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सवालों से लोकतंत्र मजबूत होता है, मध्ययुग से निकलिए, राजा को पूजने का युग चला गया है

- कृष्ण कांत

कुछ लोग रोज ज्ञान देते हैं कि सरकार की तारीफ क्यों नहीं करते? सिर्फ आलोचना क्यों करते हो? उनसे मेरा कहना है कि सरकार के कामकाज की तारीफ के लिए सरकार के पास मंत्रालय है, प्रचार विभाग है, एजेंसियां हैं, प्रवक्ता हैं, दूरदर्शन है, आॅल इंडिया रेडियो है. जनता के पैसे से भरा खजाना है. नियुक्त किए गए सैकड़ों लोग हैं जो दिन भर सरकार की तारीफ करने और प्रचार करने के लिए काम करते हैं. हमारा काम सरकार की तारीफ करना नहीं है.
पत्रकार यानी प्रेस यानी फोर्थ स्टेट का काम सरकार से सवाल करना है. जो नहीं हो रहा है और जो होना चाहिए, उसे लेकर जनता को जागरूक करने का काम पत्रकार का है. पत्रकार सिर्फ एक नागरिक है, लेकिन उसे तमाम सुविधाएं विशेष महत्व इसीलिए मिलता है क्योंकि वह जनता के हित में सरकार की निगरानी करने का काम करता है. 

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यह जो पॉजिटीविटी का मूर्खतापूर्ण कॉन्सेप्ट है, यह आपके निजी जीवन में लागू होता है. सार्वजनिक कामकाज की सार्वजनिक आलोचना करने या सवाल उठाने का काम सार्वजनिक हित से जुड़ा है. उसका मकसद किसी से निजी दुश्मनी निकालना नहीं है.  

आजादी की लड़ाई में प्रेस की सबसे प्रमुख भूमिका रही. उसके बाद भी प्रेस ने मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाई. जबसे कॉरपोरेट का प्रेस और मीडिया पर कब्जा हुआ, जबसे उद्योगपतियों की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि वे प्रधानमंत्री को अपनी जेब में रखने का गुरूर पाल सकें, तब से मीडिया भी रानी सरंगा की कहानियां छापने पर ध्यान देने लगा, क्योंकि वह भी ​बनियों के कब्जे में है. 

1937 में जवाहर लाल नेहरू ने एक ले​ख में लिखा था, 'आलोचनाएं मुझे पसंद हैं. वे मुझे दूसरों की निगाहों से अपनी ओर देखने में मदद देती हैं. एक सवाल को भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखन का और मौजूदा जिंदगी की उलझनों में सीधे सोचने का मौका भी मिलता है. और अगर अखबार ही आलोचना न करेंगे तो और कौन करेगा? अखबारों का यह सबसे मुख्य काम है.'

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यह वही नेहरू हैं जो अपनी ही सरकार और अपने खिलाफ अखबारों में फर्जी नाम से लेख लिखते थे, ताकि विपक्ष और आलोचना की लोकतांत्रिक परंपरा की बुनियाद पड़े. तो यह जो 'रिच डैड पुअर डैड' छाप सकारात्मकता की घुट्टी है, यह अपने निजी जीवन में रखिए. मध्ययुग से बाहर निकलिए. राजा को पूजने का युग चला गया है. प्रधानमंत्री की या सरकार की इज्ज्त कीजिए और उनसे खूब सवाल पूछिए. सवाल करना लोकतंत्र को मजबूत करना है. [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
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