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रवीश की चिट्ठी पर चिट्ठी, सवाल पूछना लोकतंत्र की आत्मा, रोहित भी सवाल उठाने को आजाद हैं

- संजय श्रीवास्तव

रवीश कुमार की चिट्ठी पर एक पत्रकार साथी रोहित सरदाना ( जी न्यूज) ने कुछ सवाल खड़े किये हैं। हालांकि ये दोनों पत्रकार साथी ऐसे नहीं है जिनके साथ मैंने काम किया हो या कोई गहरा संबंध हो। लेकिन बात मुद्दे की उठी है तो बिना हस्तक्षेप किए रहा नहीं जा रहा है। रवीश कुमार का जहां तक मैंने आकलन किया है, उनसे मेरा दूर का संबध है। फिर भी कभी कभार उनको एकाध सलाह दी तो उसे माना और जवाब भी दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे ऐसे तमाम मुद्दों को उठाते हैं, जिस पर आम तौर पर मुख्यधारा का टीवी शांत रहता है।

यह सही है कि रवीश कुमार ने बरखा दत्त को चिट्ठी नहीं लिखी है। लेकिन मैं साथी रोहितजी से यह जानना चाहता हूं कि क्या उन्होने सुधीर चौधरी जी को चिट्ठी लिख कर कभी पूछा है कि आखिर उन्होने नवीन जिंदल के साथ ऐसी सौदेबाजी क्यों करनी चाही थी औऱ यह भी कि क्या उमा बंसल नाम की शिक्षिका का जीवन बरबाद करते समय उनको पत्रकारिता की नैतिकता का खयाल नहीं रहा था।

इसी विषय पर पढ़ें...
NDTV के रवीश और ZEE NEWS के रोहित स‌रदाना की चिट्ठियों का 'पोस्टमार्टम'

मेरे हिसाब से उन्होंने जो सवाल उठाया है वह बेमानी है। रवीश या कोई भी पत्रकार पूरी दुनिया का ठेका लेकर नहीं चल सकता है। जो सवाल झकझोरता है उस पर अगर कोई पत्रकार खुल कर बोलता है तो वह उन पत्रकारों से ज्यादा ईमानदार है जो मन ही मन घुटते हैं। मेरे हिसाब से एक पत्रकार के तौर पर रवीश कुमार अगर कुछ सवाल खड़े कर रहे हैं तो यह एकदम बुरा नहीं है। वे किसान या मजदूर की बात करते हैं तो किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध नहीं करते।

कायदे से कोई किसी को संबोधित चिट्ठी लिखता है और अपनी भावनाओं का इजहार करता है तो उसमें किसी और को कूदना नहीं चाहिए। न ही किसी का प्रवक्ता बनना चाहिए। यह सामान्य शिष्टाचार है। एक पत्रकार होने के साथ चिट्ठी के महत्व को मैं बाकी साथियों से अधिक जानता हूं क्योंकि बीते तीन दशकों से मेरे अध्ययन का यह प्रमुख विषय रहा है।

खुली चिट्ठियां लिखने का रिवाज पुराना है। रवीश कुमार की चिट्ठियां बेशक सवाल खड़े करती हैं। सवाल एमजे अकबर पर या अरुण शौरी जैसे एक दौर के दिग्गज पत्रकारों पर उठाना क्यों बुरा है और अखिलेश यादव पर उठाना क्यों अच्छा है? मेरे हिसाब से रवीश कुमार ने सही सवाल उठाए हैं और ऐसे सवालों को उठाना जारी रखना चाहिेए। 

सवाल पूछना और सवाल उठाना लोकतंत्र की आत्मा है। रोहित जी भी सवाल उठाने के लिए आजाद हैं। वे बरखा दत्त से सवाल कर सकते हैं, खुली चिट्ठी लिख सकते हैं। लेकिन किसी और पर सवाल उठाने से कैसे रोक सकते हैं। यह एजेंडा कैसे तय कर सकते हैं कि रवीश को या किसी को कैसा सवाल पूछना चाहिए और किससे सवाल पूछना चाहिए। बस इतना ही।

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