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'इलाहाबाद मेरी शख्सियत का हिस्सा है, कोई मुझे मेरे शहर की यादों से बेदखल नहीं कर सकता'

-मनीष कौशल

मेरे बचपन का शहर इलाहाबाद! मैंने अपने वॉट्सऐप वाली dp के साथ अपने परिचय की टैग लाइन लिखी है, ‘अयोध्या वाला छोरा’। मैं जब भी घर जाता हूं अयोध्या फ़ैज़ाबाद की गलियों में भटकता हूँ। अपने पिता के शहर से राब्ता बनाने की कोशिश कर रहा हूं जहाँ मैं बचपन में कभी कभी छुट्टियाँ मनाने जाया करता था। इलाहाबाद से। जी हाँ बचपन के कुल जमा छह दर्जे तक की पढ़ाई का  वक़्त मेरे मस्तिष्क की स्लेट पर इलाहाबाद के नाम से अमिट लकीर की तरह दर्ज है।

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इलाहाबाद में मेरा जन्म हुआ। वहाँ हमारा अपना घर था। पिता जी आईटीआई लि. नैनी में इंजीनियर थे। प्राइमरी की पढ़ाई वहीं  की, सेकेंडरी स्कूल मैंने गोण्डा जिले के आईटीआई लि. मनकापुर से किया। ग्रेजुएशन के लिए दोबारा इलाहाबाद आया। फिर वही कीडगंज, रामबाग, कटरा, मनफोर्ड गंज, यूनिवर्सिटी रोड, दारागंज, अल्लापुर,करेली स्कीम, चौक, में घूमना फिरना होने लगा। ये सब मोहल्ले मेरे दिमाग़ में बचपन से अंकित थे लेकिन ग्रेजुएशन के दिनों में इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ते हुए मेरा मन नहीं करता था कि मैं अतरसुइया या मीरापुर जाऊं जहाँ मेरा बचपन बीता। दरअसल बचपन में बनी छवि को तोड़ने से मैं डरता था। 

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बचपन की वो ज़िंदगी बहुत इलाहाबादी टाइप थी। हम खूब क्रिकेट खेला करते थे। दुनिया जहान की बातें किया करते थे। अमेरिका, सीआईए, केजीबी सब हमारी बातों में शामिल होता था। हिन्दू, मुसलमान, क्रिश्चियन, पंजाबी हर परिवारों के बच्चे साथ साथ खेला करते थे। होली दिवाली में हमारे घर से मुस्लिम और क्रिश्चियन परिवारों के घर त्योहारी जाती थी, ईद पर हमारे घर आती थी। क्रिसमस की तो बात ही क्या थी, मोजेज अंकल के घर शानदार पार्टी होती थी हम बच्चों की केक, चॉकलेट और न जाने क्या-क्या। हम अज्जन की दुकान से पाँच पैसे और दस पैसे में मुट्ठी भर टॉफ़ियाँ और कम्पट ले आया करते थे। मोहल्ले में गाने और फिल्मी डायलॉग वाले कैसेट ऊँची आवाज़ में बजा करते थे। 

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छुटभैये नेता इस तरह से अपने वजूद का अहसास कराते रहते थे। दिवाली में हम पजावा और एक और रामलीला जिसका मुझे अब नाम नहीं याद आ रहा उसके बीच की होड़ देखा करते थे। मुठ्ठीगंज में निकलने वाली झांकियाँ मैंने पिता के कंधे पर बैठ कर देखी हैं। बलुआघाट के मेले में तो एक बार छोटा भाई खो ही गया था। कल्याणी देवी या संगम पर लेटे हुए हनुमान मन्दिर के दर्शन हमारे लिए वीकएंड पिकनिक जैसा था। होली पर जुलूस का जुलूस आता था, पिता जी घर के बाहर रंग की बाल्टियाँ रख देते। गुझिया, पापड़ की थालियाँ रख दी जाती थीं। जुलूस में शामिल लोग आते, बधाई देते और खाते पीते और आगे बढ़ जाते थे। जान पहचान की ज़रूरत ही नहीं थी। इलाहाबाद की संस्कृति ने सबको जोड़ रखा था।

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फिर धीरे धीरे मैंने माहौल को बदलते देखा। इंदिरा गाँधी का ज़माना था। हमारे घर ‘अमृत प्रभात’ नाम का अखबार आया करता था। उसमें अजीब सी अजीब ख़बरें छपने लगीं थीं। हिन्दू मुसलमान ज़्यादा होने लगा था लेकिन अभी भी सब कांग्रेसी ही थे। एक दंगे की धुंधली सी याद है। बारिश का दिन था। कर्फ़्यू लगा था। घर में मम्मी पापा, अड़ोसी पड़ोसी बैठ कर ताश खेल रहे थे। चुटकुलेबाज़ी हो रही थी, तभी खिड़की से पीएसी के जवान ने झांका। ऊँची आवाज़ में पूछा क्या हो रहा है। मैं पुलिसवालों को देख कर डर जाया करता था। मेरी सांसें थम गईं। पिता जी ने बताया कर्फ़्यू है तो वक़्त काट रहे हैं। उसने कड़कदार आवाज़ में कहा ये सब बंद करो। खेल ख़त्म हो गया। तभी एक दिन की बात है माँ बड़ी तेज़ी से घर आईं, पिता जी का वीकऑफ़ बुधवार या बृहस्पतिवार को हुआ करता था, पिता जी भी उस दिन घर पर थे। माँ ने उनसे कहा जल्दी से टीवी खोलो इंदिरा गाँधी को गोली मार दी है। हम टीवी के सामने बैठ गए। मोहल्ले वाले और भी लोग घर में आ जुटे। मैं करीब दस साल का हो चुका था, धुंधली सी ही यादें हैं टीवी पर कुछ भीड़ वीड़ दिख रही थी। 

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दूसरे दिन तो मोहल्ले में अजीब सा माहौल था, न जाने कहाँ कहाँ से लोग आ गए। नारेबाज़ी करने लगे थे। हमारे मोहल्ले में सबसे अमीर सिख और पंजाबी थे। उनके घरों पर पत्थरबाज़ी होने लगी। उस दिन मैं बिल्कुल नहीं डरा, डरने की कोई बात नहीं थे। भीड़ में बच्चे बड़े बूढ़े सभी थे। एक सिख बिजनेसमैन जो न जाने क्या बिजनेस करता था लेकिन बहुत अमीर था। उसका बंगला था जिस पर झूले पड़े रहते थे। उसके घर को आग लगा दी। आज भी मेरे दिमाग़ पर कल देखी फ़िल्म की तरह ये सीन ताज़ा है। मैंने बाल खुले हुए एक आदमी को देखा, उसके गले पर जलता टायर था। वो सड़क पर भाग रहा था। दूसरे दिन सेना शहर में फ़्लैगमार्च कर रही थी। लेकिन हमें डर नहीं लग रहा था। 

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फिर चुनाव हुए। अमिताभ बच्चन को मैंने सफेद शॉल में देखा। मीरापुर में उनकी सभा में मैं छोटे बच्चा होने का फ़ायदा उठा कर उनके मंच पर बैठा था। अमिताभ ने इलाहाबाद को इंटरनैशनल एयरपोर्ट बनाने का वादा किया था। जगह-जगह पोस्टर लगे थे। एक पोस्टर में लिखा था कि, ’अमिताभ मारे बेतैं बेंत, बहुगुणा भागे खेतैं खेत’।  एक और पोस्टर में हेमवती नन्दन बहुगुणा सीढ़ी लगा कर कह रहे थे इतना लम्बा है मैं तो इसे नहीं छू पाऊंगा।  जुनेजा ऑन्टी माँ को बता रही थीं कि लोगों ने कॉलेज की लड़कियों ने वोट पर लिपिस्टिक से मुहर लगाया था। 

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लेकिन वक्त फिर बदला और भागते हुए लोगों को दोबारा मैंने सन 86 या शायद 87 में देखा। ज़बरदस्त माहौल गरमा चुका था। हमारे मोहल्ले के पास ही रसूलपुर शुरू हो जाता था। एक दिन मोहल्ले के तारिक भाई आओ और माँ से पूछा कि अमित कहाँ है। तब मेरा नाम अमित हुआ करता था, माँ ने कहा बाहर खेल रहा है, तारिक सबसे चीख चीख कर कह रहा था। सभी लोग घर के अन्दर चले जाएं। भीड़ इस मोहल्ले पर हमला करने आ रही है। माँ को मेरी चिन्ता हुई, उसने तारिक से ही कहा अमित को ले आए। तारिक पास के मैदान से मुझे लगभग घसीटते हुए लाया। गोद में उठा कर हमारे घर के बाहर बरामदे में फेंक दिया। तभी हमारे बिल्कुल नजदीक एक बम आ कर गिरा। 

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मोहल्ले के सभी दरवाज़े धड़ाधड़ बन्द होने लगे। धार्मिक नारे गूंजने लगे। गोलियाँ चलने लगीं। माँ हम चार भाई बहनों को मन्दिर वाले कमरे में ले कर हनुमान चालीसा पढ़ने लगी। पिता जी का तब तक आईटीआई मनकापुर ट्रांसफर हो चुका था। बच्चों की पढ़ाई और मकान की वजह से वो हमें अपने साथ नहीं ले गए। मैं बहुत शैतान था। बड़ी दीदी के कहने के बावजूद बार बार खिड़की से देख रहा था। देखा कि हमारे ही मोहल्ले के नसीम भाई अपनी छत से अल्लाह हू अक़बर के नारे लगा रहे हैं। उनकी छत से गोलियाँ चलाई जा रही हैं। उनके घर के पास ही एक लालाजी का घर था। वो ठेकेदार थे, ठेके पर रिक्शा चलवाया करते थे। उनके दो घर एक साथ थे. वहाँ हर वक़्त एक आध दर्जन लोग रहते थे। वहां भी हथियार थे। वहाँ से हर हर महादेव के नारे गूँज रहे थे। उनके घर से दंगाइयों को जवाब दिया गया। नारेबाज़ी के इस शोर में पुलिस का पता नहीं था। क़रीब एक घंटे बाद सब शान्त हो गया। पुलिस आई। बहुत ज़्यादा पुलिस आई। हम घरों से बाहर निकले। कई घर जला दिए गए थे। कुछ घरों में दंगाइयों ने घुस कर मारपीट की थी। महिलाओं से बदसलूकी की थी। इलाहाबाद में एक बार फिर कर्फ़्यू लग गया।
तभी मैंने पहली बार किसी नेता का इतना बड़ा काफ़िला देखा। हेमवती नन्दन बहुगुणा की शायद कांग्रेस में वापसी हो चुकी थी। सफेद ऐंबेसडर कारों का काफ़िला। वो देखने आए थे कितने मकान जले। कितने बचे। ज़ख़्म कितना गहरा था।  उमा शंकर बाजपेयी। इलाहाबाद के एसएसपी थे। तभी उनकी मौजूदगी में हिन्दू मंत्र और मुस्लिम ‘मंत्र’ की आवाज़ के साथ अतरसुइया पुलिस चौकी की नींव रखी गई। पुलिस चौकी किसी सरहद की तरह हो गई। हिन्दू और मुस्लिम मोहल्ले के बीच दीवार खिंच गई।  माँ तभी पहली बार बताया था वो देखो वो गोल टोपी वाला अफ़सर है न वही शहर का कप्तान है। तुम्हें भी ऐसे ही बनना है। मैंने यूपीएससी की तैयारी नहीं की। मुझे पत्रकार बनना था जिसके बीज इलाहाबाद के माहौल में ही शायद पड़ गए थे। बहरहाल शहर का माहौल बिगडने लगा। पिता जी जब भी मनकापुर से आते उन्हें परिवार को लेकर ज़्यादा असुरक्षा महसूस होने लगी। आखिरकार उन्होंने मकान बेंच दिया। हम सभी एक बड़े ट्रक में सामान रखवा कर मनकापुर रवाना हो गए। 

मेरा इलाहाबाद। मेरे बचपन का शहर छूट गया। लेकिन क्या मेरे इलाहाबाद को कोई मेरी यादों से बेदखल कर सकता है। शायद कभी नहीं। ये इलाहाबाद मेरी शख़्सियत का हिस्सा है। असल में मैं अपनी जड़ों से कटा इलाहाबादी हूँ।
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