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इतनी क्रूरता कहां से आ गई कि एक घायल पुलिस अधिकारी को घेर-घेर कर मार दिया गया?

-आशुतोष तिवारी
मेरे देशवासियों ! 
इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या पर एक रिपोर्ट पढ़ रहा था। खून जम गया। सुबोध दंगाइयों के साथ पहली झड़प में लगभग घायल हो चुके थे। जब उनके साथी उन्हें अस्पताल ले जाने लगे, दंगाइयों ने फिर से उनकी कार को घेर लिया। इतनी क्रूरता कहाँ से आ गयी कि एक घायल पुलिस अधिकारी को घेर-घेर कर मार दिया गया? वह दंगाई किस बात का बदला लेना चाहते थे? इंस्पेक्टर की बहन बताती हैं कि वह अख़लाक़ केस के प्राथमिक जांचकर्ता थे। संविधान के खिलाफ इतना गुस्सा कौन भर रहा है? क्या यह सवाल अब बिना जवाब का रह गया है? 

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सुनो गोभक्तों, विश्वगुरुओं और दो पाया जानवरों, मैं तुम्हारी 'गऊ माता' बोल रही हूं 

शान्ति, साझा संस्क्रति  और आजादी कांग्रेस और बीजेपी से बढ़ कर है।हमारे मुल्क के बाशिंदों ने इन मूल्यों को पाने में संघर्ष की सदियां कुर्बान की हैं। हम सभी को खुद से एक सवाल करना चाहिए कि क्या हम इसकी  कीमत समझते हैं? पिछले कुछ सालों से हो रही घटनाएं यह यकीन नहीं दिलाती कि हम एक बेहतर नागरिक बन रहे हैं।

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हमें याद रहना चाहिए कि हमारे साथ ही कई देशों का संविधान बना था। लेकिन संविधान का जितना सफल इम्प्लीमेंट अमेरिका और  भारत में हुआ , ऐसा कहीं नहीं। पाकिस्तान में उस पर किस तरह काम हुआ, किसी से छुपा नहीं। हमारे देश का संविधान न सिर्फ लोगों ने अंगीकार किया बल्कि उसकी ताकत को अभी तक सहेज कर रखा है। उसकी वजह यह है कि हमारे संविधान को जिन लोगों ने मिल कर तैयार किया, उन्हें भारत की जनता बेहद प्यार करती थी। हमें यकीन था कि आजादी की लड़ाई से तप कर निकले हमारे नेता हमारे बारे में गलत नहीं सोचेंगे।

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पर अब जो हो रहा है, हैरान करने वाला है। 'संकीर्ण हिंदुत्व' के जिस विचार को ख़ारिज कर दिया गया था, उस विचार पर यकीन करने वाले लोग सत्ता में आ गये। एक साल पहले इसी सरकार के एक मंत्री ने संविधान बदलने की बात कह दी। संविधान से यह दिक्कत लेफ्ट-राइट के दोनों अतिवादियों को शुरुआत से रही है, लेकिन अब संविधान की धारा के खिलाफ योजनागत तैयारियां हो रही हैं। एक देश के तौर पर हम खतरे में हैं, यदि किसी अफवाह के आधार पर लोगों की हत्याएं हो रही हैं और हत्याओं को सरकार के मंत्रियों द्वारा सम्मानित किया जा रहा है।

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