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स‌ुनो भाई, मुझे याद हैं गुजरात और पंजाब में मार दिए गए वो तमाम बेगुनाह!

सुनो भाई,
तुम्हारे तमाम फोन कॉल्स जो अब मिस हो चुके हैं, उनके एवज में मैं ये खत लिख रहा हूँ। अभी तक उन तमाम न सुने जा सकने वाले सवालों का सार यही होगा 'कि मैं कैसा हूँ'.......'ठीक हूँ' भी लिख सकता था पर दो शब्दों से मिलकर बना ये जवाब मुझे बेचारा सा लगता है। गमबाजों से लेकर खुशमिजाज लोग तक इसे यूं ही चस्पा करते आये हैं। इसलिए जवाब में मैं एक खत लिख रहा हूँ।

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प्यारे दोस्त के नाम एक चिट्ठी, सुना है आजकल तुम दुनिया का सबसे मुश्किल काम कर रहे हो?

कहा जा सकता है कि ज़िंदगी का ये हिस्सा सबसे आराम भरा है। इस दौर ने किसी बात की शिकायत नहीं दी है। ज़िंदगी में भौतिक परेशानियों से इतना बेखबर मैं कभी नहीं रहा हूँ। जितने लोगों का प्यार इस वक्त मिल रहा है, इस तरह से कभी नहीं मिला है। और तो और, पहली बार मैं पहले की तरह प्यार को पूरी सम्पूर्णता से महसूस कर रहा हूँ। मैं जिसे भीड़ कहता था, वो धीरे-धीरे अपनी होती जा रही  है। पर मेरे भीतर एक अजनबी सा आदमी रहता है। यह आदमी तमाम छोटी-छोटी बातों से मिलकर बना है, जो एक लय में जीवन से गुजरकर मेरी डायरियों का पन्ना बनती चली गईं। इस आदमी को सिर्फ एक अहसास होता जिसे 'टीस' कहते हैं। यह 'बेवजह' की टीस है। एक अज्ञात सी टीस। यह टीस हर दिन के सरकने में शामिल है। जब भी मैं कभी अकेला होता हूँ ये मुझे अपनी मौजूदगी का एहसास करा देती है। कभी-कभी मैं चाहता हूँ कि काश कोई ऐसी दवा होती जिससे यह दूर हो सकती या इसके बारे में जान तो सकता। बहुत सोचने पर पाता हूँ कि यह टीस हमारे इर्द-गिर्द कि भौतिकता से जुडी हुई नहीं है।

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जीवन से भरे तमाम लोगों के बीच रहते–रहते मैं खाली हो गया हूँ !

मुझे अपनी क्रांतिकारिता के पुराने दिन याद आते हैं। मैं डायरी में उस वक्त के पन्ने पढ़ते-पढ़ते बेचैन हो जाता हूँ जब गन्दी सी जींस पहनकर मैं आंदोलन करने की ठान लिया करता था। मैं सचमुच गाय के खूंटे के पास बैठकर देश की समस्याओं पर रोया हूँ। आनन-फानन में उसी उम्र में दो किताबें भी लिख दी थीं, जो कम समझ और तमाम भाषाई गलतियों के कारण संभावित पाठकों के भी सामने नहीं आ पाईं। उन दिनों छत पर एक कुटिया बनाई थी। उस कुटिया की जगह अब पक्का कमरा बन गया है। वह कुटिया मेरी राजनीतिक साधना की गवाह थी। ये पक्का कमरा मुझे दिन पर दिन उस वक्त से बेखबर होते जाने की याद दिलाता है। सच है कि मैंने एक लम्बा अर्सा वेदना में जिया है। तमाम तकलीफें और ठोकरों के बीच मैंने देने लायक कुछ जुटा भी लिया है। पर आज का आशु अब वैसा नहीं रहा। वह राजनीतिक समस्याओं से कट सा गया है। उसका लेखन साहित्यिक हो कर गया है। यह वेदना इसलिए पाली थी कि अग्निधर्मा होकर समाज को रोशनी दिखा सकूँ। पर मैं वेदना के तमाम उपहारों के बीच गुमशुदा गया हूँ।

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मां, यह शहर लगभग बीमार हो चुके लोगों की रचना है !

सुनो भाई !!..मेरी तरह तमाम वक्त तुम भी अकेले रहे हो। अंतर ये है कि मेरी तरह तमाम जगह भटके नहीं हो। अपने भीतर के खालीपन को कभी भटकन का रास्ता मत दिखाना। भटकन का आदर्श बहुत निर्मम होता है। तुम्हारी ज़िंदगी का बहुत सा खाली हिस्सा मेरे हाथ में था, जिसे मैं भर सकता था। नहीं भर पाया, इसके लिए माफ़ कर देना। आजादी की अपनी ख्वाहिशें होती हैं और कुछ सीमाओं को मैं भी नहीं तोड़ सकता। कुल मिलाकर तुम ये जानते ही हो कि मैं कभी अच्छा साथी नहीं रहा हूँ। दरअसल खुद के करीबी रिश्तों का आकलन करता हूँ तो समझ आता है कि मैं साथी बनने के लिए बना ही नहीं हूँ। साथी की तमाम अपरिहार्यताएं मैं नहीं निभा पाता। तुम निभा लेते हो ये तुम्हारी खूबसूरती है।

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सुनो शहर ! तुम अब उनके नहीं रहे, जिन्होंने तुम्हें तुम्हारा आकार दिया था

भाई!! मुझे वो 32 करोड़ लोग अब भी याद हैं जिनकी आँखे सारी रात फुटपाथ पर लेटकर चाँद में रोटियां देखती रहती हैं। गुजरात और पंजाब में मार दिए गए वो तमाम बेगुनाह भी याद हैं जिनके परिवार न्याय की देवी को अंधा मान बैठे हैं। इस अन्याय के खिलाफ एक क्रान्ति होनी थी। क्रान्ति की कामना हममे से ही तो किसी को करनी थी। मैंने खुद से भी कहा था कि 'कुछ ऐसा करना है जिसे क्रांति जैसा कहा जा सके। इसके लिए मुझे आजकल नीत्से बहुत याद आता है। 'दुनिया में जो कुछ भी अद्भुत या अलग है उसका निर्माण बाजार की मक्खियों से दूर जाकर हुआ है।' नीत्से की इस बात में मैं  किसी रोज अपना भविष्य तलाश लूँगा। चलता हूँ। अपना ख्याल रखना।

आपका अनुज
आशुतोष तिवारी 
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