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संस्कृत कभी भी पूरे समाज या देश की भाषा नहीं रही, इसे जबरन थोपना गलत है

"संस्कृत" नाम से ही प्रतीत होता है कि बहुत प्रयास करके जिसे सुधारा निखारा गया हो। ऐसी भाषा जिसे बन्द समूहों में कैद रखकर निर्मित और विकसित किया गया हो। पाली और प्राकृत सहित पिशाचि (गोंडी से मिलती जुलती भाषा) इस देश के भूगोल और इतिहास में बहुत विस्तार से फैली रही है। गोंडी तो आज भी फैली है। यह संस्कृत भाषा भारत की मूल भाषाओँ को इस्तेमाल करके बनाई गयी है। इसीलिये यह कभी भी पूरे समाज या देश की भाषा नहीं रही। ये कभी भी लोकभाषा नहीं रही।

जैसे इस देश के देवी देवता, त्यौहार, कलाएं, गीत संगीत, लोकनृत्य, विज्ञान और स्वयं धर्म को चुराकर नया धर्म बनाया गया है उसी तरह ये संस्कृत भाषा भी है। ये अभिजात्य की भाषा थी इसके पठन पाठन को बहुसंख्य जनों के प्रति अनुपलब्ध बनाया गया था। लेकिन इसी मूर्खता ने अंग्रेजी को महत्व दिलवा दिया है तो पुराने मठाधीश बौराये फिर रहे हैं। जिन लोगों को दुत्कारा गया उन्हीं को संस्कृत सिखाने निकल पड़े हैं।

इतिहास और पुरातत्व भी यही कहानी कहता है। प्राचीनतम शिलालेख जिस ब्राह्मी लिपि में बताये जाते हैं वो ब्राह्मी लिपि नहीं बल्कि धम्म लिपि है। खुद अशोक ने अपने शिलालेख में इसे धम्म लिपि कहा है। फिर इस धम्म लिपि का नाम ब्राह्मी लिपि किसने और क्यों रखा? और मजा ये कि भारत भर से एक भी आदमी इस लिपि या भाषा को पढ़ नहीं पाया है। क्या कारण हो सकता है? अभी हाल ही में हड़प्पा की सील पर लिखी भाषा पढ़ी जा सकी है और मजे की बात ये कि यह गोंडी भाषा के व्याकरण से एक गोंडी विद्वान - डॉ मोतिरावण कंगाली जी ने पढ़ी है।

ये भारतीय मठाधीश क्यों नहीं पढ़ सके? वे इतिहास पुरातत्व को क्यों नहीं खोज पाये? कारण साफ़ है। जैसे पुराने धर्मों को मिटाकर पुराणों की गप्प में उन्हें अदृश्य बना दिया गया उसी तरह पुराने इतिहास को उसकी भाषा सहित हाशिये पर धकेल दिया गया। बहुसंख्य भारतीयों को और स्त्रियों को शिक्षा से वंचित करना इसी का उपाय था।

संस्कृत भाषा के बारे में जो बात कही जाती है कि ये सभ्य भाषाओँ की माँ है यह बिल्कुल गलत है। असल में यह कई भाषाओँ की बेटी है जिसने उनके मूल व्याकरण से बहुत कुछ उधार लिया है और पुरानी भाषाओँ के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त नहीं की है। संस्कृत कभी लोकभाषा थी ही नहीं। राजप्रासादों और पुरोहित वर्ग की भाषा थी। यह भाषा ही भेदभाव शोषण और ज्ञान सहित बहुसंख्य जनों के मानव संसाधन की हत्या के लिए रची गयी थी।

संस्कृत को दुबारा लाने का मतलब सिर्फ भाषा को लाना नहीं है। उसके साथ उसका मनोविज्ञान और इतिहास भी लौटेगा। वही पाषाणकालीन माँन्यताएं और अतिशयोक्तियां फिर से लौटना चाहेंगी। ये एकदम भयानक बात है। अभी हिंदी में ही विज्ञान और तकनीक नहीं सिखा पा रहे हैं लौहपथगामिनी टाइप आविष्कारों ने बची खुची संभावना भी कुंद कर दी है। नाइट्रोजन को नत्रजन, आक्सीजन को उदजन, बनाया जा रहा है। इलेक्ट्रोन प्रोटोन और क्वांटा का कोई विकल्प नहीं। होना भी नहीं चाहिए। इससे भाषा के साथ विज्ञान भी मरेगा।

भारतीय भाषाओँ में विज्ञान शिक्षण की संभावनाएं बहुत कम है। इसीलिये अंग्रेजी को फैलाने की जरूरत है। संस्कृत एक विषय के रूप में बना रहे तो कोई हर्ज नहीं लेकिन उसे जबरन थोपना गलत है। सीधे स्कूल कॉलेजों से शुरू करना गलत है। ये डंडे का इस्तेमाल करने जैसा काम है। (source:facebook)
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