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फ्री मेट्रो राइड पर ई श्रीधरन को खुला ख़त, आख़िर आप सच्चे 'मैन' निकले मेट्रोमैन सर !

- सुजाता

आदरणीय श्रीधरन जी,
दिल्ली सरकार द्वारा मेट्रो और बसों में महिलाओं के लिए स्वेच्छा से टिकट लेने के प्रस्ताव पर अपनी ताज़ा चिट्ठी में आपने कहा है कि 'सब जानते हैं कि यह इलेक्शन गिमिक है' यह सच है कि सब जानते हैं। फिर क्या आपके 'सब' में स्त्रियां शामिल नहीं हैं? या आपको लगता है उन्हें कुछ समझ में नहीं आता? एकदम बजा फरमा रहे हैं कि यह स्त्रियों के वोटों को अपनी तरफ़ करने के लिए है। लेकिन क्या यह कम महत्वपूर्ण है कि स्कूल जाने वाली एक लड़की से लेकर नौकरीपेशा-गैर नौकरीपेशा औरतें इसमें खुश हैं? इलेक्शन गिमिक ही सही, स्त्रियों के वोटों को पाने के लिए स्त्रियों को ही फ़ायदा दिया जा रहा है, जाति-धर्म के मुद्दे पर उनके मर्दों को नहीं। कितना तो अच्छा है कि स्त्रियों को आप वोट मान रहे हैं। भूल गए तीन तलाक़? कौन नहीं जानता था कि बीजेपी इस मुद्दे के पीछे क्यों हाथ धोकर पड़ी है, इसके बावजूद प्रगतिशील मुस्लिम महिला संगठन चाहते थे हैं तीन तलाक़ बैन हो। 

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सर, आप किसी मुग़ालते में हैं कि 'फ्री फ्री फ्री मेट्रो राइड फ्री' सुनते ही स्त्रियां अपनी गाड़ियां सोसायटी के अंदर पार्क करके पैदल या रिक्शे से मेट्रो स्टेशन जाने लगेंगी और ठुसी हुई मेट्रो में चढ़ जाएंगी। बहुत साफ़ बात है कि जिस तबके को और जिन स्त्रियों को लाभ मिलना है अंततः उन्हीं को लाभ मिलेगा। कोई लड़की फ़रीदाबाद से नौकरी करने निकलती है आईटीओ पर तो उसके परिवार के लिए बड़ी शांति होगी कि वह मेट्रो से आ-जा रही है। एक सरकारी स्कूल की लड़की अपना मनचाहा स्कूल चुन सकेगी कि अब उसके माता-पिता को आने-जाने का खर्च नहीं करना पड़ेगा। उनके सपनों की क़ीमत आपको कभी समझ में नहीं आएगी।

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जब सरकार ही अपने प्रस्ताव में प्रतिदिन बल्क में टोकन खरीद लेने की बात कह रही है तो मेट्रो कैसे बर्बाद हो जाएगी? स्त्रियों को चार सुविधाएं देने से देश नष्ट हो जाते हैं? एक वेलफेयर स्टेट क्या इसी तरह सोचे? टेक्स पेयर स्त्रियां नहीं हैं क्या? टैक्स देने से पहले स्त्रियां कहती हैं क्या कि हमें घर से निकलने की इजाज़त नहीं, तो रोड टैक्स क्यों दे? प्रॉपर्टी तो मर्दों में ही बंटेगी फिर हम सारी जिंदगी चूल्हा-चौका क्यों करें? सत्ता तो मर्दों के ही हाथ आनी है फिर हम वोट देने के लिए लाइन में खड़े क्यों हो? 

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यह टैक्स पेयर का अहंकार क्या है? टैक्स पेयर देश को हर तरह से बेहतर बनाने के लिए टैक्स देता है, किसी डीटीएच सर्विस के चैनल्स का पैक नहीं ख़रीदता कि जो चैनल देखूंगा उसी का पैसा दूंगा? जो सुविधा इस्तेमाल करेंगे बस उसी के लिए टैक्स देंगे? ऐसे बनते हैं देश?

टेली कम्युनिकेशन, हाइवे टोल टैक्स, ऑटोमोबाइल, उच्च-शिक्षा में ढेर-ढेर पैसे और नीतियों का भयानक खेल आपकी समझ से भी परे है। और आपको लगता है औरतों के टिकट लेने न लेने से मेट्रो बर्बाद हो जाएगी? औरतें मुफ्त पैदा होकर मुफ्त में चाकरी करने के लिए हैं? पीक आवर की भीड़ मर्दों की ही रहे तो ठीक है? महिलाओं की भीड़ से दिक्कत है? कितनी घृणा है औरतों के लिए आपके पास? 

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जेण्डर-संवेदनशील नीतियां क्या होती हैं, इस समझने के लिए थोड़ा कम 'मैनली' होने की ज़रूरत है सरजी! आप लगातार इस देश के केंद्र में बैठे फ़्यूडल लॉर्ड्स से सम्बोधित हैं, अगली चिट्ठी लिखने की बजाए ज़रा इस देश की स्त्रियों को किसी नुक्कड़ पर सम्बोधित करके देखिए, ठीक इसी भाषा में, आप माकूल जवाब पाएंगे।
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