Top Letters
recent

जीवन से भरे तमाम लोगों के बीच रहते–रहते मैं खाली हो गया हूँ !

-आशुतोष तिवारी 

सुनो मां !!

जीवन की खूबसूरती से कोसों दूर मैं वेदना की रोशनी में यह खत लिख रहा हूँ। यह खत उस सच्चाई का समझाव ही है कि मुझे मेरे ही जीवन ने हाशिये पर ला पटका है। मैं जीवन से भरे तमाम लोगों के बीच रहते–रहते खाली हो गया हूँ। शराब की पहली बोतल से लेकर चर्च की सात्विक शामों तक मैंने शांति को खोजा है। लेकिन शांति को सोता शायद सूख गया है।

इसे भी पढ़ें...
सात साल की तड़प के बाद...मरने से पहले आखिरी ख़त, प्रिय सूफ़ी ! क्या तुम ये चिठ्ठी पढ़ोगी? 

किताबों से निकलकर हर रोज एक पागल पथिक मेरे सामने आ जाता है। सालों पहले उसने खुद में खोजने की बजाय सब में ख़ुशी को खोजकर पागल कर लिया था। मंटो की कहानियों के किरदार मुझे मेरे दोस्त लगते हैं। मेरे जहन में किताबों से भरा एक कमरा है। इस कमरे के भीतर कोई बाप अपनी उस बेटी को ज़िंदा देखकर खुश हो रहा है, जिसका भरोसेमन्दों ने सामूहिक बलात्कार किया है।

इसे भी पढ़ें...

'कितने पाकिस्तान' के शुरूआती पन्नों से बाबर अपना सिर निकालकर इन्साफ के लिए चिल्ला रहा है। शरत चन्द्र के उपन्यासों की दूसरी औरत अपने प्रिय के लिए खुद का प्यार भी सदियों से कुर्बान कर रही है। महानता की चादर उसके आंसुओं से गीली हो रही है। निर्मल वर्मा का डैनी दो तिनका सुख की तलाश में सालों से भटक रहा है। इन किरदारों का हिसाब कौन करेगा? जुल्म की अनगिनत दास्तानों के बावजूद किताबें यह यकीन करने को कहती हैं कि अब इन्साफ होने वाला है। मुझे इन झूठे यकीनों पर तरस आता है।

इसे भी पढ़ें...
'तुम्हारी यादें उस बेमौसम बारिश की तरह हो गई हैं, जो मुझे किसान की तरह बर्बाद कर देती हैं'

मां!! मैं दिन पर दिन एक बेकार आदमी होता जा रहा हूँ। किसी ऐसी इमारत की रचना में लगा आदमी जो कमजोर कामगारियों के चलते नियति में गिरना लिखाकर लाई है। सड़क के तीन चक़्कर मुझे थका देते हैं। इक्कीस बसन्तों में ही मैं बूढ़ा हो गया हूँ। जबरदस्त थका होने के बावजूद मन की बेचैनियाँ शांत नहीं होतीं। स्लीपिंग पिल्स के तीन-तीन डोज भी रात को किसी बुरे ख़्वाब में बदलने से नहीं रोक पाते। मुझे ठीक से हंसे हुए हफ्तों हो जाते हैं। मेरा जीवन समुद्र में पड़े हुए उन खाली तीन के कनस्तरों सा हो गया है, जो खन्न-खन्न की आवाज करते अपने चारों ओर बिखरे पत्थरों से टकराया करते हैं।

इसे भी पढ़ें...
प्रेम पत्र लिखना है? तो गर्लफ्रेंड के नाम लिखी एक हिंदुस्तानी डॉक्टर की ये खास चिट्ठी जरूर पढ़ें

भला वेदना की शक्ति के सहारे कोई कब तक जियेगा? एक समय बाद वेदना की वैलेडिटी भी खत्म हो जाती है। शायद मैंने जीवन को गलत तरह से समझा है या जीना मेरे 'समझ' से कुछ ऊंची किस्म की चीज है। मैंने अब बच्चों के साथ खेलना बंद कर दिया है। मुझे मालूम है मां!! उन पर मेरा बुरा प्रभाव पड़ता है। वह अपने करीबियों से अजीब से सवाल करने लगते हैं। ऐसे सवाल जिनको कोई सुनना नहीं चाहता। जिनका जवाब कोई जानना नहीं चाहता।

इसे भी पढ़ें...

मां!! दिन का एक मात्र खूबसूरत काम नाद्रा से मिलना होता है। नाद्रा एक विचित्र लड़की है मां। उसे मेरी ही तरह हर शाम किसी से प्यार हो जाता है। उसकी ज़िंदगी में उससे भी ज्यादा विचित्र कहानिया हैं। उन कहानियों से गुजरना ही उसे मेरे पास ले आया है। नाद्रा मेरे द्वारा देखी गई युद्ध के खिलाफ प्रकृति की जवाबी रचना है। वह इतनी मासूम है कि उसे देख नफरत भी मोहब्ब्त के सलीके सीख जाएगी। जब समझदारियां मुझ पर हावी होने लगती हैं, मैं उसकी मासूमियत याद कर लेता हूँ। मासूमियत लौट आती है और नाद्रा चली जाती है। मैं अच्छा बेटा तो कभी था ही नहीं, अच्छा प्रेमी बनने में भी नाकाम रहा हूँ। मां !! अच्छा आशिक होना वाकई एक चुनौती भरा काम है।

इसे भी पढ़ें...

मां !! घर से बहुत दूर यहां अब मैं एक औपचारिक जीवन जी रहा हूँ। बदलाव की हर बात बदलाव लाने में नाकाम रही है। मेरा जीवन निर्मल वर्मा के उन उपन्यासों जैसा होता जा रहा है, जिनमें कहानी या क्लाइमेक्स की बजाय जीवन की ऊब भरी यात्रा होती है। दिन का खालीपन मुझे थका देता है और अंतर्मन रात को एक नाइटमेयर में बदल देता है। आधी रात को उठकर मैं अपना लैपटॉप ऑन कर देता हूँ। गूगल पर सुसाइड करने के आसान तरीके खोजने लगता हूं। फिर डर कर डाटा ऑफ कर देता हूँ। खुद को मारने का ख्याल अजीब लगता है। शायद मरने से भी ज्यादा अजीब होता है 'अकेले मर जाना'। वेदना को भी साथी चाहिए होता है मां !!! मौत को भी साक्षी चाहिए होता है।
My Letter

My Letter

Powered by Blogger.