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मोहन भागवत को खुला ख़त, RSS कभी देश की बुनियादी समस्याओं पर बात क्योंं नहीं करता?

-शशि शेखर
आदरणीय भागवत जी, 
सादर प्रणाम, 
कुछ कठिन सवाल पूछने की हिम्मत कर रहा हूं. अभयदान मिलेगा, ऐसी उम्मीद है. आपकी संस्था दुनिया की सबसे बडी (शायद!) संस्था है. आज संघ वटवृक्ष है. इसकी कई शाखाएं है. यानी, संघ की सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक हैसियत आज हिन्दुस्तान के किसी भी संगठन-राजनीतिक दल से कहीं अधिक है. कुछ सवाल मेरे मन में कई सालों से हैं. 

• राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व की सबसे बडी संस्था है. तो क्या यह भारत के किसी कानून/सांविधानिक व्यवस्था के तहत पंजीकृत संस्था है? मसलन, क्या आरएसएस सोसायटी एक्ट या ट्रस्टीशिप एक्ट के तहत रजिस्टर्ड है या यह गैर पंजीकृत स्वतंत्र रूप से काम करने वाली संस्था है? ये सवाल इसलिए कि जहां हमारे देश में सांगठनिक काम करने के लिए किसी भी संस्था को रजिस्ट्रेशन करवाना होता है, ताकि आर्थिक खर्च आदि का ब्योरा व्यवस्थित किया जा सके, वहां आरएसएस जैसी विशाल संस्था का खर्च भी तो बहुत अधिक होगा? यदि आपकी संस्था भारत के किसी भी कानून के तहत पंजीकृत है, तो कृपया इसे सार्वजनिक भी करवा दें. ताकि, मेरे या अन्य किसी व्यक्ति के मन में कोई सवाल हो तो उसका जवाब मिल सके. 

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• यदि यह संस्था पंजीकृत नहीं है तो फिर इतनी विशाल संस्था किसके प्रति जिम्मेदार है? वैसे जिम्मेदार तो हम सब देश के प्रति ही हैं. लेकिन, देश के प्रति जिम्मेदार होने के साथ-साथ हमें देश के संविधान और कानून के प्रति भी जिम्मेदार होना होता है. इसलिए, यह सवाल उठेगा कि आरएसएएस जैसी विशाल संस्था अगर पंजीकृत नहीं है तो फिर इसकी उत्तरदायिता कैसे तय होगी या होती है? 

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• एक और अहम सवाल है, आर्थिक स्त्रोत से जुडा हुआ. जाहिर है, संघ के समर्थक-सदस्य पूरी दुनिया में हैं. तो यह जानना स्वाभाविक है कि दान/चन्दा आदि का स्वरूप क्या है? अगर संस्था पंजीकृत है तो किस तरह से दान/अनुदान/दक्षिणा आदि लेती है और अगर पंजीकृत नहीं है तो फिर यह दान/दक्षिणा लेने का तरीका क्या है? चूंकि, आपकी संस्था का सामाजिक स्तर पर एक बहुत बडा असर है, तो यह बताना भी समाज हित/देश हित में होगा कि संघ अपना आर्थिक प्रबन्धन कैसे करता है? क्या आपकी संस्था विदेश (विदेश में बसे भारतीय व्यक्ति/ कार्यरत भारतीय संस्था) से भी दान/अनुदान/दक्षिणा/चन्दा आदि लेती है? यदि हां, तो वह पैसा किस रूट से आता है? क्या विदेशी अनुदान/चन्दा/दान लेने के लिए आपकी संस्था ने गृह मंत्रालय से एफसीआरए अनुमति भी ली है? 

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• क्या आप मानते हैं कि लोकतंत्र में किसी भी एक गैर सरकारी संस्था को इतना ताकतवर/विशाल बनने की अनुमति मिलनी चाहिए, जो एक वक्त में सत्ता और सरकार के समानांतर बन जाए. वह भी एक गैर पंजीकृत संस्था को (यदि पंजीकृत है तो संघ को अब तक यह सार्वजनिक कर देना चाहिए).  

• जब कुछ दिन पहले आपने कहा था कि आपके पास भले ही मिलिट्री संगठन ना हो, लेकिन अगर देश को कभी जरूरत पड़ी तो आपके स्वंयसेवक सेना से पहले ही 3 दिन में तैयार हो जाएंगे. स्वयंसेवकों की संख्या तो लाखों में है. तो क्या ये संभव है कि एक दिन आप अपनी सेना ही बना लें? यदि अगले 100 साल में कोई ऐसे संघ प्रमुख आए, जिनके मन में ये ख्याल आया तो फिर क्या होगा? हालांकि यह आशंका मात्र है. वैसे, मैं देखता हूं कि प्राकृतिक आपदा या दुर्घटना की स्थिति में स्वयंसेवक बहुत ही शानदार तरीके से राहत कार्य में जुट जाते हैं. लेकिन, लाखों स्वयंसेवकों की ऊर्जा के चैनलाइजेशन, और वह भी सकारात्मक दिशा में, के लिए क्या आपके पास कोई रोडमैप है? क्या आप देश को ये भरोसा दिला सकते हैं कि इस ऊर्जा का कभी गलत दिशा में भटकाव नहीं होगा? और वह भी एक ऐसी स्थित में जब इतनी विशाल संस्था भारत के किसी भी कानून के तहत न पंजीकृत है और न ही इसकी सांविधानिक उत्तरादायिता तय है. (अगर पंजीकृत है तो इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए). 

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भविष्य का भारतदिल्ली में आयोजित तीन दिन के कार्यक्रम में आपने भविष्य के भारत पर कई सारी बातें कहीं. लेकिन, बहुत सारे ऐसे भी मुद्दे थे, जिन्हें आपने छूना जरूरी नहीं समझा. संघ की बात और विचार का जहां सरकार समेत समाज पर भी असर है, तो ऐसी स्थिति में आप देश की मूल समस्या जहरीला पानी, जहरीली जमीन, जहरीली हवा, महंगी शिक्षा-स्वास्थ सेवा पर बात क्यों नहीं करते? संघ कभी किसी कॉरपोरेट दबाव में नहीं आ सकता. फिर भी आप ऐसे मुद्दों को नहीं छूते, क्यों? 

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क्या आप मानते हैं कि 377, 370, तीन तलाक आदि ही इस देश की जनता की बुनियादी समस्या है? आपने हिन्दुत्व की बात की. मुस्लिम की बात की. कहा कि मुस्लिम के बिना हिंदुत्व नहीं. ये तो सही बात है. फियर ऑफ एनेमीज (दुश्मन क अभय) ही तो वो कारण है, जिसे दिखा कर आज भाजपा अपनी राजनीति कर रही है. वैसे आपको भी यह एहसास होगा कि हम लाख हिन्दुत्व की रट लगाते रहें, लेकिन हिन्दू धर्म अन्दर से कितना बंटा है. इसकी एक झलक बिहार चुनाव के दौरान ही मिल गई थी. जब आपने आरक्षण के समीक्षा की बात कही थी, फिर परिणाम क्या हुआ. जिस देश का मजबूत तबका (सवर्ण) अपने कमजोर भाइयों के आरक्षण को ही नहीं सहन कर पाता, वहां क्या हिन्दुत्व एकता की बात? 

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मेरे मन में यह भी सवाल उठता है कि लाखों स्वयंसेवकों वाली संस्था आखिर सरकार के स्वच्छता कार्यक्रम में भागीदारी क्यों नहीं करती? क्यों नहीं नदियों की सफाई में स्वयंसेवक योगदान देते हैं? ताकि इस देश के लोगों को जहरमुक्त पानी तो मिल सके. क्यों नहीं लाखों स्वयंसेवक किसानों के दुखदर्द को दूर करने के लिए फील्ड में जाते हैं? आपके पास तो हजारों पूर्णकालिक प्रचारक हैं. आखिर वो क्या प्रचार करते हैं? क्यों नहीं वो देश की जनता को बताते हैं, सरकार को बताते हैं कि कैसे हम इस देश की पानी-जमीन-हवा को जहरमुक्त बना सकते हैं. ताकि, इस देश की आने वाली पीढी शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ रह सके. 

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आपने कहा है, 'संघ कोई बंद संगठन नहीं है कि डॉक्टर हेडगेवार ने कुछ वाक्य बोल दिये तो हम उन्हें ही लेकर चलते रहें. डॉक्टर हेडगेवार से हमें बदलने की अनुमति मिलती है. इसलिए वक्त के साथ हमने ख़ुद को बदला है.' तो बदलिए सर, पारदर्शी बनिए. बता दीजिए देश को कि आपकी संस्था पंजीकृत है या नहीं है? 

वैसे भी जहरीली जमीन-हवा-पानी और सड़ रही जवानी से कैसा भविष्य का भारत बनाएंगे? इसलिए, अपने मुद्दों को भी बदलिए सर. प्रणाम
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