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यह चिट्ठी देश की हर बेटी के लिए है, स्त्री अधिकारों के सच्चे हिमायती भी इसे जरूर पढ़ें

- प्रेम प्रकाश 

लड़कियों...! चलो इधर। पढ़ो इसे और नोट करो अपनी डायरी में। तुम्हें मालूम तो होगा लेकिन फिर से पढ़ लो। 2005 मे ही बन गया था कानून कि हिन्दू परिवारों में लड़के और लड़कियों के बीच संपत्ति का समान बंटवारा किया जाएगा। एक बार फिर से पढ़ो। नोट भी करती चलो कि तुम्हें अपने पिता की स्थायी-अस्थायी सारी प्रॉपर्टी मे तुम्हारे भाइयों जितना ही अधिकार मिला हुआ है।

ये चिट्ठी इसलिए लिख रहा हूँ कि लड़कों के हाथ जोड़ना बंद करो। मत कहो कि दहेज मत लो। अब तुम खुद इनकार करो दहेज लेने से, दहेज का सामान अपने साथ ले जाने से। अपने माँ-बाप, भाइयों के सामने सीधी बात रख दो कि अपना दान, दहेज, नेग और खोइंछा सब रखिए अपने पास और मुझे दीजिये खेत में, मकान में, दुकान में, बैंक बैलेंस में, प्लॉट  में, गाड़ी में और धंधे में हिस्सा। इसके बाद दीजिये सुखी रहने का आशीर्वाद ....और कुछ नही चाहिए बोल दो।

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बड़ी चालाकी है, समझती नहीं हो तुम लोग। ....और क्लियर बताएं....? ऐसे समझो कि तुम्हारे माँ बाप भाई और बाकी घर वाले तुम्हें जो दहेज देकर विदा कर देते हैं न, वही तुम्हारे अंतहीन दुखों का दस्तावेज़ बन जाता है और उन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर होता है तुम्हारे माँ बाप का। क्योंकि आमतौर पर हर माँ-बाप पाणिग्रहण कराते समय ही कन्यादान भी कर देता है। अपने उन्ही माँ-बाप को बतियाते कभी सुना नही हैं क्या कि दान दी हुई वस्तु पर हमारा कोई अधिकार नही होता...? तो पहले दान कर देते हैं तुम्हें वस्तु बनाकर और फिर साथ मे लगा देते हैं दहेज का मुलम्मा। उसके बाद तुम्हें कोई दुख पड़े तो कहते फिरेंगे कि हमने बेटी बेची थोड़ी है। हम सबक सिखा देंगे। अरे क्या सबक सिखा देंगे अब आप...? बेची नही है, पर दान तो कर ही दी है!




दान किए पर अब आपका क्या हक़ भाई? मरने दो बेटी को। आपका बोझ तो कम हुआ...! आपकी ज़िम्मेदारी तो खत्म हुई। अब तो छाती फुला के घूमिए कि दो बेटे हैं साहब। अपने-अपने काम मे व्यस्त हैं। दो बेटियाँ हैं साहब, वो अपने अपने घर सुखी हैं। कहते हुए कलेजा चाहे जितना लरजता हो, जीभ जरा भर भी नही लरजती माँ बाप की। तो कलेजा ही लरजता रहे ज़िंदगी भर, ऐसा काम करना ही क्यों..?

लड़कियों, अब तुम्हीं उठाओ अपना झण्डा खुद और अपने माँ बाप के चरणों मे पड़ जाओ। कह दो कि मत करिए मुझे सुखी। हम दे लेंगे खुद को सुख। हमें बस प्रॉपर्टी मे हिस्सा दे दो। बाकी के एक नए या पुराने पैसे नहीं चाहिए हमें। बिलकुल नहीं चाहिए कह दो। कह दो कि हम नही ले जाएँगे साड़ियों और गहनों के बक्से। नहीं ले जाएँगे पर्स भर के नोट। नहीं ले जाएँगे टीवी, फ्रिज, गाड़ी, एसेट्स और विदाई का धन। मत ढँकिए मुझे कफ़न जैसा दिखने वाले उस सुनहरे ओहार में, जिसमे लिपटकर अंतिम विदाई जैसा एहसास होता है।

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कह दो कि मत करिए मुझे विदा। अरे शादी करनी थी तो विदा क्यों करने लगे भाई...! शादी करनी थी तो शादी करो, पर विदा मत करो। रहने दो मुझे भी अपने बाप की हैसियत में। शादी करके जब ससुराल जाओ तो अपने मन मोहन मियां मुशर्रफ को और उनकी माताजी को भी जरा कायदे से समझाओ। समझाओ ये कि ये मुंह दिखाई सब रखिए सलाद खाइएगा.....। वहाँ अपनी ननदिया को हिस्सा दिलवाओ और मकान में उसका हिस्सा खाली कर दो। कह दो कि रजिस्ट्री करिए पूरी प्रॉपर्टी में उसका हिस्सा उसके नाम। मायके की हो या ससुराल की।

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सारी लड़कियों को अपने गोल मे कर लो। सब मिल-जुलकर लड़ो। खुद ननद-भौजाई बनकर मत लड़ती रहो। इससे लड़ाई में कमजोरी आती है। सब मिलकर  खोलोगी तब खुलेगा इन लोगों की अक्ल का ताला। जंग बहुत पुरानी लगी है। उनकी स्ट्रेटजी को समझो और अपनी स्ट्रेटजी खड़ी करो। तब मिलेगी ताक़त और तब मिलेगी आज़ादी। एक घर मायके में भी होगा तो ससुराल की जमीन ज्यादा उछाल नही पाएगी तुम्हें। इन लोगों की चालाकी समझो। जाने अनजाने, अपनी बेटियों के दुश्मन तो वो माँ बाप ही बने बैठे हैं, जो अपनी बेटियों को उनका हिस्सा नहीं देकर दहेज देने के लिए जीवनभर एड़ियाँ रगड़ते रहते हैं। मेरी बात लिख के याद कर लो तुम्हारी आधी जंग को परिणाम मिल जाएगा। (प्रेम प्रकाश की फेसबुक वॉल से)
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