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संस्कृत के पैरोकार 'देशभक्तों' के घरों में झांककर देखिए, उनके बच्चे कहां पढ़ रहे हैं?

-संजय जोठे

जो लोग संस्कृत भाषा को अनिवार्य करना चाहते हैं उनके घर मे झाँककर देखिये। वे खुद और उनके बच्चे मिशनरी स्कूलों मे पढ़े/पढ़ रहे हैं। इस देश का सौभाग्य है कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को मिशनरी स्कूलों ने जिन्दा रखा और इसी कारण ये देश कुछ हद तक सभ्य हुआ। लेकिन अब 'भक्त मण्डली' बची खुची वैज्ञानिकता और सृजनात्मकता को भी मार देना चाहती है।

मनोविज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि जिस भाषा को बच्चे समझ नहीं पाते उसे रटना कितना खतरनाक होता है। कोई भी भाषा हो समझे बिना रटने से मौलिक सोच और जिज्ञासा खत्म हो जाती है। दुनिया की हर धार्मिक परम्परा में लाखों बच्चों को पवित्र भाषा में बहुत कुछ रटाया जाता है। अधिकांश मुल्कों में ये भाषाएँ अब प्रचलन में नहीं हैं। ऐसे तोता रटन्त बच्चे कोई नई खोज या सृजन नहीं करते। ये बच्चे सबसे मन्दबुद्धि, हिंसक और मिडियोकर साबित होते हैं, और यही सब धर्मों का अंतिम लक्ष्य होता है।

ऐसे बच्चों द्वारा कोई सृजन न कर पाने का एक गहरा कारण यह है कि सीखने की शुरुआत से ही उनके दिमाग में यह ठूंस दिया जाता है कि सीखने का मतलब रटना है। चाहे समझ में आये या न आये। ये पद्धति रटने वाले चतुर चूरण ही पैदा करती है। ऐसे चतुर चूरण भारत में बहुत पाये जाते हैं। ये अच्छे बाबू साबित होते हैं। दो हजार साल की गुलामी और जहालत ऐसे तोता रटन्त लोगों ने ही निर्मित की थी। अभी भी उनका पेट नहीं भरा लगता है।

विज्ञान के बाबू, तकनीक के बाबू, मैनेजमेंट के बाबू, राजनीति के बाबू, धर्म संस्कृति और दर्शन के बाबू। हर दिशा में मिडियोकर बाबुओं की फ़ौज भारत के पास है। लेकिन इन आयामों में मौलिक खोज और आविष्कार करने की न तो प्रेरणा है न रुझान है। न नोबेल हैं, न ओलम्पिक पदक हैं, न ऑस्कर हैं न कोई पेटेंट है इन बाबुओं के नाम। ले देकर शून्य का आविष्कार है और हर दशक में जनसंख्या के आंकड़े में बढ़ने वाले शून्य हैं। बस दुनिया को इतना ही योगदान दिया है इन्होंने।

99 प्रतिशत भारतीय बच्चों में विस्मय, कौतूहल और जिज्ञासा होती ही नहीं। हर चीज भगवान ने बनाई है। हर बात शास्त्र में समझाई गयी है। हर घटना का कोई दिव्य कार्यकारण संबन्ध है, जिस पर सवाल नहीं उठाना है। गुरु या शिक्षक से सवाल नहीं पूछना है बल्कि आज्ञा पालन करना है। ये भारत के बच्चों की प्रतिभा मिटा डालने का सदियों पुराना षड्यंत्र रहा है।

अब जो बच्चे पश्चिमी शिक्षा की कृपा से इस पुराने दलदल से छूट भागे थे उन्हें भी वापस घसीटकर इन दलदलों की तरफ लाने का उपाय हो रहा है। अमीर के बच्चे अंग्रेजी माध्यम में पढ़ेंगे और संस्कृत सहित संस्कृति की रक्षा का भार गरीब, दलित बहुजनों के बच्चे उठाएंगे। (फेसबुक वॉल स‌े)
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