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पद्म भूषण अनुपम खेर के नाम खुला ख़त, आप असल जिंदगी में भी वैसे ही हैं, 'विदूषक' की तरह !

Photo Courtesy: The Hindu
- रवींद्र रंजन 

पद्म भूषण अनुपम खेर जी,

स‌बसे पहले तो आपको पद्म भूषण स‌े स‌म्मानित होने पर बहुत-बहुत बधाई। दूसरी बात, आपने पाकिस्तान जाने का ऑफर ठुकरा कर बहुत अच्छा किया। पाकिस्तान की ओर स‌े आपको वीजा न देना निंदनीय है। आपके विचार कुछ भी हों या फिर कुछ भी न हों। फिर भी, आपको अपनी बात रखने का पूरा हक है। स‌िर्फ इस आधार पर आपको पाकिस्तान आने स‌े रोकना गलत है कि आपके विचार उसे पस‌ंद नहीं या आपके विचार स‌े वह असहमत है। लेकिन एक बात स‌मझ में नहीं आई कि आपने पाकिस्तान जाने के लिए हामी कैसे भर दी? आप तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'भक्त' हैं और भक्त तो 'देशद्रोहियों' को पाकिस्तान भेजने की धमकी देते हैं। खुद थोड़े पाकिस्तान जाते हैं? आप तो देशभक्तों की श्रेणी में आते हैं। देश में जबर्दस्त सहिष्णुता है, यह बताने के लिए दिल्ली में आपने अपने चेले-चपाटियों के स‌ाथ जो मार्च निकाला था, वह आपके देशभक्त होने का स‌बसे बड़ा स‌बूत है। 'देशद्रोही' तो वो हैं जिन्हें इस देश में 'असहिष्णुता' नजर आती। लिहाजा पाकिस्तान तो उन 'देशद्रोहियों' को जाना चाहिए था।

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वैस‌े पाकिस्तान ने तो आपको वीजा ऑफर करके अपनी गलती स‌ुधार ली। आपने भी खुद को बिजी बताकर कराची जाने स‌े इनकार कर दिया। इसे ही कहते हैं 'स‌ांप भी मर गया लाठी भी नहीं टूटी'। पाकिस्तान जाना भी नहीं पड़ा और उसके नाम पर इतना स्यापा करके पब्लिसिटी बटोरने का मौका भी मिल गया। वैसे पब्लिसिटी स्टंट करना तो एक्टर्स के खून में होता है। अभी तक इस तरह के किरदारों में आपको फिल्मी पर्दे पर ही देखा था। हैरानी हुई यह देखकर कि आप असल जिंदगी में भी वैसे ही हैं, जैसे पर्दे पर। बिल्कुल 'विदूषक' की तरह।  

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पता नहीं आपने पाकिस्तान जाने का स‌ूटकेस कैसे तैयार कर लिया? आपकी बयानबाजी देखकर तो यही लगता है कि आप पाकिस्तान जाना ही नहीं चाहते थे! स‌िर्फ आपको पाकिस्तान के नाम पर बवाल काटना था और खुद को पीड़ित दिखाकर ये स‌ाबित करना था कि हिंदू होने की वजह स‌े आपको पाकिस्तान ने नहीं आने दिया। सवाल ये है कि कराची लिटरेचर फेस्टिवल के लिए जो बाकी 17 लोग आमंत्रित किए गये हैं, उनमें भी तो ज्यादातर हिंदू ही हैं? हो स‌कता है आपकी नजर में वो स‌ेक्युलर, देशद्रोही, गद्दार, कांग्रेसी, वामपंथी वाली श्रेणी के हिंदू हों! और आप ठहरे मोदीभक्तों की जमात के खालिस  स‌र्टिफाइड देशभक्त। शायद इसीलिए पाकिस्तान को आपका वहां आना पसंद नहीं आ रहा होगा!




इस स‌बके बावजूद अगर आपको पाकिस्तान जाना ही था तो वीजा के लिए गिरिराज स‌िंह, योगी आदित्यनाथ, स‌ाक्षी महाराज, स‌ाध्वी प्राची, प्रवीण तोगड़िया आदि स‌े स‌ंपर्क कर स‌कते थे। बस उनके स‌ामने 2002 के दंगों के पीड़ितों के स‌ाथ इंसाफ न होने की बात उठा देते, या फिर ये पूछ लेते कि कालाधन वापस कब आएगा? ये स‌ुनते ही वो आपको फोकट में ही पाकिस्तान भेज देते। न इतनी परेशानी झेलनी पड़ती और ना ही अखबारों, टीवी चैनलों, ट्विटर और फेसबुक में इतनी फजीहत होती। अब तो आलम ये है कि आपको लेकर चुटकुले गढ़े जा रहे हैं। कोई कह रहा है अनुपम पाकिस्तान जाकर क्या करते, हैंडपाइप तो स‌नी देओल ही उखाड़ लाए थे? तो कोई लिख रहा है कि अनुपम के पास अब 'भाईजान' बनकर जाने का ऑप्शन भी नहीं है। गीता तो ऑलरेडी भारत आ चुकी है और इंदौर की स‌ंस्था में रहकर उस दिन को कोस रही है, जब उसकी कथित तौर पर 'घरवापसी' हुई थी। एक जगह पढ़ा कि वीजा न मिलने के बाद आपके पास स‌लमान खान का फोन आया और स‌ल्लू भाई ने आपसे कहा है कि वो आपको बॉर्डर के तारों के नीचे पाकिस्तान छोड़कर आएंगे। क्या यह स‌च है? आप जैसे ही एक मोदीभक्त ने गुस्से में लिखा है- "‎अनुपम खेर‬ क्या करना चाहते हैं ये तो वे ही जानें। मुझे तो बस इतना पता है कि कोई भी राष्ट्रवादी हिन्दू पाकिस्तान जाने की बात सपने में भी नहीं सोचता है।"

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जितने मुंह उतनी बातें। पता नहीं कितना स‌च है और कितना फसाना। आपकी एक्टिंग के प्रशंसक एक स‌ाहब ने तंज कसते हुए लिखा है कि जो लोग कल तक दूसरों को पाकिस्तान भेजने पर तुले थे, आज वो ही पाकिस्तान जाने को उतावले हो रहे हैं। एक स‌ज्जन ने स‌ही स‌वाल उठाया कि एक तरफ हम हैं जो अदनान शामी को भारतीय नागरिकता दे रहे हैं तो दूसरी तरफ पाकिस्तान है, जो हमारे उम्दा कलाकार को वीजा तक नहीं दे रहा है। घोर असहिष्णुता है ये तो। वाकई बड़ी नाइंसाफी है। कुछ लोग आपको 'पद्म भूषण' मिलने पर असमंजस में हैं। वो स‌मझ नहीं पा रहे हैं कि आपको पद्म भूषण 'कला' के लिए मिला है या 'कलाकारी' के लिए? ये तो आप बेहतर जानते होंगे या फिर मोदी स‌रकार। हमें इससे क्या लेना देना? आपके अपमान स‌े फुंका पड़ा आपका एक प्रशंसक लिखता है कि पाकिस्तान से मानवता की उम्मीद लगाना बिल्कुल वैस‌ा ही है जैसे मोदीजी से अच्छे दिनों की उम्मीद लगाना। आप उसकी इस बात स‌े स‌हमत तो हैं ना? आपके एक फैन का फेकबुक स्टेटस पढ़कर तो दिल गार्डेन-गार्डेन हो गया। उसने लिखा है- अमेरिका ने मोदी को वीजा नहीं दिया वो प्रधानमंत्री बन गये, अनुपम को पाकिस्तान ने वीजा नहीं दिया, तो वह पक्का ‎स‌ंयुक्त राष्ट्र‬ स‌ंघ के महासचिव बनेंगे। आमीन।

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अनुपम जी, स‌ुना है आजकल आपको हिंदू होने की वजह स‌े भी डर लगने लगा है। एक इंटरव्यू में आपने कहा कि आपको डर इस बात का है कहीं लोग आपको आरएसएस से जुड़ा या बीजेपी का कट्टर समर्थक न स‌मझ लें? जनाब, आपका ये डर पूरी तरह बेमानी है। उलटा आपको तो बेखौफ हो जाना चाहिए। आरएसएस और बीजेपी स‌े जुड़ा होना आजकल बेखौफ होने का पर्याय हो गया है। किसी को भी मार दो, पीट दो। कहीं भी आग लगा दो। किसी को भी बीफ खाने आरोप लगाकर या हिंदू विरोधी बताकर जान स‌े मार डालो। स‌रकार आपका पूरा स‌ाथ देगी। पूरा मोदी मंत्रिमंडल आपके बचाव में खड़ा हो जाएगा। इसलिए हिंदू या मोदी स‌मर्थक होने की वजह स‌े डरना तो आप बिल्कुल ही छोड़ दें। दबंग हिंदू की तरह व्यवहार करें। जैस‌े बजरंग दल, भगत स‌ेना, श्रीराम स‌ेना जैसे स्वयंभू देशभक्त स‌ंगठन के कार्यकर्ता करते हैं। किसी स‌े डरने की जरूरत नहीं। जब मोदी भये पीएम तो डर काहे का? जब आरएसएस के हाथ में स‌रकार तो डर काहे का? वैसे फेसबुक पर किसी ने ये भी लिखा कि अगर आपको हिंदू होने स‌े डर लगता है तो आपको हिंदू धर्म छोड़ देना चाहिए। हिन्दुस्तान में डर लगता है पाकिस्तान जा नहीं सकते, जियें तो जियें कैसे?

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अनुपम जी, आप 2010 में कही गई अपनी उस पुरानी बात को लेकर भी पीछे न हटें, जिसमें आपने पद्म अवॉर्ड्स की आलोचना की थी। कुछ 'देशद्रोही' टाइप के लोग आपकी इस बात को लेकर खिंचाई कर रहे हैं कि आपने जिस अवॉर्ड की आलोचना की उसे मौका पाते ही लपक किया। आप ऎसे लोगों को जवाब क्यों नहीं देते कि 2016 के अवॉर्ड मोदी, बीजेपी और आरएसएस की 'देशभक्त स‌रकार' ने आपको दिये हैं, जबकि इससे पहले तक कांग्रेस जैसी देशद्रोही और हिंदू विरोधी स‌रकार पुरस्कार बांटा करती थी। इसलिए तब अवॉर्ड्स की आलोचना बनती थी, अब तारीफ।

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अब कुछ गंभीर बात। अनुपम जी, स‌च-सच बताएं, अचानक स‌े आपको हो क्या गया है? यह स‌ब आप क्यों कर रहे हैं? इसके बारे में लोग तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं। आपको अभिनेता स‌े नेता बनने का शौक चढ़ा तो इसके पीछे कोई तो वजह होगी। लोग तो स‌िर्फ अंदाजा लगा स‌कते हैं। असल वजह तो आपको ही पता होगी। स‌ंभवत: आपको अमित शाह की तरफ स‌े कोई आश्वासन मिला हो। या फिर आप 'कुछ और' पाने की 'उम्मीद' में ये स‌ब कर रहे हों। किसी स‌े उम्मीद रखना गलत नहीं है। उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है, लेकिन अगर कोई उस उम्मीद को पूरी करने के लिए अपनी शख्सियत स‌े ही खिलवाड़ करने लगे तो शक होना लाजिमी है। अभिनेता के तौर पर आपने जो इज्जत, शोहरत और प्यार पाया है, नेता (वो भी देश का नहीं, स‌िर्फ एक कौम का) बनने की कोशिश में क्यों उसे गंवाने पर तुले हुए हैं?

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किरण बेदी तो याद हैं न? उन्हें भी नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अरुण जेटली की तिकड़ी ने दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने का आश्वासन दिया था। बेचारी स‌ीधी थीं, कुछ महत्वाकांक्षी भी तो उनकी बातों में आ गईं। उसके बाद कैसी फजीहत हुई, स‌ब जानते हैं। कहां तो देश की पहली महिला आईपीएस अफसर होने का तमगा लटकाकर शान स‌े घूमती थीं, मुख्यमंत्री बनने की चाहत में वो भी छिन गया। इंदिरा गांधी की गाड़ी उठवाने की कहानी का भी पटाक्षेप हो गया। अगर नेतागिरी के चक्कर में न पड़ती तो पहले वाली स‌ाख आज भी कायम रहती। एक स‌ीनियर जर्नलिस्ट और अंग्रेजी अखबार के स‌ंपादक रहे एमजे अकबर भी हैं। इनके लिए राज्यसभा की कुर्सी ही स‌ब कुछ थी। कुर्स‌ी पा ली। लेकिन भाजपा की प्रवक्तागिरी करते हुए जब वो कभी मोदी का बचाव करते हैं, कभी जेटली या अपनी पार्टी के अन्य नेताओं का, तो किस कदर बेबस और बेअसर नजर आते हैं? देखकर लगता है जैसे बीजेपी ने कोई बंधुआ मजदूर रख लिया है और शाहनवाज, मुख्तार अब्बास नकवी की तरह ही उसका 'नाम' ही उस‌की स‌बसे बड़ी योग्यता है।

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एक आशुतोष भी हैं। कहां तो चैनल का स‌ंपादक बनकर 'डंके की चोट पर' स‌वाल-जवाब करते थे और कहां अब खुद ही एक स‌वाल बनकर रह गये हैं। ना ही चेहरे पर पहले जैसा रौब नजर आता है और ना ही बातों में वो असर। स‌ंपादक स‌े नेता बनने के लिए बाद स‌वाल पूछने का हक नहीं रहा। अब स‌िर्फ जवाब देने होते हैं। उनके स‌वालों के भी जिन्हें स‌ंपादक रहते वो डांट-डपट दिया करते थे। आज खुद डांट-डपट स‌े गुजरना पड़ता है। अपने स‌े दोयम को भी बर्दाश्त करना पड़ता है। टीवी चैनलों में घूम-घूमकर अपनी पार्टी का बचाव करना पड़ता है। कई बार तो आंसू भी बहाने पड़ते हैं। इन स‌बके बदले में क्या मिलेगा? ज्यादा स‌े ज्यादा राज्यसभा की स‌ीट।

अनुपम जी, स‌मझदार के लिए इशारा काफी है। अब फैसला आपको करना है कि उठने के चक्कर में आपको कितना 'गिरना' है। वैसे पिछले कुछ दिनों में आपने खुद को काफी हद तक गिरा लिया है। यह दुखद है। हैरत होती है, जब आप जाहिल मोदी भक्तों की तरह ट्वीट करके आलोचकों को 'बरनॉल' लगाने की सलाह देते हैं या फिर बौखलाकर शशि थरूर को कांग्रेसी चमचा करार देते हैं। जबकि चमचा शब्द तो आप पर ज्यादा फिट बैठता है। जो व्यक्ति किसी पद और जिम्मेदारी पर न होने के बाद भी ऎसी हरकतें करता है वही असली चमचा कहलाता है, क्योंकि चमचागिरी स‌े वह कुछ 'हासिल' करने को लालायित रहता है। जैसे आप। हासिल क्या करना चाहते हैं वह आप ही जानें। बस ये फैसला कर लें कि आप चाहते क्या हैं? आपको 'स‌ारांश' के बेहतरीन अभिनेता के तौर पर पहचाना जाए? या फिर चमचागिरी करके 'उपकृत' होने वाले राजनीति के एक 'विदूषक' के तौर पर?

थोड़े लिखे को बहुत स‌मझें।
आपका ही एक प्रशंसक 
4 फरवरी, 2016
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