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'फ्री सेक्स' की बात पर सार्वजनिक सम्भोग का ऑफर, धर्म-रक्षकों का ये कौन सा अवतार है?


-सुदीप्ति सत्यानंद 

बात 'फ्री सेक्स' की हो या नहीं पर क्या एक सभ्य समाज में कोई पुरुष/स्त्री किसी स्त्री/पुरुष को सीधे-सीधे सिर्फ सेक्स ऑफर करते हैं? वह भी सार्वजनिक सम्भोग? उस पर दूसरे चटखारे लेने और इंतजाम करने की बात करते हैं?

तथाकथित पढ़े-लिखे और अपने को दूसरे खेमे का बुद्धिजीवी साबित करते लोग कितनी निम्न स्तरीय सोच और स्त्री विरोधी नजरिये के हैं यह देखकर घिन आती है. मेरे दोस्तों में, परिवार में, करीबियों में सदा से ऐसे लोग रहे जो धार्मिक, सामाजिक, सामुदायिक जीवन में हिंदुत्व की विचारधारा के समर्थक थे/हैं. मैं खुद किसी भी अतिवादी विचारधारा की हिंसा को, उसके द्वारा दी गयी घुटन को समझ सकती हूँ, इसलिए उससे दूर रहती हूँ. लेकिन हर तरह के लोग परिचय के दायरे में हैं. सच कहिये तो घोर दक्षिणपंथियों को भी कभी इस हद का गिरा हुआ नहीं पाया कि सार्वजानिक रूप से एक स्त्री को सेक्स का आमंत्रण दे.

संस्कृति-रक्षा के नाम पर ही सही पर पर हिंदूवादी कभी इस असभ्य और अमानवीय तरीके की बातें नहीं करते थे. यह कौन से लोग हैं जो बात संस्कृति और सनातन परंपरा की करते हैं और कार्य ऐसे घटिया? क्या धर्म-रक्षकों का यह नया अवतार है?

हो सकता है मेरा सोचना बहुत सरलीकृत हो, लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है यह लोग सामुदायिक स्पेस में स्त्रियों की बढ़ती भागीदारी, उनके अपने हितों के लिए सजग होने से घबराए लोग हैं. इन्हें दक्षिण, वाम, मध्यम-मार्ग से लेना-देना नहीं. इनको पता है स्त्री सजग होते ही धर्म, संस्कृति और परंपरा के शोषणकारी पहलुओं पर वार करेगी. इनकी लड़ाई उन सभी से है जो तार्किक सोच की ओर जाते हैं.

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क्या आपको लगता है पत्रकार रह चुका आदमी 'फ्री सेक्स' का सन्दर्भ और अर्थ नहीं जनता होगा? हम सब जानते हैं इसका मतलब व्याभिचार, अनैतिक और विवाहेतर सेक्स नहीं है. क्या यह (Sumant Bhattacharya) या इसके जैसे आदमी/औरतें नहीं जानते कि सभ्यता के आरम्भ से ही सेक्स मिलते ही हाथ मिलाने जैसी बात नहीं है. स्त्री-पुरुष पहले मिलते हैं, परिचय, दोस्ती, प्रेम के बाद सेक्स की जब नौबत आती है तब भी स्त्री अपनी मर्ज़ी-बेमर्ज़ी जता सके इतना तो अधिकार उसके पास होना ही चाहिए न? वह अपनी मर्ज़ी की बात करेगी तो आप उसे सार्वजनिक बलात्कार से लेकर सम्भोग तक का ऑफ़र दे देंगे? आपके पास उससे निवेदित करने को दूसरी भी चीजें थीं, लेकिन आपने जो किया उससे आपके मन में छिपी हिंसा उजागर होती है. खासे संस्कृति-प्रेमी और अंतत: सामाजिक मर्यादा के अनुसार जाति-दहेज़ के साथ विवाह करने वाले युवाओं में भी जो 'वन नाईट स्टैंड' की पब-डिस्को कल्चर वाला स्खलन का दौर होता है उसमें भी हेल्लो की जगह आज मेरे साथ इण्डिया गेट पर करोगी/करोगे का प्रस्ताव नहीं शुरू हो जाता. तो ऐसा लिखने वाले व्यक्ति को खूब पता था वह क्या कर रहा है.

अमूमन मैं नकारात्मक चीजों पर इसलिए नहीं लिखती क्योंकि इससे उसका अनावश्यक प्रचार होता है. आज इसलिए लिख रही हूँ क्योंकि ऐसी सार्वजानिक मानसिक और यौनिक हिंसा का विरोध करना बहुत जरूरी है. ऐसे आदमी की वर्चुअल मित्र भी मैं कभी नहीं थी, कविता कृष्णन को अपनी युनिवर्सिटी से जानती हूँ पर उनसे भी किसी किस्म की कोई दोस्ती नहीं है. दरअसल, व्यक्तियों पर बात करना निरर्थक है. मुझे इस लडाई का व्यक्ति पक्ष नहीं दिखता. इसमें हमारे समाज के व्यावहारिक पक्ष के क्षय और स्त्रियों की लडाई के और कठिन होने वाले भविष्य की चिंता है.

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'आप' बुरके के विरोध में उतरी स्त्री को गाली देते हैं, 'आप' अपनी देह पर अपनी मर्ज़ी और साथी के चयन की बात करती स्त्री को अश्लील प्रस्ताव रखते हैं. आपके जैसे तमाम-पुरुष और स्त्रियाँ वहां चटखारे लेते हैं, सम्बंधित स्त्री के बाहरी रंग-रूप पर भद्दी टिप्पणियाँ करते हैं. आप फिर भी सांस्कृतिक होते हैं और स्त्री असंस्कारी. क्यों? क्योंकि वह सच में अब अपनी असली जगह तलाश रही है, क्लेम कर रही है. आप उसकी उपस्थिति से, उसके बढ़ते कद से, उसकी भागीदारी से भयाक्रांत हो चुके हैं. पर ठहरिए, आपके जैसी नहीं है यह 'स्त्री'. इसे सब 'अपने' लिए नहीं चाहिए. इसे सबके लिए सामान, सुन्दर, स्वस्थ और खुश दुनिया चाहिए. इसे सिर्फ 'फ्री सेक्स' नहीं चाहिए पर हाँ, वह भी चाहिए. अगर आपके कान इस स्त्री के मुँह से सेक्स सुनकर पचा नहीं पाते तो क्यों नहीं सनातनी प्रथा अनुसार आप उनमें 'पिघला शीशा' डाल लेते? नहीं डाल सकते तो सुनने, स्वीकार और विवाद के तैयार रहिए, यह स्त्री वही सब नहीं कहेगी, जो आपको पसंद हो.

(डिस्क्लेमर: आप किसी राजनितिक/धार्मिक संगठन और विचारधारा को मान सकते हैं, मानने वाले व्यक्ति को पसंद कर सकते हैं, लेकिन सामान्य मानवीय गरिमा का ध्यान नहीं रखें तो मेरा आपसे कोई राबता नहीं. 'उस' व्यक्ति और मेरे म्युचुअल फ्रेंड्स से मुझे तकलीफ नहीं, पर उस 'स्टेटस' को 'लाइक' करनेवालों को मैं स्वीकार नहीं सकती. शुक्र था कि बस 'दो' ही दोस्त ऐसे निकले.)
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