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बिहार के CM नीतीश के नाम खुला ख़त, अगर ये जुर्म है तो हर भारतीय को बार-बार करना चाहिए !

बिहार के औरंगाबाद जिले के राजानगर मोहल्ले की लड़की को अजहर नाम का लड़का कई दिनों से परेशान कर रहा था. 23 जून 2016 को ट्यूशन जाते समय अजहर ने लड़की का हाथ पकड़ लिया. लड़की ने घर आकर इसकी जानकारी परिवारवालों को दी. परिवार के लोगों ने इसकी शिकायत अजहर के घर पर की तो उल्टा उन लोगों ने लड़की के घरवालों से मारपीट की. अगले दिन 24 जून को जब लड़की घर में बाहर वाले कमरे में सो रही थी तो उसके घर में घुसकर उसके ऊपर एसिड डाल दिया गया. उसी लड़की के भाई ने मुख्यमंत्री के नाम ये चिट्ठी लिखी है। पढ़िए क्या लिखा है उस भाई ने. 

आदरणीय मुख्यमंत्री जी, 

क्या मैं आप से बात कर सकता हूँ? हाँ! मुझे करना चाहिए. आपसे नहीं करूँगा तो किस से करूँगा? मेरा नाम मंज़र अमन है. मैं आप के प्रदेश बिहार की एक मजलूम लड़की का भाई हूँ, जिस पर एक ज़लील नौजवान ने तेज़ाब से हमला कर उसका चेहरा और पूरा बदन ख़राब कर दिया है. क्या यहाँ शरीफ लोगों के लिए जीना मुश्किल है? एक आम इंसान को सुख और चैन के साथ रहना इतना कठिन है कि नौवीं कक्षा में (14 years) पढ़ने वाली एक बहन पर तेज़ाब से हमला हो और तीन महीने गुज़र जाने के बाद भी सरकारी तंत्र उसे जरूरी सुविधाएँ प्रदान करने में नाकाम रहे?

आदरणीय! काश कि आप उस पीड़ा को क़रीब से महसूस कर पाते जो मेरी बहन तीन महीने से झेल रही है. काश कि आप उस तेज़ाब की आग में उसके साथ-साथ मेरे पूरे परिवार को जलते हुए देख पाते. काश कि आप मेरी माँ का तड़पता हुआ दिल और मेरे पिता जी के बिखरते हुए सपनों को देख पाते. काश कि आप मेरी बहनों की रोती-बिलखती और डरी-सहमी आँखों को देख पाते, जो स्कूल जाने के नाम से डर जाती हैं कि कहीं कोई ज़लील उन पर भी तेज़ाब से हमला न कर दे. आपने ये सब क्यों नहीं देखा? आपको देखना चाहिए, बल्कि ये सब आपको देखना ही होगा.

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आदरणीय मुख्यमंत्री जी! हमारा जुर्म क्या है? सिर्फ़ इतना कि हमने अपनी बहन को पढ़ाने-लिखाने की कोशिश की, अगर ये जुर्म है तो ये जुर्म हर भारतीय को बार-बार करना चाहिए, ताकि लोगों को मालूम हो सके कि अपनी बेटियों को शिक्षित करने की कोशिश की सजा बहुत भयानक है, बहुत ही दर्दनाक है और ये भी कि कोई भी ज़लील आदमी माँ-बहनों पर तेज़ाब से हमला करके उनकी जिंदगी बर्बाद कर देगा और क़ानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा. आदरणीय मुख्यमंत्री जी! अब तक कि आपकी ख़ामोशी से तो यही सन्देश मिल रहा है.

क्या ये सच नहीं है कि पीड़ित के साथ-साथ पूरा परिवार इस आग में जलता है. कभी हॉस्पिटल का चक्कर, कभी कोर्ट-कचहरी का चक्कर तो कभी सरकारी सहायता की अपील करता फिरता है. लेकिन एक दिन ऐसा आता है कि थक हार कर अपनी मौत मरने और आत्महत्या की मांग करता है. किस्मत को कोसता है. शराब पर पाबन्दी लगाने में आप कामयाब हो गए, लेकिन आपकी सरकार में लड़कियों कि इज्ज़त, अस्मिता और उनकी सुरक्षा का ये हाल है कि कोई भी खिलवाड़ कर देता है और कोई कुछ नहीं कहता, कोई सवाल नहीं करता, सच कहा था किसी ने कि जो सवाल नहीं करते वो बेवकूफ़ हैं, जो सवाल करना नहीं चाहते वो बुज़दिल और डरपोक हैं. जिनके ज़हन में सवाल आता ही नहीं वो आज भी ग़ुलाम हैं.

आदरणीय यही सच है क्योंकि ये हादसा हमारे घर और ख़ानदान में नहीं होता तो हम और आप बड़ी आसानी से कह देते हैं कि हमें क्या करना! हमारा क्या मतलब! इस तरह के वाक्य कहने में हम बिलकुल नहीं झिझकते. लेकिन यही सारे जुमले उन ज़लील क़िस्म के लोगों के नापाक हौसलों को और मज़बूत करते हैं फिर वो इस तरह के जुर्म को बार दोहराते हैं. मुख्यमंत्री जी! थोड़ी देर के लिए आप ये सोच लें कि मेरी बहन आप ही कि बहन है, तो क्या तब भी आप उसे यूँ ही बेसहारा छोड़ देते? क्या तब भी आपका क़ानून जुर्म के लिए उकसाने वालों को बेल दे देता, जबकि बिस्तर पर ज़िन्दगी और मौत से जूझ रही आपकी बहन की एक-एक आह और सिसकियां इन्साफ की गुहार लगा रही हैं.

आदरणीय! इस बात का फैसला समाज और भारतीयों पर छोड़ता हूँ और आपसे सवाल करता हूँ कि क्या हमें इंसाफ की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए? क्या हमें उस सरकारी सहायता की भी उम्मीद छोड़ देनी चाहिए, जिसका एलान हमले के बाद किया गया। जबकि तीन महीने होने को हैं और आज तक हम उससे वंचित हैं.

आदरणीय ! क्या हम भीख मांग रहे हैं जो सरकार इसमें सुस्ती का प्रदर्शन कर रही है? क्या हमने आपको सत्ता इसलिए सौंपी थी कि ज़रूरत के वक़्त आप मदद को न पहुंचें? क्या हमने आपको प्रदेश का मालिक इसलिए बनाया था कि आप तक हमारा पहुंचना ही मुश्किल हो जाये? सुनिए मुख्यमंत्री जी! हाँ! आपको सुनना पड़ेगा क्योंकि इस दर्द को हम आपके सामने नहीं बयान करेंगे तो कौन हमारी आवाज़ सुनेगा?

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जवाब दीजिये कि मेरी बहन तीन महीने से हॉस्पिटल में ज़िन्दगी और मौत की जंग लड़ रही है. उसकी शिक्षा, उसका समय, उसकी ज़िन्दगी और उसके ख़ानदान की ज़िन्दगी की तबाही के पीछे किसका हाथ है? आदरणीय आप अब भी ख़ामोश क्यों हैं? आप बोलिए कि मेरे ख़ानदान के नुकसान की भरपाई कौन करेगा? मेरी बहनों की डरी-सहमी सी आँखों में उम्मीद की किरण कौन जगायेगा? मुझे यक़ीन है उनकी फ़रियाद और आहें आप को चुप नहीं बैठने देंगी.

क्या आपको नहीं लगता कि हमारी अच्छी ख़ासी ज़िन्दगी अचानक से रुक गयी है? क्या हम इस ज़माने की रफ़्तार से बहुत पीछे नहीं चले गए हैं? एक मज़लूम का भाई आपसे आपके बेटे की हैसियत से सवाल कर रहा है कि क्या आप किसी के भाई नहीं हैं? ये सब कुछ जानने के बाद भी अगर आपके सीने में दर्द न उठे और आप ख़ामोश तमाशाई बने रहें...तो...हैरत है !

एक बदनसीब लड़की का भाई 
मंज़र अमन
(source: hindi.pradesh18.com)
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