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बुजुर्ग प्रेमी का भावुक ख़त, डार्लिंग ! अब प्यार मोहब्बत का नहीं, तू नहीं और सही का जमाना है

- यशवंत कोठारी

मेरी प्यारी , सबसे पहले तो मुबारकबाद कि तुम इस हरामी दुनिया से जल्दी चली गयीं, हालत अत्यंत ख़राब है. अब दुनिया रहने लायक नहीं रही, हर महिला एक मादा है व हर पुरुष एक जानवर. मैं भी पहले जैसा सुंदर नहीं रहा. बाल सब उड़ गए हैं, कुछ जो बचे थे, उसे ज़माने की हवाओं ने उडा दिए. दो चार सफ़ेद लटें बची हैं, दांत व आंत साथ छोड़ चुके हैं. आँखों पर मोटा चश्मा है, फिर भी कुछ नहीं दीखता है. डाक्टरों ने कई बीमारियाँ बता दी हैं जिनका इलाज वे मौत ही बताते हैं. खाना पीना सब बंद सा है. सड़क पर निकलना मौत को दावत देना है. नींद आये बरसों हो गए हैं. बस तुम्हारी याद है, जो हर समय आ जाती है. सडक पर निकलने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है. लड़कों की बाइक से बच भी जाओ तो लड़कियों के स्कूटर से नहीं बच सकते. पैदल चलने वालों को जीने का कोई हक नहीं है. ऐ बूढ़े मरेगा क्या? मरने के लिए तुझे मेरी ही गाड़ी मिली थी, जैसे उपदेश सुनने पड़ते हैं.

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प्रिय ! ये रात गहरी हो चली है, सामने टेबल लैंप की पीली रोशनी मेरी नाकामी पर हंस रही है ! 

प्राण प्यारी ! वहां स्वर्ग या नरक में तो सब अच्छा होगा, लेकिन इस मृत्यु लोक में सब कुछ घटिया, बेकार व नकली हो गया है. दूध, दही, घी को छोडो, साग सब्जी, फल फूल तक नकली मिल रहे हैं. दवाइयों की मत पूछना, जल्दी मरना हो तो अस्पताल जाना चाहिए. कई लोग सिर्फ इसलिए मर गए कि वे अस्पताल में भरती हो गए थे. डार्लिंग ! आजकल शादी विवाह व प्रेम प्यार मोहब्बत के ज़माने नहीं रहे. तू नहीं और सही और नहीं और और सही का जमाना है. सोशल मीडिया व मोबाइल ने दुनिया बदल के रख दी. पण्डे पुजारी बाबा लोग कब किसको दबोच लें कुछ कहा नहीं जा सकता.


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शाम को दिल बहलाने के लिए गली के नुक्कड़ तक जाता हूँ और कभी-कभी पास के पार्क में . वहां चंद बूढ़े एक कोने में बैठ कर प्रलाप करते हुये दिख जाते हैं , मैं भी इस प्रलाप में शामिल होने की कोशिश करता हूँ . इस झुण्ड में जातिवाद, पेंशन, मेडिकल, सातवाँ वेतन आयोग व बढा हुआ डी ए कब मिलेगा, इसी की बात होती है. या फिर कौन की बैठक है? सुबह घूमना अच्छा रहता है, मगर पार्क तक जाएँ कैसे? फिर नयी पीढ़ी का हो हल्ला, कीर्तन मंडलियाँ, लगभग धक्का देती भीड़, और लगभग विकलांग बुड्ढ़े, कोई कैसे इस दुनिया को संभाले. मंदिरों तक में छेड़छाड.

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एक ख़त उस दोस्ती के नाम, जो अब शायद तुम्हारे लिए बेमानी है!

कभी-कभी दर्शन कर बूढ़े साग सब्जी का झोला लेकर घर की और जाते भी दिख जाते हैं. बहुएं बनाएगी तो खायेंगे, नहीं रामजी की मर्जी. प्राण प्यारी! तुम सुखी हुईँ जो जल्दी चली गयी. मैं तो काट लूँगा, बुढ़ापा. पार्क में बच्चे मजाक करते हैं कभी मेरे कपड़ों में जानवर छोड़ कर भाग जाते हैं, कभी गेंद उछाल कर सर पर गिरा देते हैं. मगर यह अच्छा लगता है क्योंकि ये देश की भावी पीढ़ी हैं और हम सब खंडहर जिन्हें देखने अब कोई नहीं आता. इस जर्जर इमारत की मरम्मत भी कोई नहीं कराना चाहता. कल पण्डे जी मर गए. सब ने यही कहा-डोकरा सुखी हुआ, साल छह महीने और जी लेता तो क्या फली फोड़ लेता.

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सात साल की तड़प के बाद...मरने से पहले आखिरी ख़त, प्रिय सूफ़ी ! क्या तुम ये चिठ्ठी पढ़ोगी? 

अब कोई नहीं कहता दादाजी नानाजी कहानी सुनाओ, बच्चे हैं ही नहीं या फिर एकाध, जो स्कूल टूशन, डांस क्लास, पजामा पार्टी में व्यस्त हैं. जीवन ठहर गया हो ऐसा नहीं है, लेकिन सब कुछ बदल गया है. हाईटेक हो गई है जिन्दगी. गजेट्स के सहारे भाग रहीं है जिन्दगी. बूढ़े यहाँ मिसफिट हैं. वैसे अपने बच्चे सब मस्त हैं. मैं भी अब जल्दी ही बिस्तर समेट कर आता हूँ. वहाँ थोड़ी सी जगह रख लेना. तुम किसी बात की चिंता मत करना, मृत्यु लोक में सब कुशल मंगल है. 
तुम्हारे बिना जी नहीं लगता. 
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