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प्यारी दीदी के नाम चिट्ठी, 'मैंने इस ज़िन्दगी को खुद चुना है, मुझे अपना मुक़दमा खुद लड़ना होगा'

- आशुतोष तिवारी

प्यारी दीदी, 
आज जब मैंने सुबह खुद को शीशे में देखा, मुझे यकीन नहीं हुआ कि क्या मैं वही लड़का हूँ, जिसे तुम अपना भाई कहती हो। मुंह से अनायास निकलते सर्दियों के कोहरे की एक परत शीशे पर जम गई और सब कुछ धुंधला हो गया। जमी हुई धुंध साफ हो रही थी और एक अजनबी चेहरा शीशे के ठीक पीछे से मेरी तरफ देख रहा था। 'तुम यह आदमी हो ही नहीं सकते'...अपने अस्तित्व से इतना इनकार मैं सालों से करता आ रहा हूँ और अब अपने वजूद के तिनके मात्र पर भी यकीन करना मुश्किल हो रहा है।

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स‌ुनो भाई, मुझे याद हैं गुजरात और पंजाब में मार दिए गए वो तमाम बेगुनाह! 

पर्स चोरी जैसी वाकये मुझे परेशान नहीं करते। मुझे तो इस बात की खुशी हुई कि उस दिन 'हाथ से लिखा गया एक सालों पुराना खत' उसमें नहीं था, जिसे मैं हमेशा अपने पर्स में रखता था। मुझे इस दुनिया के किसी बाशिंदे से भी कोई शिकायत नहीं है। बचे रह गए शिकवों को लेकर पिछले दिनों मैंने एक अभियान चलाया था। उसी के अंतर्गत मैं तमाम लोगों को या तो माफ कर चुका हूँ या उनसे माफी मांग चुका हूं। मुझे किताबों और सिनेमा ने भी तब तक ही परेशान किया, जब तक वह मेरे तमाम और अजीब से सवालों का कत्ल करते रहे। तुम अगर मेरी ज़िंदगी के सहयात्रियों में भी मेरे लिए कुछ खोजोगी तो तुम्हें उनके जहन में रखी मेरे नाम वाली पोटली में सिर्फ 'बेशुमार परवाह' और 'शर्तहीन प्रेम' मिलेगा। मुझे ईश्वर से भी अब कोई शिकायत नहीं है क्योंकि उसके 'होने का अर्थ मुझे रायना के प्रेम में मिलता रहा और उसके 'नहीं होने' का अनुवाद अखबार से हर रोज़ निकलती सिसकियां करती रहीं।

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जीवन से भरे तमाम लोगों के बीच रहते–रहते मैं खाली हो गया हूँ !

मैंने एक सुन्दर घर बना लिया है, जो यकीनन हम सब का सपना था। लेकिन मैंने किस घड़ी अपने मन का घर तमाम अदृश्य पीड़ाओं और अंतहीन यातनाओं को दे दिया, मुझे खुद नहीं पता चला। आती-जाती बीमारियां जीवन का हिस्सा मानी जाती हैं। दीदी, सबसे खतरनाक वह बीमारियां होती हैं जो किसी मेहमान की तरह नहीं आतीं। न ही वह किराए पर आती हैं। वह इस तरह आती हैं जैसे उनका घर आप से खाली कराने आयी हों। क्या कोई बीमारी मुझे खाली कराने आयी है? मैं नहीं जानता। लेकिन मैं अब हर आती-जाती सांस, रक्त के मद्धिम स्पंदनों और दिल मे तयशुदा ढंग से डोल रही नियमित धड़कनों के बीच टूट रहा हूँ। 

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मां, यह शहर लगभग बीमार हो चुके लोगों की रचना है !

जीवन की तमाम खौफनाक नैतिकताओं में से एक है कि खुद के प्रति ईमानदार रहा जाए। मैं समय के कुछ हिस्सों के बीच यह करने में असफल रहा हूँ। मुझे काफ्का के पिता का दबाव याद आता है, जिसकी वजह से वह अपने उपन्यास के जरिये दो पैरों वाले आदमी से चार पैर वाले कीड़े में बदल गया। बैंक की एक ऐसी नौकरी जिसकी तिकड़मों और नौकरी करने की अपनी मजबूरियों को वह मरते दम तक नहीं समझ पाया। इसीलिए 'द ट्रायल' में एक सुबह कुछ बूट पहने लोग उसे उठा ले गए और उस पर एक ऐसा मुकदमा चला, जिसकी पेचीदगियों को वो उपन्यास के आखिर तक न समझ सका।

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सुनो शहर ! तुम अब उनके नहीं रहे, जिन्होंने तुम्हें तुम्हारा आकार दिया था

द ट्रायल कोई उपन्यास नहीं है, बल्कि काफ्का की अपनी ज़िंदगी थी, जिसे उसकी मजबूरियों ने मुकदमा बना दिया। एक ऐसा अंतहीन मुकदमा जो उसके मरते दम तक उसके जीवन पर चलता रहा। मैं उसकी पीड़ा समझ सकता हूं। जो बात मेरी समझ से परे है, वह यह है कि काफ्का ने वह ज़िन्दगी मजबूरी में चुनी थी। मैंने इस ज़िन्दगी को खुद चुना है। क्या मुझे अपने जीवन को 'द ट्रायल' बनने देना चाहिए।? मुझे नहीं पता। मैं बस अपनी खिड़की से कई बार बर्फ की झिल्लियों को महसूस करता हूं, जो यकीनन कमजोर तो दिखती हैं पर तोड़ी नहीं जा सकती। यह झिल्लियां हमारा समाज, हमारे लोग और हमारा आडम्बर बनाता है।

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प्यारे दोस्त के नाम एक चिट्ठी, सुना है आजकल तुम दुनिया का सबसे मुश्किल काम कर रहे हो?

मेरी दीदी। तुम प्रेम, मेहनत और निश्छलता के मामले में मेरी प्रेरणा रही हो। मुझे अब भी याद है कि किस तरह हम गर्मियों की रातों में पसीने के साथ लालटेन की रौशनी में घण्टों पढ़ा करते थे। कई बार भाषण प्रतियोगिताओं के ठीक पहले की रात मेरी बेचैनी तुम समझती और जब मैं उन्हें जीत कर लौटता, तुम्हारे चेहरे पर मुझे लेकर मुझ से ज्यादा यकीन दिखता। न जाने कितनी दफ़ा मेरे लिए तुम अजनबियों से लड़ती रही। मुझे पता है कि मेरी समस्याएं अगर मेरी बनाई नहीं होतीं तो तुम उनसे भी लड़ जाती। पर सब कुछ अपने हाथ में तो नहीं होता न दीदी। मेरी ज़िंदगी का ट्रायल शायद अंतहीन है। यह मेरी ज़िंदगी का मुक़दमा है। मुझे इसे खुद लड़ना होगा। तुम्हारी मजबूती और मुझ पर यकीन इस लड़ाई में मेरी प्रेरणा रहेंगे।
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