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आपको पता है, हैदराबाद यूनिवर्सिटी में क्या हो रहा है?

-प्रीति रघुनाथ
मैं हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं की चिंताओं को केवल स्वर दे रही हूं। इसमें देर जरूर हुई, क्योंकि मैं मानकर चल रही थी कि हमें मीडिया की कवरेज जरूर मिलेगी। मैं मानती हूं कि विश्वविद्यालय के परिसर (जिसे हम सब नाज़ से कैंपस कहते हैं) में मीडिया के प्रवेश पर बंदिश लगा दी गई है, मगर हमें यह बात समझ में नहीं आती कि मीडिया को नागरिक स्वतंत्रता समूहों के साथ संवाद करने, कानूनी मोर्चे पर चल रहे घटनाक्रम का फॉलो-अप करने से कौन रोके हुए है। हम तो यह भी नहीं कह रहे कि मीडिया उन निहत्थे छात्रों के ऐंगल से स्टोरी को उठाए, जिन्हें कैंपस में सीआरपीएफ और रैपिड ऐक्शन फोर्स से निपटना पड़ रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि छात्रों को इन चीजों का सामना करना पड़ रहा है:

क) एक ऐसे कुलपति की वापसी का सदमा जिससे अब कोई सहानुभूति नहीं बची है और इसी के साथ उस प्रशासनिक संस्कृति की वापसी, जो बातचीत करने के बजाय आतंकित करना बेहतर समझती है।

ख) छात्रावासों में तकरीबन बंधक बना लिए जाने का भय जहां खाना/पानी/बिजली/इंटरनेट, शौचालयों तक छात्राओं की पहुंच और थोड़ी सहानुभूति भी मौजूद नहीं है। यहां तक कि खाना लेकर आने वाले वेंडरों को भी गेट से लौटा दिया जा रहा है।

ग) एक ऐसे सेमेस्टर के नाजुक अंत के कगार पर खड़ा होना जो बहुत संकटग्रस्त रहा है और जिसमें हमने अपने एक साथी को प्रशासनिक लापरवाही की बलि चढ़ते देखा है।

घ) एक ऐसे शहर में जीना जहां आने वाली गर्मियों में होने वाले पानी के संकट के साफ संकेत दिख रहे हैं।

रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या और उसके बाद के घटनाक्रम के पश्चात छात्रों ने अपने स्तर पर लगातार कोशिश की है कि वे अपने दुख और गुस्से के बीच समन्वय बैठाते हुए किसी तरह नियमित दिनचर्या में लौट आएं और पढ़ाई जारी रखें। मैं यह समझना आपके ऊपर छोड़ती हूं कि ऐसे बुरे हालात में फंसे छात्रों को अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या से इतर चल रहे अघोषित राजनीतिक घटनाक्रम को समझने में और उसे पचाने में इतना वक़्त क्यों लगा। हम युवा ऐसे आदर्शवादी हैं जो अभी हकीकत की दुनिया में प्रवेश करने की राह देख रहे हैं और मैं पक्के तौर पर कह सकती हूं कि आप भी एक नवाकांक्षी युवा पत्रकार के बतौर किसी न किसी मोड़ पर हमारे जैसे ही रहे होंगे।

इस नाते हम उम्मीद कर रहे थे कि आपके नियमित काम में हमारी नुमाइंदगी भी निष्पक्ष तरीके से होगी यानी आप देश में होने वाली खबर योग्य घटनाओं की रिपोर्टिंग ज़रूर करेंगे। मुझे अफसोस के साथ पूछना पड़ रहा है कि यदि छात्रों पर ऐसा भयावह दमन और राज्य की मिलीभगत से विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा खुलेआम की जा रही हिंसा दिल्ली के मीडिया में खबर के लायक नहीं है, तो फिर क्या है?

हमारे सहपाठी और साथी, रूममेट और हॉस्टलमेट पहले एक थाने से दूसरे थाने तक खींचकर ले जाए गए और अब (पिछली सूचना तक) चेरलापल्ली की जेल में पड़े हुए हैं। छात्रों पर लाठियां बरसाई जा रहीं थीं, उन्हें पीटा जा रहा था, चुनिंदा गालियों से नवाजा जा रहा था… लेकिन इन सबके बीच वे लोगों के लिए इन तस्वीरों और विडियो को अपलोड करने में जुटे हुए थे। छात्राओं को पकड़कर यातना दी गई, उन पर नस्लीय और भद्दी टिप्पणियां की गईं – हमारे यूनिवर्सिटी कैंपस में ऐसी चीजें नहीं होती थीं।

हम सभी एक प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा की डिग्री हासिल करने आए हैं और हम में से अधिकतर को सरकारी विश्वविद्यालय में इस स्तर की शिक्षा तक पहुंचने के लिए कठिन हालात का सामना करना पड़ा है। आखिर आपने हमारे खिलाफ राय क्यों बना रखी है? मुझे नहीं लगता हम इस बर्ताव के अधिकारी हैं। कोई भी छात्र इसका अधिकारी नहीं है। कम से कम, लोकतंत्र के पहरुओं की तरफ से तो बिल्कुल भी नहीं। (NBT से साभार)
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