Top Letters
recent

मां हर पल ये सोचकर घुटती है कि उसके बच्चे के साथ कोई वहशी पता नहीं क्या कर रहा होगा?

- मेघा मैत्रेयी

इस बार गाँव गयी तो एक पड़ोसी बड़े सदमे में थे। बताया गया कि उनके साथ बड़ी भयानक घटना हो गयी और वो बाल-बाल बचे। वो दोपहर में पैदल कहीं जा रहे थे कि एक गाड़ी पास आकर रुकी और एक सभ्य दिखने वाला इंसान बड़ी विनम्रता से उनसे किसी जगह का पता पूछने लगा। तभी गाड़ी से दो और लोग निकले और उनको को पकड़ कर गाडी के अंदर खिंच लिया। हाथ-पैर और मुँह बाँध दिया गया और नशा दे दिया गया। भरी दुपहरी के समय हुआ यह। जब इन्हें होश आया तो इन्होंने खुद को कानपुर पुलिस स्टेशन में पाया। इन्हें बीमार बता कर दिल्ली ले जाया जा रहा था ट्रेन से, पर इनकी संदिग्ध स्थिति को देखते हुए पुलिसवालों ने उतरवा लिया वही स्टेशन पर, हालाँकि इनको ले जा रहा इंसान भाग निकला। अपनी सीधी-साधी मिडल स्कूूल के टीचर वाली जिंदगी में इन्होंने ना तो कभी कोई दुश्मन बनाया ना ही ऐसी आर्थिक स्थिति जो इनमें किसी की रूचि पैदा करें।पुलिस ने बताया कि ऐसे एक-दो केस उन्हें रोज मिल जाते हैं ट्रेन में।

इसे भी पढ़ें...
मां के लिए जज बेटे के भावुक कर देने वाले लफ़्ज, हर बहू-बेटे को ये जरूर पढ़ना चाहिए

ऐसी ही एक और घटना है जब मेरे पापा-म्मी ट्रेन से यात्रा कर रहें थे। पास में तीन गरीब से दिखने वाले बच्चे नए खिलौनों के साथ बैठे हुए थे। जब काफी देर उनके साथ कोई बड़ा नहीं दिखा तो पापा ने पूछा कि वो किनके साथ हैं? बच्चे एक दूसरे के मुँह देखने लगे। आस-पास के लोगों ने भी पूछताछ शुरू किया तो उन्होंने गाँव का नाम बताया और कहा कि कोई अंकल उन्हें ट्रेन में बैठा गए जो कि मेले में मिले थे। लोग बच्चों को पुलिस को देने की बात कर रहें थे कि इतने में एक आदमी बड़ा मानवता दिखाते हुए बोलता है कि हम भी उसी गाँव के रहने वाले है इसलिए पहुँचा देंगे बच्चों को वापस माँ-बाप के पास। पर जब लोगों ने उससे खतरनाक अंदाज में पूछना शुरू किया तो वह वहाँ से खिसक गया और अगले स्टेशन पर बच्चे पुलिस के पास छोड़े गए।

ये मामले ह्यूमन ट्रैफिकिंग के होते है। मुझे गुमशुदगी से ज्यादा बड़ी त्रासदी एक परिवार के लिए कोई और नहीं लगती। मौत इस से कई गुना ज्यादा बेहतर है, कम से कम एक माँ हर पल यह सोच कर तो नहीं घुटेगी की उस पल उसके बच्चे के साथ कोई वहशी क्या कर रहा होगा?? अगर आपको लगता है मानव तस्करी के शिकार सिर्फ गरीब ही होते है तो यह झूठ है। हालाँकि ज्यादातर मामले गरीब औरतों और बच्चों के ही होते है पर "प्रज्वला" जैसे संगठनो ने आईएएस की बेटी तक को कोठों से आजाद करवाया हैं। औरतें और बच्चे जहाँ देह व्यापार में धकेले जाते है वहीं पढ़े-लिखे पुरुष तक अंग तस्करी के शिकार बनते हैं।

इसे भी पढ़ें...
बड़े होते बेटे के लिए मां का ख़त, तुम्हारी पीढ़ी के हर लड़के को दोहरी ज़िम्मेदारी उठानी होगी 

भारत में नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार लगभग एक लाख बच्चे हर साल गायब होते है। रोजाना करीब 400 महिलायें और बच्चे गायब होते है।पर सवाल यह हैं इनमें से कितने गुमशुदा लोगों के नाम हमें मालूम है, नजीब के अलावा??शायद एक भी नहीं क्यूकी हम हजारों पीड़ितों में से किसी एक जेसिका लाल, निर्भया या नजीब के लिए खड़े होते है। पर नजीब में ऐसा क्या है कि कुछ लोग हर दूसरे पोस्ट में उसे याद करते है पर बाकी रोज के 399 लापता हुए लोगों पर एक भी पोस्ट नहीं आती?

नजीब मुझे नहीं मालूम कि तुम्हे बचाया जा सकता था या नहीं पर लोगों की थोड़ी सी बुद्धिमानी की वजह से वह तीन बच्चे और गाँव का वह आदमी बच गया।जब ऐसी कोई घटना घटती है तो सिर्फ उसपर राजनितिक रोटियाँ न सेकें।दोष सिर्फ पुलिस को देने से नहीं चलेगा।पर देश की विडम्बना यह हैं कि यहाँ के पढ़े-लिखे लोग तब तक किसी मुद्दे को नहीं उठाते जब तक कि उस मुद्दे का मुख्य मुद्दा सरकार में दोष निकालना ना हो।
[अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
My Letter

My Letter

Powered by Blogger.