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सुनो शहर ! तुम अब उनके नहीं रहे, जिन्होंने तुम्हें तुम्हारा आकार दिया था

-आशुतोष तिवारी 

मेरे शहर,
मैं अब तुमसे विदा हो चुका हूँ। आंसुओं का भावुक सैलाब नहीं है। अफ़सोस की कोई जरूरत नहीं हैं। पेशे की मजबूरिया भी हैं और तुमसे कसावट की कमतरी भी। आँखों में आँखे डाल कर विदा हुआ हूँ। यह अतिरिक्त स्वाभिमान नहीं है, बल्कि तुम्हें उस  सच से रूबरू करा रहा हूँ जिसको शायद हर शहरी ने महसूस किया है।

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शहर ! तुम्हारे भीतर की संरचनाएं कठिन हैं। संस्थाएं बीमार हैं। हर तरफ चालाकी से बुना गया एक जाल है। तुमसे गुजरकर आदमी 'कम आदमी' हो जाता है। तुम्हारी कोख में दिन-रात तकलीफ की कितनी कहानिया पलती हैं। मैं कितनी आँखों में हर रोज सपनों का मरना देखता हूँ। तुम्हारी खूबसूरती बढ़ाता तुम्हारा हिस्सा बना ये फ्लाई ओवर उन लोगों की भटकन का गवाह है, जो कुछ करने की अफवाह में तुम्हारे पास आ गए हैं। काश मैं उन्हें बता पाता कि उनकी भटकन का आदर्श तुम नहीं हो। तुम विकास की अफवाहों पर बना एक सच्चाई भरा मिथक हो। तुममे गुजारा हर दिन खुद से दूर लेता जायेगा। इंसान को कम इंसान करता जायेगा। काश ! तुम्हें कभी इसका एहसास होता। अच्छा ही है। ये अहसास नहीं है। जिस दिन ये हुआ, उस दिन तुम आत्महत्या कर लोगे।


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हालांकि तुम अब तक मरे नहीं। बचे हो। क्योंकि तुममे नाजुकता शेष है। ये नाजुकता भी वो बची-खुची खूबसूरती है जो तुम्हारे  बाशिंदों ने अपने भीतर किसी तरह तुम से बचाकर रखी है। पता है! तुम पैदाइशी धोखेबाज नहीं थे। जैसे-जैसे तुम अमीरपरस्त होते  गए, तुम धोखेबाज होते गए। अब तुम विशुद्ध धोखेबाज हो गए हो क्योंकि तुम्हारी सौ फीसदी परिसम्पत्तियों का एक फीसदी लोगों  से दोस्ताना है। 


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सुनो शहर!! कान खोल कर सुन लो। ये जो स्टैटिक्स की पेचीदिगियों पर तुमने जीडीपी की इमारत टिकाई है, उसे दरकते अब देर  नहीं लगेगी। दिन-रात की जा रही तुम्हारी बेवफ़ाइयों को लोग समझने लगे है। तुम अब उनके नहीं रहे, जिन्होंने तुम्हें तुम्हारा  आकार दिया था। दूर तक फैली वीरानियत को एक ज़िंदा शहर में बदल दिया था। वो श्रमिक अब सर्वहारा हो चुका है। वो कामगार अब और नहीं  सह पाएंगे। किसी रोज वो अराजक हो जायेंगे। तब न्याय होगा। शायद, खैर....

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शहर  क्या  तुम  हर  रोज  हो  रही  नाइंसफियों को  देखकर  रोना नहीं आता? क्या तुम्हारी  इमारत  का  कोई  भी  कोना अब भावुक नहीं  रहा? रोटी खाने  की  जुगत  में तुम्हारे सामने बिता दी जाने वाली तमाम रातों बिना सोई  आँखों  को  तुम  कैसे  सह  लेते  हो? मेरे शहर!  मैंने  एक  बच्चा  देखा  था। दस साल  का तन्मयता से बर्तन मांजता  बच्चा। वह  अपने  काम  में मशीन जैसे जुटा  था। एकाएक  वह  मुझे  घूर  रहा  था सच्ची  शहर!! ऐसे  तमाम  बच्चे हैं। इन  बच्चों  की  आँखों  में मुझे तुम्हारी  मौत  दिखाई  देती  है।


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तुम्हारी संरचनाओं में कहीं भीतर किसी रोज मैं भी फंसा दिया जाऊंगा। लेकिन, मैं अंत तक तुमसे यूं ही तीखे सवाल करता रहूँगा। मैं बारिशों में पर फैलाने वाला परिंदा हूँ। चलता हूँ। कहाँ जाऊंगा। हाय नियति! तुमसे जाकर तुममें ही आऊंगा। कोई है?


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