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बधाई ndtv, शर्म आनी चाहिए पत्रकार जैसी दिखनेवाली उन शक्लों को, जो इस 'बैन' पर ताली पीट रहे हैं

-नितिन ठाकुर

ये वक्त बहुत कमाल का है। कई घटनाएं एक-दूसरे के बाद हो रही हैं। नज़र बनाए रखने का ये सबसे सही समय है। अगर आपने आपातकाल नहीं देखा तब तो बारीक नज़र की और भी ज़रूरत है। रामनाथ गोयनका अवार्ड फंक्शन में टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार अक्षय मुकुल ने पुरस्कार लेने से मना कर दिया क्योंकि वो कार्यक्रम में उपस्थित प्रधानमंत्री के विचारों से सहमति नहीं रखते थे। कुछ ही देर बाद पीएम मोदी ने आपातकाल में बहादुर पत्रकारिता का ज़िक्र किया और फिर एक्सप्रेस के मुख्य संपादक राजकमल झा ने पांच ही लाइनों में मोदी के सामने जो कुछ कहा वो दिखाने के लिए काफी था कि इंदिरा का घोषित आपातकाल झेल चुका मीडिया अब मोदी का अघोषित आपातकाल झेलने से भी पीछे नहीं हटेगा।

राजकमल ने एक लाइन कही थी- 'इस वक़्त जब हमारे पास ऐसे पत्रकार हैं जो रिट्वीट और लाइक के ज़माने में जवान हो रहे हैं, जिन्हें पता नहीं है कि सरकार की तरफ से की गई आलोचना हमारे लिए इज़्ज़त की बात है।' सचमुच ये वो बात है जो तीन तरह के लोगों की समझ में नहीं आएगी। 1. वो जिन्होंने मजबूरी में इस पेशे को अपनाया है, 2. किसी और एजेंडे को पूरा करने के लिए इस पेशे में घुस आए लोग, 3. ग्लैमर से अंधे होकर पत्रकारिता की गलियों में आवारगर्दी कर रहे पत्रकार जैसे दिखनेवाले लोग।

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इनके लिए रिपोर्टिंग करते किसी पत्रकार का पिटना हास्य का विषय है। किसी पत्रकार या पत्रकारिता संस्थान पर चलनेवाले सरकारी डंडे को ये इज़्ज़त देते हैं। दरअसल इन्हें अपने पेशे पर शर्म है लेकिन ये लोग इस पेशे के लिए खुद शर्म का विषय हैं। इस घटना के ठीक अगले ही दिन एनडीटीवी इंडिया को एक दिन के लिए ऑफ एयर करने का सरकारी फरमान आता है। सरकार और उसके लाडलों की इस चैनल से दुश्मनी जगज़ाहिर है। ऐसे में ये फरमान इतनी देर से आने पर मुझे हैरत है। आखिर सरकार के पास इस चैनल को बंद कर डालने के लिए भी बहानों की कमी तो नहीं रही होगी।

फिलहाल सरकार ने पठानकोट हमले की गैरज़िम्मेदाराना रिपोर्टिंग का बहाना बनाया है। ये अलग बात है कि हम सब जानते हैं कि एनडीटीवी पठानकोट पर वही चला रहा था जो सब चैनल और वेबसाइट पहले से चला रहे थे। इस चैनल की ख्याति इस बात के लिए कभी नहीं रही कि वो सबसे पहले कुछ ब्रेक करे या फिर मुख्यधारा की ख़बर में कुछ उल्लेखनीय करके दिखाए। पठानकोट वाले दिन भी एनडीटीवी इंडिया अपनी कछुआ चाल पर कायम था और कोई नहीं बता सकता कि उसने ऐसा क्या प्रसारित किया जो पहले से नहीं चल रहा था।

मुझे विश्वास है कि उसे 'सज़ा' देनेवाली अथॉरिटी भी पक्के तौर पर कुछ नहीं बता सकती। एनडीटीवी ने सरकारी नोटिस का जो जवाब दिया है वो वेबसाइट पर उपलब्ध है। साढ़े चार लाइनों के जवाब में एक लाइन ये भी है- 'आपातकाल के काले दिनों के बाद जब प्रेस को बेडि़यों से जकड़ दिया गया था, उसके बाद से #NDTVIndia पर इस तरह की कार्रवाई अपने आप में असाधारण घटना है।'

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क्या कमाल का संयोग है कि एक दिन पहले देश का प्रधानमंत्री आपातकाल में बहादुर पत्रकारिता की बात करता है और अगले दिन उसके मंत्री एक चैनल को ऑफ एयर करने का ऐतिहासिक निर्णय लेते हैं। क्या आपातकाल तभी माना जाएगा जब राष्ट्रपति वाकई एक कागज़ पर हस्ताक्षर करेंगे? या क्या अब ऐसे किसी आपातकाल को औपचारिक तौर पर लागू करने की मजबूरी बची भी है? या फिर हम सब इतने बेवकूफ समझे जा चुके हैं कि इतना अंदाज़ा भी ना लगा सकें कि संघ की शाखाओं में पके दिमाग जो आज सरकार चला रहे हैं हमेशा से इस चैनल और मोटे तौर पर मीडिया को लेकर कितने दुराग्रही हैं?

अगर मोदी काल में बेवकूफ दिखकर आराम से दिन काटे जा सकते हैं तो बहुत लोग यही कर भी रहे हैं लेकिन बीच-बीच में अक्षय मुकुल या राजकमल झा जैसे लोग इस मुर्दनगी को तोड़ते हैं। कुछ हफ्ते पहले देश के गृह राज्यमंत्री रिजीजू ने ट्वीट करके पीएम से सवाल करनेवालों पर ताना मारा था। उन्होंने सवाल करने को 'नया फैशन' करार दिया था। मुझे पक्के तौर पर नहीं पता कि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और नकली लाल किले बनवाकर वहीं से दिल्ली की तरफ सवाल उछाला करते थे तब वो सवाल 'फैशन' की श्रेणी में ही आते थे या फिर उन्हें रिजीजू ने किसी और कैटेगरी में माना था?

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अगर सवाल करने का 'फैशन' बुरा है तो इस सरकार को कानून बनाकर ये खत्म कर डालना चाहिए। इसके बाद सारे मीडिया संस्थानों को ताला लगा देना चाहिए क्योंकि इनका धंधा तो इसी 'फैशन' पर टिका है। राजकमल झा ने तो पहले ही कह दिया था कि सरकार अगर आलोचना करती है तो ये किसी पत्रकार के लिए पदक जैसा है। मेरा ख्याल है एनडीटीवी इंडिया मोदीयुग में ये पदक हासिल करनेवाला पहला चैनल बन गया है।

मेरी बधाई #एनडीटीवी को। उसे इस पर गर्व करना चाहिए और उन पत्रकार जैसे दिखनेवाली शक्लों को शर्म आनी चाहिए जो इस 'सज़ा' पर ताली पीट रहे हैं। कोई भी पत्रकार इस तरह के बैन का स्वागत कर ही नहीं सकता। अगर कर रहा है तो वो खुद से पूछ ले कि उसके भीतर किसी पार्टी विशेष का समर्थक होने का भाव पत्रकार की भावना पर भारी तो नहीं पड़ गया है??? [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
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