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मेरी पहली चिट्ठी

-हरिमोहन पिल्लै

मुझे बचपन से ही चिट्ठी लिखने का बड़ा शौक़ था, शायद बचपन में हर बच्चे को होता हो या नहीं भी, मगर मुझे था और आज भी है। पहली चिट्ठी मैंने 50 पैसे के पोस्ट कार्ड पर लिखी थी अपने नानाजी को, कुछ ख़ास नहीं था उसमें, मुश्किल से 30 शब्द भी नहीं होंगे उसमें,  लेकिन वो भी मैंने माँ और अपनी छोटी बहिन से छुपा-छुपाकर लिखी थी, क्योंकि मुझे लगता था कि चिट्ठियाँ छुपाकर ही लिखी जाती हैं। हालाँकि उन 30 शब्दों में जितने भी शब्द थे वो मैंने कई बार पेन्सिल से लिखे और मिटाए थे, माँ से पूछा था कि क्या लिखूँ, और तब पहली बार आदरणीय, सादर, कुशलमंगल जैसे शब्दों को लिखा और उनके मतलब जाने थे।

नानाजी को लिखी गयी उस चिट्ठी का उत्साह इतना ज्यादा था कि मैंने गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर जाने के कुछ ही दिन पहले वो चिट्ठी लिखी थी, और उस चिट्ठी के पहुँचने से पहले मैं ख़ुद उनके घर पहुँच गयी थी और ख़ुद ही अपनी चिट्ठी पोस्टमैन से ली थी। मैं देखना चाहती थी वहां से लाल डब्बे में डालने के बाद चिठ्ठी नानाजी के यहाँ से लाल डब्बे में निकलेगी तो कैसी दिखेगी, क्या-क्या बदलेगा उसमे, कैसे बदलेगा, और पता नहीं कितने ही सवाल थे।

फिर हाथ में आने के बाद ख़ुद ही चिट्ठी नानाजी को पढ़कर सुनाई, और बहुत ख़ुश हुई कि मैंने अपनी चिट्ठी लिखी और वो नानाजी को ख़ुद ही पढ़कर भी सुनाई। उसके बाद नानाजी से ज़िद करके एक चिट्ठी अपने नाम से लिखवाई उनसे और कहा कि जब मैं यहाँ से जाऊं तब ही इसे पोस्ट करना, तब पहली बार मुझे D/o का मतलब समझ आया था, अपने नाम से आने वाली वो मेरी पहली चिट्ठी थी, मन तो ऐसे खुशियों से हिलोरें भरता था जैसे मुझे न जाने कहाँ का खजाना मिला हो। उसके बाद फिर मैंने मामाजी को चिट्ठी लिखी, नानाजी को भेजी गयी चिट्ठियों में जब उन्होंने मेरी कुछ गलतियाँ देखीं तो कहा कि अब तुम मुझे भी लिखा करो, मैं तुम्हारी गलतियों में सुधार करवाऊंगा।

फिर तो मज़ा दुगना हो गया, मामाजी को बम्बई चिट्ठी भेजना मेरे लिए सबसे चहेता काम बन गया, और उसमे लिखती क्या थी, मेरी पढ़ाई अच्छी चल रही है, माँ ठीक हैं, बहिन ठीक है, पापा ठीक हैं और स्कूल वगैरह में कुछ ख़ास हुआ होता तो वह लिख देती, फिर बदले में मामाजी मुझे उस चिट्ठी में मेरी गलतियाँ बताते, और समझाते कि इस तरह लिखोगी तो और अच्छा रहेगा। उसके कुछ टाइम बाद मैं अंतर्देशीय पर चिट्ठी लिखने की ज़िद करने लगी, माँ से कहती कि आप अपनी चिट्ठी छुपाकर भेजती हो, और मुझे पोस्ट कार्ड देती हो, पूरा पोस्टल ऑफिस मुझ पर हँसता होगा, मेरी गलतियों पर, अब मैं भी छुपा कर भेजूंगी. मुझे भी अंतर्देशीय पर लिखना है।

माँ मना करतीं कि – तुझे कुछ लिखना तो होता नहीं, इतना बड़ा अंतर्देशीय ख़राब करेगी, मगर ज़िद करके मैंने एक-दो बार उस पर भी लिखा। फिर बड़े हुए और धीरे-धीरे चिट्ठियों का दौर ख़त्म हो गया। फिर जब ग्रेजुएशन में आई तो एक ख़ास दोस्त बनी, जो मेरे शहर में नहीं थी, उस वक़्त हमारे पास फ़ोन था, लेकिन हम दोनों को ही एक-दूसरे को लैटर भेजने में बड़ा मज़ा आता था, कुछ सालों तक वह चला, लेकिन फिर ईमेल ने उसे भी ख़त्म कर दिया। ये जानते हुए भी कि ईमेल मेरी बात जल्दी पहुंचा सकता है, मुझे उसमे वो मज़ा, ललक, उत्सुकता महसूस नहीं होती जो एक लैटर में होती है। मुझे आज भी चिट्ठी लिखने का दिल करता है, किसी ऐसे इंसान को जो चिट्ठी लिखने की मेरी उत्सुकता को समझे, मैं जो कहना चाहती हूँ वो उस तक पहुँचने में कुछ वक़्त ले, फिर उसे पढ़ने की ख़ुशी, उत्सुकता और मज़ा। वाक़ई यह मेरे लिए सुखद अहसास है, और लैटर लिखने की मेरी ख्वाहिश आज भी उतनी ही ताज़ा है जितनी पहली चिट्ठी के वक़्त थी।

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डिंग डान्ग... दरवाज़े पर घंटी बज रही है. दोपहर के दो बजे है. इस वक़्त कौन घंटी बजाएगा? हाँ, शायद डाकिया मामा हैं. दो बजे तो वोही घंटी बजाते थे. उसे भी सुने हुए शायद अरसों बीत गए... जब से इ-मेल आ गया है. पहले वह  घंटी बजाते थे. मैं दौड़ कर जाती, दरवाज़ा खोलती. एक मुस्कान के साथ वह गिन गिन कर चिट्ठियां मेरे हाथ में थमाते थे. माँ जी की चिट्ठी , छुटकी की चिट्ठी, पिताजी की चिट्ठी, बड़े भैय्या की चिट्ठी...कितनी चिट्ठियां आती थीं. डाकिया मामा को चिट्ठियां  देने में और  मुझे उनसे लेने में एक अजीब सी ख़ुशी का अहसास होता था.थैंक यु मामा कहकर मैं चिट्ठियां पलट पलट कर देखती... यह किसकी है... वह किसकी है... बूढ़े मामा मुस्काते, नाक पर चश्मा दबाये, दूसरे घरों की तरफ चल देते, चिट्ठियों से भरी अपनी झोली सँभालते... और आजकल...

माँ जी भी ई-मेल ही भेजती हैं... मामा ने घंटी बजाना भी छोड़ दी थीं, जब से इ-मेल का ज़माना आ गया है, और चिट्ठियां दरवाज़े के नीचे से डाल देते क्यों कि उन्हें पता था उनमे कुछ ख़ास नहीं है... शेयर के डिविडेंड, टेलीफोन बिल, वगैरह...
हिचकिचाहट के साथ मैं दरवाज़ा खोलती हूँ. वाकई डाकिया मामा हैं! वोही पुरानी मुस्कान... कितने अरसों के बाद देख रही हूँ यह मुस्कान.
मामा के हाथ में एक लिफाफा है. मेरे हाथ में थामकर वह कहते हैं,
‘बेटी पानी पिलाओ’
‘हाँ’, चिट्ठी को उलट पलट कर देखती हूँ मैं और रसोई की तरफ चलती हूँ. लिखाई काफी जानी पहचानी सी है... लिफाफे के पीछे कुछ लिखा तो नहीं है...
मामा को पानी का गिलास देकर मैं लिफाफे पर अपने नाम और पते को ध्यान से देखती हूँ.
मेरा नाम.
कितने दिनों के बाद अपना नाम लिफाफे की हलकी पीली पर्त पर देख रही हूँ... नीली स्याही से लिखी. नाम भी तो बदल गया है.
मिस मधु शर्मा से मिसिस मधु वर्मा.
नाम के पहले खुद की फिसिकल प्रॉपर्टी और नाम के पीछे वलेंसी बांड की तरह एक केमिकल प्रॉपर्टी – विमल कहा करता था... आज अचानक विमल की क्यूँ याद आ रही है?
‘बेटी... शुक्रिया...’
डाकिया मामा ने खाली  गिलास मेज पर रखते हुए कहा तो मैं जैसे अपने ख्यालों से जागी.
मामा झोली सँभालते हुए निकले और मैं दरवाज़ा बंद करके बेडरूम की तरफ चल दी.
दोपहर की गर्मी से दूर, ठंडक और आराम में लिपटे बेडरूम में कितना सुकून है...
उनका स्टडी टेबल, कंप्यूटर, किताबों से भरी अलमारी वगैरह एक तरफ, कपड़ो से भरी अलमारी, मेरा ड्रेसिंग टेबल, शृंगार की सामग्रियां सब एक तरफ, दो दीवारों के बीच ज़रुरत से ज्यादा बड़ी, गद्दों, तकियों से भरा डबल बेड , फर्श पर कालीन, बिस्तर के सिरहाने की दीवार पर आठ दस छोटी छोटी मधुबनी तस्वीरों का एक ग्रुप और ऊपर दो स्पॉट लाइट्स... यह है मेरी अपनी दुनिया... विवाह के बाद...
लिफाफे को खोलते हुए पता नहीं क्यूँ ऐसा लगने लगा कि मैं फिर से बीस बरस की हो गयी हूँ, जब कॉलेज में पढ़ती थी. लिफाफे के अन्दर सलीके से मोड़ कर रखे, नोट बुक में से फाड़े गए, नीली रेखाओं से भरे एक कागज़ को देखकर कॉलेज की दीवारों की सीलन भरी महक जहाँ यादों की परतों से उमड़ कर बहार आई, वहीँ दिल की धड़कन भी कुछ उन्ही दिनों की तरह बेलगाम सी हो गयी...
विमल... विमल की लिखाई है यह तो...
मैं भी आखिर विवाहित होने जा रहा हूँ. सोचा तुम्हारी फरमाइश के गीत के मुखड़े को लेकर तुमने मुझसे जो कविता लिखने को कही उसे पूरी ही कर दूं...
तुम आओ रुमझुम करती पायल की झंकार लिए...
तुम देखो नयनो में भरकर प्रीत की रिमझिम धार प्रिये
तुम पूछो मुझसे मैं क्यूँ हूँ गुमसुम सुबहो शाम प्रिये
तुम बैठो एक पल यूँ ही संग मेरे आँखों में आँखें डाल प्रिये
तुम बूझो मेरे इस मन की अनबूझ पहेली आज प्रिये
तुम समझो तो जानू मेरे दिल का हाल प्रिये
तुम ही तो हो वह सुन्दर सपना टूटा जो कल रात प्रिये
तुम आओ रुमझुम करती पायल की झंकार लिए...
तुम्हारी दोस्ती ने मुझे जीवन में एक सही दिशा की प्रेरणा दी थी. बस इस से ज्यादा मैं कुछ चाहता भी नहीं था. आशा करता हूँ तुम सुखी हो और मेरे सुखी जीवन के लिए प्रार्थी रहोगी...
- विमल
शाम हो रही है. उनके दफ्तर से आने का समय हो रहा है.
क्या कहूँ क्या सोच रही हूँ...
कई बार पढ़ चुकी हूँ यह आखिरी चिट्ठी.
कुछ रिश्ते चिट्ठियों में ही सीमित रह पाते हैं...
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