किसी को सुनती हैं तो अगले का दुख-सुख सुनने और साझा करने के भाव से सुनती हैं, जबकि पुरुष जब किसी का दुख-दर्द सुनते हैं तो वे यह समझते हैं कि अगला उनसे अपनी समस्या का हल मांग रहा है और वे उसे उसका हल सुझाते हैं. सो यदि तुम अपने पति से कोई बात सिर्फ साझा करना चाहती हो, तो उन्हें पहले ही कह दो कि आपको मुझे कोई हल नहीं सुझाना है बल्कि सिर्फ सुनना है. इस बात की शिकायत मत करो कि पति तुम्हारी बात ठीक से सुनते नहीं सिर्फ अपनी ही चलाते हैं.

पांचवीं बात. पति से जब लड़ाई या बहस करो तो गड़े मुर्दे मत उखाड़ो कि तुमने छह महीने पहले मुझे से कहा था या दो महीने पहले वो कहा था. उन बेचारों को तो दस दिन पहले कही अपनी बात भी याद नहीं रहती है. यदि पति से कोई काम करवाना है तो या तो पूरा काम उन पर छोड़ दो या फिर  खुद ही कर लो. जब वे काम कर रहे हैं तो उसमें फिर अपनी टांग मत अड़ाओ, वरना वे ठीक से काम नहीं कर पाएंगे. क्योंकि ये पति बेचारे थोड़ी सी कन्फ़्यूज्ड प्रजाति से आते हैं.

छठी बात, यदि इनसे बाजार से कुछ मंगवाना है तो उसका सही सही डिसक्रिप्शन इन्हें बताओ. अच्छा होगा कि इन्हें उस चीज़ का पूरा वर्णन एक कागज पर लिख कर दो. ब्रांड सहित. वरना फिर ये बेचारे मार्केट में जाकर कनफ्यूज़ हो जाएँगे और फिर इतनी और ऐसी चीज़ें उठाकर ले आएंगे कि तुम बाद में अपना ही माथा पीटती रह जाओगी. छठी बात, अगर कभी ये भूले भटके तुमसे पूछें (यदि इतने भले हैं तो) कि क्या कोई तकलीफ है तुम्हें? तो तुरंत अपनी तकलीफ पूरी डिटेल के साथ साफ-साफ बता दो क्योंकि तब तुमने अगर बलिदानी बनते हुए यह कह दिया कि कोई तकलीफ नहीं है तो ये उसे आसानी से मान जाएंगे और फिर यह जानने की भी कतई कोशिश नहीं करेंगे कि तुम तकलीफ में हो और झूठे ही ना कह रही हो.

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सातवीं बात, यदि पति से अपनी तारीफ़ पाना चाहती हो तो वह भी तुम्हें इनसे कह कर ही करवानी होगी. क्योंकि इन्होंने अपने पापा को भी कभी यह करते नहीं देखा सो ये बेचारे सीखते भी कहाँ से? सो थोड़े नखरे और अदा तुम भी सीखो :)

खैर, बात गंभीर थी जिसे मैंने थोड़े हास्य में बदल दिया क्योंकि तुम्हारे दुख को गहराना नहीं चाहती थी मैं. सो इन महिलाओं के केस में सौ बातों की एक बात यह है कि अपने कम्युनिकेशन को ओपन करो. अपने मन की बात भले ही कम शब्दों में कहो, पर बोलो. ध्यान रखो, सही तरीके से किया हुआ कम्युनिकेशन अधिकतर समस्याओं का सबसे सही हल है.

मन में रखोगी तो मन बेचारा कब तक स्टोर करेगा? कभी तो भर जाएगा और ढह जाएगा. अपनी देखभाल खुद ही करो. तुम्हारे लिए भी वही बात कि स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का वास होता है. सो सबका ध्यान ज़रूर रखो, पर अपने आप को भी नेगलेक्ट मत करो.

तुम्हारी सहेली
सुनीता
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