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स्त्रियों के नाम एक स्त्री का खुला ख़त, रोने-धोने की आदत छोड़ो घर से बाहर निकलो

- सुनीता पाण्डेय

प्रिय स्त्रियों,

यह खत लंबा भी है और इसमें कुछ कड़वी बातें भी होंगी. इसलिए अगर आप बुखार होने पर कुनैन खाने की ज़रूरत समझती हैं, तो ही इसे आगे पढ़ें. यह तो हम सभी को पता है कि सम्पूर्ण मानव जीवन ही परेशानियों रहित नहीं है.  हम स्त्रियों के हिस्से तो कुछ अधिक परेशानियाँ आती ही हैं. हमारे यहाँ की व्यवस्था के चलते. खासकर विवाह के बाद. विवाह से पहले. आजकल मुझे नहीं लगता कि हमारे लालन-पालन में लड़कों की तुलना में कोई कमी रखते होंगे हमारे माँ बाप. पर कई लड़कियों के साथ ऐसा हो जाता है कि विवाह के बाद ससुराल में उन्हें वह व्यवहार नहीं मिल पाता, जिसकी वे अपेक्षा कर रही ही होती हैं.

कई लड़कियों के साथ तो ससुराल में बाकायदा पशुवत व्यवहार भी होता है. वजह कोई भी हो सकती है. भले ही वहाँ उस लड़की की कोई गलती न हो तब भी. यह तो है समस्या. पर मेरे इस ख़त का कारण अब भी अलग है. होता यूं है कि अक्सर हम में से कुछ औरतें इस समस्या का सामना नहीं कर पाती हैं और रोने लगती हैं. पहले तो वे रोती हैं और जब रोना बंद करती हैं तो वे अपना ये रोना दूसरों के सामने रोने लगती हैं.

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जब वे इस रोना रोने की शुरुआत करती हैं तो शुरू में वाकई दूसरे लोगों की सहानुभूति उनके साथ होती है. इससे उनके इस रोना रोने की प्रवृत्ति को और बल मिलता है और वे स्त्रियाँ इसमें आत्म संतुष्टि का अनुभव करने लग जाती हैं. अब ये रोना रोना उनके लिए एक नशे की तरह हो जाता है. वे दूसरों के सामने अपने इस रोने में आनंद की अनुभूति प्राप्त करने लगती हैं. फिर वे हरेक के सामने इस नशे की और डोज़ प्राप्त करने के लिए रोती हैं.

कई बार तो वे एक ही व्यक्ति के सामने दसियों बार सेम टू सेम यही रोना रोती हैं. कई बार वे अलग अलग दसियों लोगों के सामने यह नशा करती हैं. अब होता यह है कि दस लोगों में से पाँच तो उनकी पीठ पीछे उनकी इस बात की हंसी उड़ाते हैं और उन नादान स्त्रियों को इस बात का पता ही नहीं चल पाता है. बाकी के पाँच में से दो तीन उनसे कन्नी काटने लग जाते हैं कि यार ये औरत फिर से न पकड़ ले हमें. एक दो ऐसे होते हैं जो उन्हें कुछ हल सुझाने की कोशिश करते हैं तो ‘उन’ एक दो से वे ‘पीड़ित’ स्त्रियाँ कन्नी काटने लगती हैं, यह कह कर कि ‘तुम्हारे ऊपर नहीं बीती है न ये सब, अगर तुम्हारे ऊपर बीती होती तो तुम मेरी व्यथा समझते.’

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खैर, कहने का सार यह है कि ऐसी स्त्रियाँ रोना तो रोती हैं पर अपनी समस्या का हल नहीं निकालती हैं क्योंकि उनसे उनका आनंद छिनने का डर जो होता है उन्हें. पता है स्त्रियों, तुमने इस तरह से अपने आप ही उस समस्यानुमा खूँटे से अपने पैर को बांध रखा है. जबकि तुम्हारे हाथ और दिमाग दोनों खुले हैं. पर तुम्हें इस बंधन में अपनी अज्ञानता की वजह से आनंद आ रहा है क्योंकि तुम्हें वहीं बंधे पड़े भी खाना तो मिल ही रहा है और रोना रोने का आनंद भी. अगर चाहो तो अपने हाथ बढ़ा कर अपना यह बंधन तुम स्वयं खोल सकती हो.

सोचो ज़रा, तुम्हारी समस्या का हल सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे पास है. शादी के बाद के सात सालों के लिए तो अदालत कहती ही है. पर मैं कहती हूँ कि अगर शादी के बाद के दस साल में तुमने अपनी जीवन नैया ठीक से खे ली तो उसके बाद तुम्हारा जीवन लग्ज़री स्टीमर की तरह हो जाएगा. सोचो ज़रा और अपनी समस्याओं का हल खुद ही निकालो. सबसे उचित है कि कोई मध्यम मार्ग निकालो जिसमें एक तरफ तुम्हारा अपना जीवन है, दूसरी तरफ तुम्हारी ससुराल. दोनों में बैलेन्स बनाओ.

कुछ उपाय सुझा रही हूँ मैं अपनी समझ से. सबसे पहले तो अपना रोना दूसरों के सामने रोना बंद करो. घर से बाहर निकलो. अगर बच्चे छोटे हैं या किसी कारणवश तुम घर से बाहर नहीं निकल सकती तो अपने आप को किसी पॉज़िटिव काम में एंगेज करो. कुछ अच्छा पढ़ो लिखो. चित्रकारी करो. बागबानी करो. मेरा मानना है कि अगर तुम ऐसी स्थिति में भी फेसबुक कर सकती हो तो तुम पढ़ाई लिखाई भी कर सकती हो.

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फिर भी कुछ समय के लिए घर से बाहर निकलो. किसी ऐसी जगह पर जाओ जहां तुम्हें इस आनंद से भी बढ़कर आत्म आनंद की अनुभूति हो. वह जगह कोई भी हो सकती है. कोई ध्यान केंद्र, ब्यूटी पार्लर, पौधों की नर्सरी, हाट बाज़ार, म्यूज़ियम या चिड़ियाघर भी. हो सके तो अकेले निकलो. अकेले निकलने से आत्मविश्वास बढ़ता है. आत्म मंथन का समय मिलता है. अपने आप से प्यार करो. अपने तन मन का खयाल रखो. गुस्से में आकर खाना पीना मत छोड़ो. स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है. अपने शौक पूरे करो. मन को खुशी मिलती है अपने शौक पूरे करने से. पर जो भी करो सकारात्मक सोच के साथ सकारात्मक दिशा में कदम बढ़ाओ. 

अगर पढ़ाई बीच में ही छूट गयी है तो उसे पूरा करो. याद रखो, पढ़ाई कभी व्यर्थ नहीं जाती. अगर तुम्हारे शहर में कोई आईटीआई संस्थान है तो वहाँ जाकर अपनी पसंद के शॉर्ट कोर्सेस करो. अगर आर्थिक रूप से तुम सक्षम नहीं हो तो सबसे पहले उसके लिए अपने आपको योग्य बनाओ. सक्षम होने पर बाहर निकल कर काम करो. चाहे छोटा मोटा काम ही क्यों न हो. अगर आर्थिक रूप से सक्षम हो (मैंने कई अच्छी अच्छी प्रोफेशनल महिलाओं को भी रोना रोते देखा है) तो अपने आपको परहित में लगाओ. लेकिन पर ‘हिट’ में नहीं, न ही स्व ‘हिट’ में. 

अनाथ आश्रम जाकर देखो. विकलांगों की संस्था में जाकर देखो. तुम्हें अपना दुख, अपनी समस्या बहुत छोटी प्रतीत होगी. कहने का मतलब यह है कि तुम्हें अपनी मदद स्वयं करनी होगी. याद रखो, कोई भी तुम्हारी मदद एक लिमिट तक ही कर सकता है. अपना संबल स्वयं ही बनना होता है. सो आज से, अभी से ये बेचारगी छोड़ो. अगर तुम फेसबुक कर सकती हो तो मैं समझती हूँ कि तुम ये बेचारगी भी छोड़ सकती हो.

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ये मत समझना कि मैं सिर्फ उपदेश दे रही हूँ. बीस पच्चीस साल पहले मैंने भी इस तरह का रोना रोया हुआ है. पर जल्द ही यह ज्ञान प्राप्त हो गया मुझे कि समस्या का सामना तो मुझे करना ही है. अब ये मुझ पर था कि मैं यह सामना हँस कर करती या रोकर. मैंने हँसने वाला रास्ता चुना. हो सकता है कि मेरी इन बातों से तुम में से किसी को बुरा लगा हो. किसी की दुखती रग को मैंने छुआ हो तो मैं तुमसे माफी मांगती हूँ. 

यकीन जानो, मैं तुम्हें यूं घुट-घुट कर जीते नहीं देखना चाहती. भगवान ने तुम्हें दो मजबूत हाथ, एक मजबूत दिमाग और एक कोमल ही सही पर मुंह में ज़बान भी दी है. इन सभी का आवश्यकता पड़ने पर सही और सकारात्मक इस्तेमाल करो. नहीं तो इन सब में जंग लग जाएगा.

तुमने मेरा ख़त पूरा पढ़ा. इसके लिए मैं तुम्हारी शुक्रगुजार हूँ. आशा करती हूँ कि अब तुम आत्ममंथन ज़रूर करोगी. मेरी बात, सुझाव कैसे लगे नीचे कमेंट कर मुझे ज़रूर बताना. मेरे लिए कोई सलाह हो तो वह भी ज़रूर देना. तुम्हारा सदा स्वागत है.

तुम्हारी सहेली
सुनीता
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